सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: दूसरों को उपदेश देने वाले

आजकल हर दूसरा आदमी आपको उपदेश देता हुआ नजर आएगा सबकी फिलासफी अलग अलग दिखेगी उपदेश देते हुए वो अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करेगा इनमें अधिकतर%उपदेशक वो होंगे जिनके उपदेश दूसरों के लिए हैं वे उपदेश उनके अपने लिए नहीं ऐसे ही एक उपदेशक दान और त्याग की महिमा बता रहे थे इसके समर्थन में कई प्रकार के उदाहरण दे रहे थे। दृष्टाँतों का भी सहारा ले रहे थे । फिर कहने लगे दान सुपात्र को देना चाहिए फिर बोले यहाँ उनसे बड़ा कोई सुपात्र नहीं है । उनके शिष्यों की बड़ी संख्या थी कार्यकर्ता समर्पित थे। वे लोगों से संपर्क कर उन्हे अधिक से अधिक दान देने के लिए प्रेरित करते थे उनके उपदेश सात दिन चले सातवे दिन उनके शिष्य बनने वालों की भीड़ लग गई सबसे उन्होने दो दो लाख रुपये लिए थे इसके अलावा बहुत सा कीमती सामान था जेवर भी थे मँहगे कपड़े थे। दान पेटियों से इतना रुपया निकला था जिसे गिन पाना मुश्किल हो रहा था । उपदेशक जी का खुद का प्राइवेट जेट था करोड़ों रुपया बैंकों में जमा था । इसके बाद भी उनके धन एकत्रित करने की भूख मिटी नहीं थी। एक दिन उनके पंडाल में एक साधारण सा आदमी आरती की थाली लेकर%आ गया लोग उसकी थाली पर रुपया चढ़ाने लगे यह खबर उनके सेवकों तक पहुँची वे उन्हें उपदेशक जी के पास ले गए उन्होंने सेवकों से कहा इसे ले जाओ और अच्छे से समझा दो कधित उसको ने बेरहमी से मारा उसके सारे पैसे छीन लिए थे जो उसके पास के रुपये थे वो भी ले लिए उसके कपड़े फाड़ दिए। और कार में बहुत देर ले जाकर सुनसान में छोड़कर भाग गए। बेरहमी से पिटाई के कारण वो बेहरा हो गया था टाँग टूट गई थी दिमागी संतुलन बिगड़ गया था वो किसी को कुछ बताने की स्थिति में नहीं था सड़क पर घिसट के चल रहा था और जो उसे लोग खाने को देते वो खाकर अपना पेट भर रहा था इधर उपदेश वी वी आई पी बन गए थे अंगरक्षकों से घिरे रहने लगे थे। आम लोगों से नहीं मिलते थे उन्हीं लोगों से मिलते थे जो अतिविशिष्ट होते थे और उन्हें लाखों रुपयों का दान देते थे। 


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...