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व्यंग्य: फुरसत से परेशान

आज के आपाधापी भरे दौर में एक ओर जहाँ कई लोगों को फुरसत नहीं मिल रही है। दूसरी ओर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास फुरसत ही फुरसत है वे इस फुरसत से परेशान हैं उनका दिन काटे नहीं कटता दिन जैसे तैसे गुजर जाता है तो रात बड़ी लम्बी लगने लगती है। ऐसे में नींद भी आँखों से रूठ जाती है।
गुप्ता जी जिस दफ्तर%में काम करते थे वहाँ उन्हें दम भर की भी फुरसत नहीं मिलती थी। छुट्टी का दिन भी दफ्तर का काम करने में निकल जाता था वे काम की अधिकता से परेशान थे जिंदगी का अधिकाँश समय काम करते हुए बीत गया था किसी को फुरसत में देखकर उन्हें बहुत ईर्ष्या होती थी । वे सोचते कब उनकी जिंदगी में वो समय आएगा जब उनके पास फुरसत ही फुरसत होगी । आखिर एक दिन वो समय आ ही गया जब वे सेवानिवृत्त हो गए उस समय वे बड़े खुश थे तरह तरह के मनसूबे उन्होंने बना रखे थे। थोड़े दिनों तक उन्होंने फुरसत का आनंद लिया पर ठल्दी ही उन्हें ऊब होने लगी। बड़ा घर था लड़का अमेरिका में था उसने वहीं शादी कर ली थी। बेटी की भी शादी हो गई थी वो देहरादून में रहकर जॉब कर रही थी । उसे भी फुरसत नहों मिलती थी। इतने बड़े घर में बस वो और उनकी पत्नी रह रही थी काम के कारण वैसे ही उनकी पत्नी से बहुत कम बात होती थी अब भी यही हाल था। वो भी बस काम की बात करती बिल्कुल सीमित शब्दों में। वे अपनी इस फुरसत से परेशान हो गए थे। वे फिर से काम करना चाहते थे लेकिन अब आँखों से कम दिखता था हाथ पैर काँपते थे इस लिए जैसे तैसे अपना समय काट रहे थे। उनके आस पास ऐसा कोई नहीं था जो उनकी तरह पूरी तरह फुरसत में हो जिससे वे दोस्ती चर के अपनी बातें साझा कर सकें।



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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