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व्यंग्य : मन के गुलाम

वैसे तो सबके लिए अवसरों की समानता है। फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो उपलब्ध अवसरों का लाभ उठा लेते हैं। जिसका लाभ उन्हें जीवन भर मिलता रहता है। और कुछ लोग अवसरों को गँवा देते हैं जिसका पछतावा उन्हैं जिंदगी भर रहता है।अवसर का लाभ वे इसलिए भी नहीं उठा पाते क्योंकि वे मन के गुलाम होते हैं।
व्यक्ति जब किसी कार्य की शुरूआत करता है तो इसके पहले उसके मन में विचार उठते हैं । कुछ विचार ऐसे हैं जो आते हैं और बिना कुछ प्रभाव जोड़े चले भी जाते हैं इनकी संख्या सैंकड़ों में हो सकती है। लेकिन कुछ विचार बार बार आते हैं जिनमें तीव्रता होती है। जिनसे विवश होकर व्यक्ति विचार के अनुरूप काम करना शुरू करता है योजना बनाता है लोगों से मिलता है। साधन सुविधा जुटाता है। और कार्य प्रारम्भ करता है तथा सफलता प्राप्त कर जीवन भर इसका लाभ उठाता है। 
दिनेश और,राकेश ने एक साथ बी कॉम किया था तब वे बिजनेसमेन बनने के सपने देखा करते थे। दोनों के पिता नौकरी करते थे। पास होने के बाद उनके सामने बेरोजगारी की समस्या थी। दिनेश ने पिता के कहने पर एक प्राइवेट सकूल में नौकरी कर ली थी।मगर राकेश व्यापार करना चाहता था उसके पिताजी इस पक्ष में नहीं थे वे भी उसे नौकरी करने की सलाह दे रहे थे। मगर राकेश ने कम पूँजी से फुटपाथ पर दुकान लगाना शुरू की सबने उसकी खिल्ली उड़ाई फिर ठेले पर दुकान लगाने लगा। उसके पिता उसे खूब लज्जित करते थे तभी अस्पताल चौराहे पर नगर पालिका की दुकानों की नीलामी हो रही थी तीस साल पहले राकेश ने वो दुकान मात्र साठ हज़ार में खरीदी थी । आज उसकी कीमत दस करोड़ थी राकेश ने कुछ समय बाद उससे लगी हुई दुकान भी खरीद कर रेस्टोरेंट खोल लिया था जो शहर का सफसे अच्छा रेस्टोरेन्ट था। उस समय पैसे दिनेश के पास भी थे मगर उसने व्यापार में रुचि नहीं ली वो अब भी प्राइवेट सकूल में पढ़ा कर अभावों मे जी रहा है जबकि राकेश रोटरी क्लब का अध्यक्ष है और शानदार जीवन जी रहा है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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