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व्यंग्य: सुख की चाह में

सुख की चाह किसे नहीं होती ।हर आदमी दुख से उबरकर सुख पाना चाहता है। सुख की इस चाह के कारण  ही साधन और सुविधाओं का विकास हुआ है।
इसके बाद भी आज का आदमी सुखी क्यों नहीं निरोगी क्यों नहीं है। यह सोचने वाली बात है आज का परेशान हाल आदमी जब पुराने जमाने की बातें लोगों से सुनता है तो उसे बहुत हैरत होती है । पहले इंसान सीमित साधन होते  हुए भी  बेहद सुखी और संतुषट था   जबकि आज इंसान के पास सुविधाओं के साधनों की भरमार है। लेकिन  आज का इंसान  फिर भी सुखी नहीं न ही खुश हे।  इतने साधन होने के बाद भी उसके पास सुख की कमी है। रात में उसे नींद नहीं आती और दिन में खुद बैचैन रहता है।  उसके दुख में हिस्सा बँटाने वाला कोई नसीं रहता।
सुभाष की पढ़ाई लिखाई परवरिश  छोटे से कस्बे  में हुई थी । जहाँ सब लोग एक दूसरे को अच्छी  तरह  से जानते थे दूसरे के सुख दुख में काम आते थे। तथा मदद भी करते थे। वही सुभाष  की नौकरी शहर में लगी थी और वो यहाँ आ गया था। एक रात उसके घर चोर घुसे  कॉलोनी भरी हुई थी सुभाष ने  मदद की जोर जोर से गुहा लगाई वेकिन कोई मदद को आगे नहीं आया।। उसने उसकी पत्नी ने ही उनका सामना किया । जिसमें वे बुरी तरह  से जख़्मी भी हो गए थे। फिर भी उनके हाल पूछने वाला कोई नहीं था। उन्हें अपने गाँव की  बहुत याद आ रही थी इसके बाद भी वो शहर में रहने को विवश थे। वे अपने आप को सम।झा रहे  थे ।  क्योंकि अच्छी भली नौकरी को छोड़कर  उनका गाँव जाना बिल्कुल ठीक नहीं था।  गाँव में उनके जैसा काम भी तो  नहीं था और खेतिहर मज़ूदंर बनकर गाँव में रहना  उन्हें बिल्कूल मंजूर  नही था।


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रचनाकार
प्रदीप  कश्यप

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