सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यंग्य: कड़वी बात कहने वाले

कुख बातें ऐसी भी होती हैं जो सुनने में बहुत कड़वी लगती है । लेकिन उनमें हमारा हित निहित रहता है। जबकि जो बाते मीछी होती हैं वो हमारे लिए हानिकारक भी हो सकती हैं। कुछ लोग आदतन कड़वी बात करने वाले होते हैं वे बिना किसी लाग लपेट के कड़वी बात कह देते हैं किसी को बुरा लगे या भला इसकी उन्हें परवाह नहीं होती। उनकी वो बातें तब अच्छी लगने लगती हैं जब उनके परिणाम हमारे सामने आते हैं।
एक ऑफिस में कार्यरत रमेश बाबू अपने बचपन के दिनों की बातें करते हुए अक्सर लखन चाचा को जरूर याद करते हैं वो बताते हैं कि आज उनकी बदौलत ही वो इस मुकाम पर हैं अन्यथा वो भी खेतिहर मजदूर बनकर अपना जीवन यापन कर रहे होते। उनके पिताजी मजदूर थे उनके पिताजी ने लखन चाचा के कहने पर ही उनका नाम सरकारी स्कूल में दर्ज कराया था उनके घर के पास ही खूबीलाल ताऊ रहा करते थे वो बड़ा मीठा बोलते थे। जरा सा लोभ दिखाकर बहुत सा काम कराते थे। मैं जब स्कूल जाते तो उन्हें बुरा लगता था वो कहते क्या करेगा स्कूल जाकर । काम तो तुझे खेतों में ही करना है। लखन चाचा और उनकी इस बात को लेकर झड़प हो जाती थी। आठवीं पास करके वे पढ़ाई छोड़ने वाले थे पर लखन चाचा के जोर देने पर उनका हाईस्कूल में दाखिला हुआ हाई स्कूल के बाद रमेश बाबू की उम्र अठारह साल की हो गई थी उनके पिता ने उनका खर्च उठाने से इंकार कर दिया था। तब लखन चाचा ने शहर में गुप्ता जी वकील के ऑफिस में उन्हें काम दिला दिया था वहाँ काम करते हुए उन्होंने हायर सेकेण्डरी की परीक्षा पास की इसके साथ ही टाइपिंग की परीक्षा भी पास कर ली तब चुनाव के समय कलेक्ट्रेट ऑफिस में अस्थाई नौकरी पर उन्हें गुप्ता वकील जी ने रखवा दिया। चुनाव के बाद भी उनके काम को देखते हुए उन्हैं नहीं हटाया गया उसी नौकरी पर वे परमानेंट हो गए। और आज उसी नौकरी के कारण वे सुख से रह रहे थे। यहो कारण था कि वे लखन चाचा की कड़वी लेकिन हितकर बातों की चर्चा अक्सर किया करते थे। और उनका अहसान मानते थे।


*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...