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व्यंग्य : गढ़ा धन

धन कमाने की अंधी दौड़ ने इंसान का पूरी तरह से नैतिक पतन कर दिया है। धन और पद को पाने के लिए लोग किसी भी हद से गुजरने में जरा भी संकोच नहीं करते इसका फायदा वे लोग उठाते हैं जो खुद को बड़ा तांत्रिक होने का दावा करते हैं ये ऐसे धन लोलुप व्यक्ति से संपर्क करते हैं।
फिर उस पर अपना प्रभाव जमाते हैं इसके बाद कहते हैं कि मैं रातों रात तुम्हें संसार का सबसे अधिक धनवान व्यक्ति बना सकता हूँ । और फिर किसी खंडहर के पास ले जाकर कहेंगे कि यहाँ इतना खजाना दबा है कि सोने चाँदी हीरे जवाहरत से कई ट्रक भर जाएँ । और फिर पूजा अनुष्ठान के नाम पर वो कथित तात्रिक धन हडपना शुरू कर देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक वो बर्बाद हो चुका होता है और यह फिर किसी दूसरे शिकार को पकड़ लेते हैं इस तरह उनकी दुकानदारी चलती रहती है। और लुटा पिटा व्यक्ति कई वर्षों तक सम्हल नहीं पाता।  
अनिल और सुनील दोनों बचपन के दोस्त थे अनिल कर्मठ था और सुनील भाग्यवादी अनिल अपनी कर्मठता और जुझारूपन तथा कठोर,परिश्रम से धनवान हो गया और सुनील गढ़े धन को पाने के फेर में कथित तांत्रिकों के फेर,में पड़ गया जिसमें उसकी जमा पूँजी सारी खर्च हो गई। विरासत में मिली दुकान और व्यवसाय ठप्प हो गया एक रात वो खंडहर मे गढ़े धन की चाह में खुदाई कर रहा था उसके साथ कथित तांत्रिक सहित और भी चार लोग थे अचानक उसे साँप ने डँस लिया उसके मुँह से झाग निकलते देख सब उसे तड़फता छोड़कर भाग खड़े हुए उसने तड़फ तड़प कर वहीं प्राण त्याग दिए सुब्ह पुलिस को उसका शव मिला। इस तरह उसका करुण अंत हो गया। ऐसे अनेक उटाहरण होने के बावजूद भी लोग गढ़े धन के लोभ में अपना समय और धन बर्बाद कर रहे हैं फिर भी उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हो रहा है।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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