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कहानी: सादगी

राधेलाल जी के पुत्र संदीप जिसने एम बी ए किया था। कि  शादी हुए पाँच वर्ष बीत गए थे संदीप की अपनी कंपनी थी जिसके कारण उसकी धनवानों में गिनती होती थी संदीप की पत्नी सुरेखा  कंपनी की सेक्रेटरी का कार्य करती थी तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर  में भी शामिल थी।राधेलाल जी ने संदीप की शादी अत्यंत सादगी से की थी तथा जो  रुपये बचे थे उससे तथा और पास की पूँजी मिलाकर ये कंपनी खोली थी जिसने पाँच सालों में उन्हें धन कुबेर बना दिया था आज संदीप ने अपनी बेटी ऋचा का तीसरा जन्म दिन भी सादगी से मनाया था इस अवसर पर चैरिटी अस्पताल को दस लाख के चिकित्सा उपकरण दान किए थे। जन्मदिन के समारोह में फिजूल खर्ची करते तो इससे अधिक रुपये खर्च करने के बाद भी कोई न कोई कमी रह ही जाती।
जब संदीप ने एम बी ए किया था तभी उसका एक कंपनी में प्लेसमेंट हो गया था अठारह लाख रुपय सलाना पर दो साल संदीप को उस कंपनी में कार्य करते हो गए थे इस दौरान उसने अच्छी तरह जान लिया था कि कंपनी जितना उन्हें वेतन देती है उससे कई गुना खुद का लाभ उठाती है। राधेलाल जी भी सेवानिवृत हो गए थे और वे संदीप की शादी धूमधाम से करना चाहते थे। उसी दौर में सुरेखा के पिता रिश्ता लेकर आए थे वे शहर के प्रतिष्ठित गल्ला व्यापारी थे। वे भी भव्य विवाह समारोह आयोजित करने के पक्ष में थे। दोनों पक्षों ने मिलकर हिसाब लगाया तो बारह करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे फिर भी उसमें वो भव्यता नहीं आ पा रही थी जो वे चाहते थे राधेलाल जी संदीप के सामने इसी बात की चर्चा कर रहे थे तभी संदीप ने कहा पापा विवाह समारोह में बारह करोड़ रुपये खर्च करने से मिलेगा क्या जो वाहवाही मिलेगा उससे होगा क्या कुछ दिनों में लोग इसे भी भूल जाएँगे तो राधेलाल जी बोले ऐसा थोड़ी होता है शादी विवाह कोई रोज रोज थोड़ी होते हैं। समाज में अपनी शान बढ़ाने के लिए ये सब करना बहुत जरूरी है। इस पर संदीप ने कहा ये झूठी शान से सच्ची शान तो तब है जब आपका खुद का बड़ा बिजनिस हो आपसे कई लोगों को रोजगार मिल रहा हो इस पर संदीप के पिता बोले आखिर तुम चाहते क्या हो तब संदीप ने कहा मैं अभी नौकरी कर रहा हूँ जिसका मुझे हर माह निश्चित वेतन प्राप्त हो रहा है अगर में नौकरी करता रहा तो नौकर बनकर ही रह जाऊँगा मैं अपनी कंपनी खोलना चाहता हूं इसके लिए कम से कम मुझे पंद्रह करोड़ रुपये की आवश्यकता है बाकी बैंक का लोन मिल जाएगा राधेलाल जी को संदीप की बातों में दम नजर आया। उन्होंने सुरेखा के पिता से बात की पहले तो वे राधेलाल जी बात से सहमत ही नहीं हुए। पर पूरी बात समझ में आने के बाद उन्होंने दो दिन का समय माँगा इस बीच उन्होंने अपने भाई बंधुओं से तथा परिवार से बात की आखिर सभी मान गए छः छः करोड़ रुपये राधेलाल जी और सुरेखा जी के पिताजी ने दिए तीन करोड़ रुपये व्यवहार में एकत्रित हुए इस तरह पूरे पंद्रह करोड़ रुपये संदीप और सुरेखा के संयुक्त खाते में ट्रांसफर कर दिए। सुरेखा संदीप जैसा समझदार और जिम्मेदार पति पाकर बहुत खुश थी। संदीप ने उन पैसों से कंपनी खोल ली थी  दो साल बाद ऋचा का जन्म हुआ उसके जन्म के बाद इन तीन सालों में कंपनी बहुत ऊँचाई पर पहुँच गई थी, संदीप और सुरेखा की सफलता पर दोनों के माता पिता तथा उनके परिजन गौरव करते थे। वे समाज में एक उदाहरण बन गए थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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