आजकल हर दूसरा आदमी आपको उपदेश देता हुआ नजर आएगा सबकी फिलासफी अलग अलग दिखेगी उपदेश देते हुए वो अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करेगा इनमें अधिकतर%उपदेशक वो होंगे जिनके उपदेश दूसरों के लिए हैं वे उपदेश उनके अपने लिए नहीं ऐसे ही एक उपदेशक दान और त्याग की महिमा बता रहे थे इसके समर्थन में कई प्रकार के उदाहरण दे रहे थे। दृष्टाँतों का भी सहारा ले रहे थे । फिर कहने लगे दान सुपात्र को देना चाहिए फिर बोले यहाँ उनसे बड़ा कोई सुपात्र नहीं है । उनके शिष्यों की बड़ी संख्या थी कार्यकर्ता समर्पित थे। वे लोगों से संपर्क कर उन्हे अधिक से अधिक दान देने के लिए प्रेरित करते थे उनके उपदेश सात दिन चले सातवे दिन उनके शिष्य बनने वालों की भीड़ लग गई सबसे उन्होने दो दो लाख रुपये लिए थे इसके अलावा बहुत सा कीमती सामान था जेवर भी थे मँहगे कपड़े थे। दान पेटियों से इतना रुपया निकला था जिसे गिन पाना मुश्किल हो रहा था । उपदेशक जी का खुद का प्राइवेट जेट था करोड़ों रुपया बैंकों में जमा था । इसके बाद भी उनके धन एकत्रित करने की भूख मिटी नहीं थी। एक दिन उनके पंडाल में एक साधारण सा आदमी आरती की थाली लेकर%आ गया लोग उसकी थाली पर रुपया चढ़ाने लगे यह खबर उनके सेवकों तक पहुँची वे उन्हें उपदेशक जी के पास ले गए उन्होंने सेवकों से कहा इसे ले जाओ और अच्छे से समझा दो कधित उसको ने बेरहमी से मारा उसके सारे पैसे छीन लिए थे जो उसके पास के रुपये थे वो भी ले लिए उसके कपड़े फाड़ दिए। और कार में बहुत देर ले जाकर सुनसान में छोड़कर भाग गए। बेरहमी से पिटाई के कारण वो बेहरा हो गया था टाँग टूट गई थी दिमागी संतुलन बिगड़ गया था वो किसी को कुछ बताने की स्थिति में नहीं था सड़क पर घिसट के चल रहा था और जो उसे लोग खाने को देते वो खाकर अपना पेट भर रहा था इधर उपदेश वी वी आई पी बन गए थे अंगरक्षकों से घिरे रहने लगे थे। आम लोगों से नहीं मिलते थे उन्हीं लोगों से मिलते थे जो अतिविशिष्ट होते थे और उन्हें लाखों रुपयों का दान देते थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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