आज के दिखावे के दौर में लोग चमक दमक देखकर नकली को असली समझ बैठते हैं । और फिर धोखा खाकर अफसोस तो कर लेते हैं पर अपने आप को बदलते नहीं है ।बार बार धोखा खाने के बाद भी उनमें सुधार नहीं होता।
अक्सर देखने में आता है कि गुदड़ी के लाल पर कोई ध्यान नहीं देता उनकी सोच इस बात को कभी मानने नहीं देती कि गुदडी में भी लाल हो सकता है। यः लोग उस काँच की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं जो सोने की डिबिया में मखमल में लिपटा काँच का टुकड़ा रखा होता है जिसे भरमाने के लिए तिजौरी में रखा जाता है लोग आँख बंद कर बिना कुछ सोचे विचारे उसे असली लाल समझ लेते हैं फिर उसे मँहगे दामों में खरीद कर ठगे जाते हैं।
स्कूल के दिनों की बात है एक निर्धन परिवार का लड़का था कोमल दास वो पढ़ने में तेज था पर साधन हीन था सरकारी स्कूल में पढ़ता था। उसी का हम उम्र प्रवीण भी था जो बड़े जमींदार का लड़का था शहर के सबसे मँहगे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहा था कोमलदास साधन हीन होते हुए भी आगे बढ़ता चला गया और आइ ए एस बन गया। प्रवीण की साधन संपन्नता कुछ काम नहीं आई क्योंकि वो सोने की डिबिया में रखा काँच का टुकड़ा था और कोमल दास गुदड़ी का लाल। प्रवीण की बुरी आदतों ने तथा मूर्खता ने उसे पूरी तरह कंगाल कर दिया था। कोमल दास जहाँ कलेक्टर के पद पर कार्यरत थे । वही प्रवीण एक ठेकेदार के यहाँ सुपर वायजर का काम कर रहा था साइट विजिट के समय उनका प्रवीण से सामना हुआ वो उनसे बचने का प्रयास कर रहा था अपना चेहरा छिपा रहा था वो अपने आप में ही शर्मिंदा था। ऐसा हाल उन सभी का होता है जो गुदड़ी के लाल की कीमत नहीं करते और काँच का टुकड़ा तो दो कौड़ी का भी नहीं होता भले ही उसे तिजौरी में सहेजकर रख लो।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें