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व्यंग्य : नए साल का जश्न

कई कड़वी मीठी यादें छोड़कर पच्चीस जा रहा है और अनेक नई उम्मीदें संभावनाओं को लिए नया वर्ष आ रहा आने वाले वर्ष का स्वागत भी लोग उसी जोश और उत्साह के साथ कर रहे हैं जिस उत्साह से उन्होंने जाने वाले वर्ष का गत वर्ष किया था।अब पच्चीस कभी लौटकर नहीं आएगा अब वह अतीत बनने वाला है।
नया वर्ष हर वर्ग के लोग मना रहे हैं गरीब से गरीब भी और%अमीर से अमीर भी दिहाड़ी मजदूर धनी राम दो दिन की छुट्टी लेकर आया हैं नए साल का जश्न मनाने के लिए दो दिन की छुट्टी में उसे आठ सौ रुपये का तो दिहाड़ी का नुक्सान होगा और ढाई हजार रुपये जश्न मनाने में खर्च हो जाएँगे । यह रकम चार सौ रुपये रोज कमाने वाले के लिए बड़ी रकम है। जिसकी भरपाई बड़ी मुश्किल से होगी लेकिन धनीराम को इसकी चिंता नहीं धनीराम ने जो कर्ज लिया है उसका ब्याज दे रहा है उसे इसकी भी चिंता नहीं है दूसरी और शहर के प्रसिद्ध रेस्टोरेंट के मालिक अनूप जी रात दिन काम कर रहे हैं । नए वर्ष के लिए उन्होंने अपने रेस्टोरेन्ट में खास इंतजाम किए हैं पिछली बार उन्होंने पूरे सोलह लाख रुपये कमाए थे इस बार बीस लाख रुपये कमाने का लक्ष्य था जिसे पूरा करने के लिए वे रात दिन काम कर रहे थे। और गरीब आदमी मजे से नया वर्ष मना रहा था। कुछ लोगों की सोच इनसे अलग थी । उनका कहना था कि भारती नववर्ष तो चैत्र प्रतिपदा से है । यह हमारा नया वर्ष थोड़ी है । ये तो विदेशियों का नया वर्ष है । उनके सघन प्रचार प्रसार का आम आदमी पर कोई असर नहीं पड़ रहा है उसने तो विदेशी नववर्ष को अपना लिया था और वे धूमधाम से इसे मना रहे थे। तथा एक दूसरे को नए वर्ष की बधाई भी दे रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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