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व्यंग्य : छिपे दुश्मन

आज के इस दौर में दोहरी मानसिकता वाले लोगों की संख्या ज्यादा होने के कारण खुलकर दुश्मनी करने वालों की संख्या बहुत कम है। छिपकर दुश्मनी करने वाले बहुत मिल जाएँगे जोशम हमारी असावधानी का लाभ उठाकर घात करने में ज़रा भी नहीं हिचकेंगे।
इस तरह छिपकर दुश्मनी करने वालों में हमारे खास अपने भी हो सकतः हैं जिनके विषय में हम सपने में भी अनुमान नहीं लगा सकते की हमारे सबसे बड़े दुश्मन तो यही है।
राम निवास का एक दोस्त था मुकेश राम निवास उसे सच्चा दोस्त मानता था और वो उसे अपने मन की सारी बातें बता देता था। जबकि मुकेश उसकी उन्नति से जलन रखता था तथा उससे दुश्मनी को छिपाकर रखता था। रामनिवास की बातें सुनकर वो जल भुनकर राख हो जाता था । रामनिवास का एक सगा भाई भी था प्रकाश वो भी रामनिवास से दुश्मनी रखता था। रामनिवास एक पार्टी से ट्रेड डील करने वाला था जिसमें उसे लाखों का लाभ होने वाला था। रामनिवास से चूक यह हो गई कि उसने सारी बातें मुकेश को विस्तार से बता दीं। मुकेश राम निवास के भाई से मिला हुआ था। यह बात भाई तक पहुँ च गई भाई ने वो डील कैंसिल करा दी । इस तरह की घटना जब कई बार घटी तब उसने इसके कारण की खोज को और मुकेश की करतूत देख उसे विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन बात एकदम सही थी जिससे इंकार नहीं किया जा सकता था। इसके बाद जब रामनिवास को मन की बातें बताना बंद किया तब उसे अच्छा लाभ होने लगा। इसकी भनक मुकेश को भी लग गई थी। जब मुकेश ने देखा कि उसकी दाल नहीं लगने वाली तब चहीं उसने संबंध तोड़े। इस से रामनिवास सतर्क हुआ तो पूरी तरह बर्बाद होने से बच गता। अगर वो इसे समझकर सही निर्णय नहीं लेता तो उसकी बर्बादी तो तय ही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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