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व्यंग्य: अपने काम से मतलब रखने वाले

कुछ खुद्दार टाइप के इंसान किसी की न ख़ुशामद करते हैं न कामचोरी ये सिर्फ अपने काम से मतलब रखते हैं अपना काम ईमानदारी से करते हैं। कार्य कुशल होते हैं और कभी अपने स्वाभिमान पर आँच नहीं आने देते ।
इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हद दर्जे के काइयाँ मक्कार तथा चालाक होते हैं ये ऐन केन प्रकारण अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं इन्हें मतलब के लिए किसी की चापलूसी करने में जरा भी संकोच नहीं होता । मौका आने पर यह किसी के तलवे भी चाट सकते हैं ऐसे लोग श्रेय लूटने में सबसे आगे रहते हैं और काम करने में सबसे पीछे। बिडंबना है कि ऐसे लोग आजकल महत्वपूर्ण माने जाते हैं अपने आका के चहेते होते हैं अनुचित साधनों से खूब धन कमाते भी हैं तथा खिलाते भी है।
रस्तोगी साहब ऐसे ही खुद्दार टाइप के इंसान थे उनकी फील्ड में जॉब थी वे अपना काम अच्छे से करते थे जनता के तो वे चहेते थे पर अधिकारी उनसे खुश नहीं थे। एक बार स्थानीय मेले भें उनकी ड्यूटी लगी थी मेले में बड़े साहब ने अपने सहायक अधिकारी की भी ड्युटी लगाई थी। रस्तोगी साहब सारा काम उनके अधीनस्थ रहकर कर रहे थे । वो तो पूरे दिन कैम्प से बाहर ही नहीं निकले सारा काम रस्तोगी जी ने ही किया साहब की कोई चापलूसी नहीं की न उन को खुश करने की कोशिश साहब ने सिर्फ दस्तखत करने का काम किया डिनर पर साहब को दारू मुर्गे की दावत की उम्मीद थी मगर रस्तोगी जो ने सादा शुद्ध शाकाहारी भोजन की व्यवस्था की थी उससे वे बड़े खिन्न थे। जाते समय कोई धनराशि या कोई उपहार भी रस्तोगी जी ने साहब को नहीं दिया था। इसकी कसर उन्होंने यह निकाली की बड़े साहब से उन्होंने रस्तोगी जी की खूब बुराई की स्तोगी साहब से बड़े साहब वैसे ही खफा थे उसके पहले उनके स्थान पर जो तैनात थे वे बड़े साहब को दस किलो देशी घी पाँच किलो दाल तथा गेँहू के अलावा बारह हजार रुपया महीना भी देते थे। रस्तोगी साहब ने ऐसा नहीं किया था। बह़े साहब ने रस्तोगी जी का तबादला करा दिया था। और रस्तोगी जी सहजता से रिलीव होकर अपने पदांकित स्थान पर चले गए थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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