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व्यंग्य: मतलबी की तारीफ़

मतलबी इंसान अगर किसी की तारीफ कर रहा तो वो तारीफ अक्सर झूठी ही होती है। अगर वो इंसान ऐसी तारीफ करे तो सुनने वाले को सतर्क हो जाना चाहिए। क्योंकि वो आपकी तारीफों के पुल बाँधकर अपना मतलब तो हल कर लेगा लेकिन आपको गहरी परेशानी में डाल देगा।
जो अभिमानी लोग होते हैं वे अपनी तारीफ सुनना खूब पसंद करते हैं वैसे तो अपनी तारीफ़ किसे अच्छी नहीं लगती। मगर अभिमानी आदमी तो हमेशा अपनी तारीफ सुनना ही पसंद करते हैं। ऐसः लोग खुद अपनी भी तारीफ करते हैं। और जो उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं वे उनके कृपापात्र बन जाते हैं। जो उनकी तारीफ नहीं करते उनकी तरफ वे ध्यान नहीं देते। ऑफिस में बड़े साहब वर्मा जी ऐसे ही इंसान थे वे भ्रष्ट थे और चापलंसों से घिरे रहते थे। उसी ऑफिस में मोहन बाबू भी काम करते थे वे अपना काम ईमानदारी से करते थे और किसी की अपने मतलब के लिए वे कभी झूठी तारीफ नहीं करते थे मोहन जी ने देखा कि बड़े साहब रिश्वत के लोभ में तथा चापलंसों के कहने में ऐसा कदम उठाने जा रहे हैं जो उनके लिए घातक सिद्ध हो सकता है। मोहन बाबू ने उन्हें समझाया तो बड़े साहब उनसे ही नाराज होकर। आखिर वो काम उन्होंने किया जिसके परिणाम स्वरूप वे सस्पेण्ड हो गए। जुर्म साबित होने पर उन्हें सजा हुई और अब जेल की हवा खा रहे हैं। उनकी झूठी तारीफ करने वाला उब कोई नहीं। अब वे पावरलेस हैं इसिलिए महत्वहीन हैं। अब पछतावा करने से भी कुछ होने वाला नहीं है। मतलबी तो बिना मतलब के किसी की तारीफ करते नही हैं। और मतलब हल होने के बाद फिर मुड़कर भी देखते नहीं है । ऐसे लोगों की तो दम भरना ही बेकार है क्योंकि ये मुसीबत में कभी काम नहीं आते।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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