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व्यंग्य: स्वभाव से कुटिल

हमारे आसपास ऐसे बहुत से लोग मिल जाएँगे जो स्वभाव से कुटिल होते हैं ये कुटिलता उनकी आदत में शामिल हो जाती है इसके लिए उन्हें प्रयास नहीं करना नड़ते न ही कुछ सोचना समझना पड़ता है। इन्हें किसी का भला करना नहीं सुहाता। यह किसी को मिटते हुए देखकर बहुत खुश होते हैं किसी की सफलता इन्हें बिल्कुल हजम नहीं होती। अगर कोई अपनी सफलता की खुशी बाँटने इनके पास मिठाई का डिब्बा लेकर आ जाए तो वो मिठाई उन्हें नीम से भी अधिक कड़वी लगती है। 
ऐसे लोग झूठी सहानुभूति दिखाने में बड़े माहिर होते हैं किसी के यहाँ कुछ बुरा हुआ हो तो ये अपनी खुशी दबाकर उसके पास झूठी सहानूभूति जताने पहुँच जाते हैं फिर खोद खोद कर उससे सारी बातें मालूम करके मन ही मन खुश होते हैं।
शर्मा जी के लड़के की शादी का रिसेप्शन था केटरर को बारह सौ रुपये थाली के हिसाब से पेमेण्ट करना था। भोजन अच्छा था इंतजाम भी अच्छे थे। लेकिन इससे उनका जीजा दिलीप खुश नहीं था वो कुटिल था जलन के मारे उसका बुरा हाल था उसने तीन चादर फाड़ दिए थे दो कुर्सी तोड़ दी थीं और दस थाली में खाना लेकर उसे डस्ट बिन में फेंक दिया था ।इसके बाद भी उसके मन को संतोष नहीं हुआ तो जरा सी बात पर उसने बहुत बड़ा हंगामा कर दिया। दूल्हे वाला कमरा उसके कब्जे में था दूल्हा हाल में बैठा हुआ था । जरा सी बात पर उसने एक वेटर को जोर से थप्पड़ मार दिया फिर दूल्हे के पिता से लड़ाई करने लगा। वो वेटर भी कम नहीं था स्थानीय था उसने देखते ही देखते चालीस पचास बदमाश बुला लिए जो राड हाकी स्टिक चाकू कट्टा लेकर दिलीप की खोज करने लगे यह देखकर दिलीप के होश गुम हो गए शर्मा जी ने जैसे तैसे दिलीप को वहाँ से बाहर निकाला फिर उसे शहर से ही बाहर कर दिया अन्यथा आज दिलीप की सारी हेकड़ी निकलने वाली थी। इससे क्या दिलीप की अक्ल ठिकाने आ गई ।कतई नहीं वो स्वभाव से कुटिल था और कुटिलता उसकी नस नस में भरी हुई थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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