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व्यंग्य : कोई चहेता कोई उपेक्षित

वेसे तो कायदे की बात यह है कि माता पिता को अपनी सभी संतानों से एक सा बर्ताव करना चाहिए उनमें से किसी को कम नहीं समझना चाहिए सबको समान लाड़ प्यार देना चाहिए। परंतु अक्सर ऐसा होता नहीं है कोई संतान तो माता पिता की चहेती होती है और कोई उपेक्षा की शिकार। जिसे ठीक नहीं कहा जा सकता फिर भी ऐसा होता है और ऐसा कोई सौतेला नहीं करता बल्कि सगे माँ बाप ही ऐसा करते हैं जिसकी किसी से शिकायत भी नहीं की जा सकती ।
जैसे किसी के तीन बच्चे हैं जिसमें दो बेटे और एक बेटी बेटी तो पिता की लाड़ली है और एक बेटा माँ का लाड़ला और जो सीधा सरल सबसे सज्जन बेटा है वो दोनों की उपेक्षा का शिकार है। जबकि उसका जब जन्म हुआ तब पूरा घर ख़शियों से भर गया था लेकिन दूसरे बेटे के जन्म के बाद उसे पूरी तरह उपैक्षित कर दिया गया उसे प्रताड़ना भी दी जाने लगी और जो चपल चालाक स्वार्थी है वो माँ का लाड़ला बन गया। जो माँ बाप की उपेक्षा के शिकार होते हैं वे बाहर बड़े लोकप्रिय होते हैं । और,अपने जीवन में सफल भी होते हुए देखे गए हैं।
कुछ इसी तरह का हाल रवि का भी हुआ उसके अपने ही भाई मोहित ने उसका हक छीन लिया वो माँ बाप का लाड़ला था और रवि उपेक्षित रवि को सरकारी स्कूल में पढ़ाया गया और मोहित को प्राइवेट में दसवीं के बाद रवि को पिताजी ने आगे पढ़ाने से इंकार कर दिया। और खेती के काम में लगा दिया जब उसने विरोध किया तो उसे घर से निकाल दिया रवि ने अकेले रहकर पार्ट टाइम काम कर अपनी पढ़ाई पूरी की। और सरकारी अफसर बन गया। जबकि मोहित आवारा बदमाश निकला अपराध कर जेल जाने लगा। माता पिता की सारी जमीन जायदाद बिकवा दी और उन्हें सड़क पर ला दिया। रवि को तो यह कहकर घर से निकाला था कि अब कभी अपना मुँह मत दिखाना एक दिन दोनों माँ बाप गाँव छोड़कर जाने कहाँ चले गए रवि जो उनके हाल जानने आया तो गाँव में कुछ भी नहीं मिला मकान जमीन जायदाद दूसरॅ ने खरीद ली मोहित का पता चला कि वो जेल में है। माँ पिता का पता नहीं चल सका कि वे कहाँ हैं। रवि उदास मन लिए वापस शहर,लौट आया और वो कर ही क्या सकता था। माँ का लाड़ला तो पूरी तरह बिगड़ गया थे और जो परिवार का नाम रोशन कर रहा था उसे तो धक्का मारकर पहले ही घर से निकाल दिया गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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