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व्यंग्य : भूलने की कला

कुछ समय पहले तक भूलने को बीमारी माना जाता था बीमारी तो यह आज भी है मगर अब भूलना एक कला भी हो गई है। जिसके काम नहीं करना हो या टालना हो तब इस कला का उपयोग किया जाता है । और तब तक इसका उपयोग करना होता है जब तक कुछ भेंट पूजा नहीं हो जाए। शिक्षक रामदास जी की बेटी की शादी थी उन्हें दस लाख रुपये जीपी एफ से निकालने थे।
उन्होंने संबंधित बाबू से संपर्क किया तो वे बोले आप प्रकरण प्रस्तुत करें तीन दिन में आपका पैसा निकलवा दूँगा। रामदास जी ने तुरंत, प्रकरण प्रस्तुत कर दिया लेन देन की भी बात हो गई । रामदास जी ने विचार किया कि जब पैसे निकल जाएँगे तब इनको भी कुछ भेंट कर देंगे। यही सोच उनकी गलत थी जिसके कारण पूरे एक महीने तक उन्हे पैसा नहीं मिला बेटी की शादी सिर पर आ गई थी और बाबूजी उनकी फाइल रखकर भूल गए थे। रामदास जी ने कहा दुबारा प्रकरण प्रस्तुत कर दूँ तब बाबूजी ने कहा नहीं उस पर साहब की टीप लगी है। साहब ने बिल पास कर दिया उसकी नोटशीट भी लगी है। तब उनके साथी गौतम सर ने कहा आपने इनकी भेंट पूजा की क्या वे बोले नहीं तो फाइल कैसे मिलीगो। तब रामदास जी ने दस हजार रुपये बाबूजी को अर्पण किए तभी चमत्कार हुआ जादुई तरीके से गुमी हुई फाइल मिल गई उसी दिन बिल भी ट्रेजरी में लग गया। बाबूझी बोले शाम को आपके खाते मैं पैसा आ जाएगा। लेकिन जब दो दिन के बाद भी पैसा नहीं आया तो रामदास बेचैन हो गए इस पर बाबूजी ने कहा आपको ट्रेजरी में जाना होगा तभी पैसा निकलेगा। रामदास शादी की भागदौड़ छोड़कर ट्रेजरी आए तो पता चला बिल वहाँ अटका हुआ है । खैर तीन हजार रुपये देकर उसे वहाँ से सरकाया गया तब कहीं पैसा उनके खाते में आया रामदास जी को इस दुर्लभ अवसर पर पूरे पाँच सो रुपये उनके चायपानी नाश्ता पर खर्च करना पड़े। तब कहीं उनकी पगड़ी उछलने से बची और बेटी की शादी संपन्न हो सकी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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