सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य : अंत भला सो भला

जो जीवन में कोई कष्ट उठाना नहीं चाहते न ही संघर्ष करना उन्हें अच्छा लगता है वे जैसे तैसे अपनी जिंदगी बसर करते हैं । इसके विपरीत जो साहसी होते हैं जिनकी कुछ बड़ा करने की इच्छा होती है । जो परिश्रम करने से नहीं घबराते वे हर हाल में अपना लक्ष्य हासिल करने में जुटे रहते हैं। और अंत में वे सफल हो ही जाते हैं इसके बाद वे सफल होकर अपना जीवन गुजारते हैं इसिलिए कहा गया है कि अंत भला सो सब भला।
संघर्ष हर क्षेत्र में करना जरूरी होता है जो सफलता एक अण में मिल जाती है उसके पीछे कई वर्षों का संघर्ष होता है। बहुत से लोग ऊँचे लक्ष्य को पाना चाहते हैं शुरू में इसको पाने वालों की भीड़ लगी रहती है जो समय बीतने के बाद छँटती चली जाती है । आखिरी में कोई अकेला ही बचता है जो हर,आँधी तूफान का सामना करते हुए अविचला रहता है ।सफलता उसके ही कदम चूमती है।
तखत पुर गाँव का नीरज अपने कठोर परिश्रम और लगन के कारण आज एस डी एम के पद पर कार्यरत था। उसके ऑफिस में चपरासी की जगह खाली थी। उसके लिए आवेदन आए थे। आवेदकों में उसे एक चेहरा जाना पहचाना लगा वो उसके गाँव के सबसे संपन्न व्यक्ति का सबसे छोटा लड़का सोम प्रकाश था। जो उसका सहपाठी रहा था। उसने जैसे तैसे आठवी के बाद पढ़ाई छोड दी थी पिताजी के पास अस्सी एकड़ जमीन थी बड़ा मकान था खूब नौकर चाकर थे बड़े रौब दाब से रहता था आज वो चपरासी की नौकरी पाना चाहता था। उसने सोमप्रकाश को बुलाया और कहा तुम्हें इस नौकरी की क्या जरूरत पड़ गई वो बोला आज की इस स्थिति में हमारे पास कुछ नहीं है ।पिताजी के मरने के बाद जमीन जायदाद का बँटवारा तो हो गया पर खेती कौन करे इस लिए सबने जमीन बेचकर अपने शौक पूरे किए आज मेरे तीनों भाई झुग्गी में रहते हैं तथा मजदूरी करके अपना पेट भर रहे हैं यही हालत मेरी भी है पिछले दो साल से नारकीय जीवन जी रहा हूँ मुसीबत में कोई किसी का नहीं होता। सोम प्रकाश की बात सुनकर नीरज बहुत दुखी था पर वो और कर भी क्या सकता था। उसने इतना ही कहा कि मेरे हाथ में सिर्फ आवेदन लेकर अग्रेषित करना है। बाकी नौकरी तो चयन बोर्ड की अनुशंसा से ही मैलेगी मैं तो बस बेस्ट ऑफ लक ही कह सकता हूँ।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...