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कहानी: अभिशप्त जीवन

अपनी ईमानदारी के कारण उपेक्षित जीवन जीने वाले  एक सरकारी विभाग के बड़े अधिकारी धीरज वर्मा जी के निधन को पाँच वर्ष पूरे हो गए, आज उनका श्राद्ध था। जिसमें उनके बेटे नीतेश ने इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन कराकर खूब दान दक्षिणा दी थी बंधु बाँधवों एवं परिचितों को भी भोजन कराया था उनकी तस्वीर पर गुलाब के फूलों की माला चढ़ाई गई थी। पर कहने वाले कहने से थोड़ी चूकते हैं धीरज बाबू के मित्र मोहन ने कह ही दिया  बेटा यदि पिता का ख्याल पहले ही रखा होता तो उनके श्राद्ध की नौबत नहीं आती वो भी आज हमारे बीच जीवित होते। सुनकर नितेश का चेहरा फीका पड़ गया बोला नहीं अंकल जी ऐसी कोई बात नहीं है हम तो उनका बहुत ख्याल रखते थे पर होनी को कौन टाल सकता था। मोहनलाल जी ने बात आगे नहीं बढ़ाई उससे कोई फायदा भी नहीं था।
धीरज जी के हम उम्र जितने भी थे उनके रिटायरमेंट के चार वर्ष बीत गए थे और सब सुखी जीवन जी रहे थे। धीरज वर्मा जी को रिटायरमेंट में जब एक वर्ष का समय रह गया था तब उनका दुर्घटना में निधन हो गया था वे स्कूटर से ऑफिस जा रहे थे तभी एक तेज गति से आ रहे ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था वैसे वे रोज हेलमेट पहनकर ही घर से निकलते थे पर आज उनके सिर पर हैलमेट भी नहीं था। इसका एक बड़ा कारण यह था कि उनके घर में रोज कलह होती थी उनकी पत्नी उन्हें जलील करती थी बच्चे अपमानित करते थे उनका बेटा नीतेश अठ्ठाइस वर्ष का होने जा रहा था और बेरोजगार था बेटी श्रुति तलाकशुदा थी सैंतीस साल की नौकरी के बाद भी धीरज किराये के मकान में रह रहे थे। परिवार का खर्च उनकी तनख्वाह से ही चलता था फिर भी सब उन्हीं को दोषी ठहराते थे पत्नी कहती तुम्हारी ईमानदारी का मैं क्या करूँ कौनसा तुम्हें तमगा मिल गया रोज ऑफिस सबसे पहले जाते हो और सबसे बाद में आते हो फिर भी वेतन के अलावा आज तक एक धेला भी ऊपर की कमाई को लाकर नहीं दिया। पत्नी अक्सर ताने देकर कहती तुमसे लाख गुना अच्छे मेरे जीजाजी हैं। महीने में दस दिन से ज्यादा कभी नौकरी पर नहीं गए फिर भी साहब के चहेते रहे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहने के बाद भी आज तक कोई उनका बाल बाँका नहीं कर पाया दस किलो तो उनके पास सोना है बारह क्विंटल चाँदी, घर के तहखाने में इतने नोटों की गड्डियाँ भरी हैं जिसे देखकर कोई भी हैरत में पड़ जाए उन्होंने  अपने फिसड्डी लड़के की भी नौकरी लगवा दी। एक वे हैं जो आलीशान जिंदगी जी रहे हैं दूसरी और मैं हूँ जो तुम्हारे साथ रहकर नारकीय जीवन जी रही हूँ अभी घर का खर्च मुश्किल से चल रहा है फिर जब तुम रिटायर हो जाओगे तब खर्च कैसे चलेगा मैं तो यह सोच के ही काँप जाती हूँ जिस दिन उनका एक्सीडेंट हुआ उस दिन उनके परिवार के लोगों ने उन्हें खूब बेइज्जत किया था। वे खाना तक नहीं खा सके थे हेलमेट पहनना भी भूल गए थे दुखी मन से ऑफिस जा रहे थे एकाएक सामने तेजगति से एक ट्रक आ गया वे गाड़ी सम्भाल नहीं पाए और ट्रक की चपेट में आ गए जिससे उनका करुण अंत हो गया। वे सुबह अच्छे भले घर से निकले थे और शाम को उनकी  लाश घर पर आई थी उनके मरने का उनके परिवार को कोई दुख नहीं था। सभी दुखी होने का दिखावा कर रहे थे और मन ही मन हिसाब लगा रहे थे कि शासन से कितना रुपया मिलेगा। धीरज के अंतिम संस्कार के समय नीतेश ने अनुकंपा नौकरी के प्रयास किए जिनसे उसे नौकरी मिल गई नीतेश की मम्मी को भी अच्छी खासी रकम मिल गई थी। इसके अलावा पेंशन भी मिल रही थी। नीतेश की नौकरी कमाऊ विभाग में लगी थी नीतेश कोई अपने पिता धीरज जी की तरह ईमानदार तो नहीं था  इसलिए वो नंबर एक का रिश्वतखोर हो गया था अब उसके पास भी खूब दौलत थी पिता के निधन के पाँच सालों में ही घर का काया कल्प हो गया था। धीरज जी को कोई याद नहीं करता था साल में एक बार उनकी बरसी  पर उन्हें याद कर लिया जाता था बाकी पूरे साल सब अपने आप में मशगूल रहते थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

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