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व्यंग्य: दकियानूसी सोच

कभी कभी ऐसा देखने में आता है कि जो पढ़ लिखे लोग हैं उच्च शिक्षित हैं बड़ी नौकरी कर रहे हैं उनकी सोच भी दकिया नूसी है । उनमें से कुछ जातिवादी मानसिकता वाले भी होते हैं इनके विचारों को सुनकर कोफ्त होती है। ऐसे लोग पाखंडियों के जाल में आसानी से फँस जाते हैं जो पूजा और अनुष्ठान के नाम पर अच्छी खासी रकम इनसे ऐंठ लेते हैं।
ऐसे ही एक पाख॔डी रितेश सर से मिला बोला दो दिन से कुछ खाया नहीं है दो सौ रुपये दे दो हमें भोजन कराओगे तो मालामाल हो जाओगे । रितेश वैसे तो ऊँची पोस्ट पर थे लेकिन भीतर से पूरी तरह दकियानूसी पाखंडी ने उन्हें पूरी तरह भाँप लिया था। बोला आजकल बड़ी परेशानी में चल रहे हो सारे काम रुके हुए हैं धन की आवक कम है खर्च ज्यादा है कुछ अपनों ने साथ छोड़ दिया है कुछ ने धोखा दे दिया है। जीवन साथी से भी अनबन चल रही है। रितेश जी इतना सुनते ही उस पाख॔डी को अंतर्यामी समझ बैठे। बोले आप तो बड़े पहुँचे हुए हैं इसका कोई उपाय है । वो बोला बीस हजार रुपये खर्च होंगे। मैं हिमालय से एक बूटी लाया हूँ। इसको घर में रखते ही चमत्कार हो जाएगा तुम्हारी सारी समस्या हल हो जाएँगी। रोहित सर राजी हो गए ए टी एम से पैसे निकालकर उन्होंने उस पाखँडी को दे दिए । उसने अपनी झोली में से आसपास से ही लाई गई कोई जड़ी बूटी निकाली और कपड़े की छोटी थैली में बंद करके दे दी और फौरन वहाँ से गायब हो गया जाते जाते कह गया कि ये थैली खोलकर किसी को मत दिखाना रितेश जी के रुपयों पर उसने दस दिन तक मजे किए खूब नॉनवेज खाया शराब पी गाँजा पिया इसके साथ और भी बहुत कुछ किया ।जब रितेश जी की एक भी समस्या हल नहीं हुई तो वे समझ गए उन्हें उस पाखंडी बुरा ठगा है। यह बात उनूहोंने वर्मा जी से कही। वर्मा ने थैली ले ली और कहा इसमें ऐसा कुछ नहीं वे जब थैली खोलने लगे तो रोहित सर बोले ऐसा मत करना नहीं तो बहुत बड़ा अनिष्ट हो जाएगा। वर्मा जी बोले कुछ नहीं होग । थैली में पास के जंगल की एक झाड़ी की पत्तियाँ थीं उसी की जड़ें थीं। वर्मा जी ने उन्हें ऐसी कई झाड़िया दिखा भी दीं। रोहित सर ने इस बार भी ठगे जाने के बाद अपना दकियानूसीपन नहीं छोड़ा था।


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रचनाकार
प्रदीप चश्यप

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