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व्यंग्य: आत्ममुग्धता

आपको ऐसे बहुत से लोग मिल जाएगे जो आत्म मुग्धता से परिपूर्ण रहेंगे ये अपनी प्रशंसा अपने ही मुँह से करेंगे याकि अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनेंगे। अपने सामने ये किसी ओर की प्रशंसा सहन नहीं कर सकेंगे इनकी कोई कितनी भी तारीफ करेगा तब भी इनका मन नहीं भरने वाला ऐसे लोग हद दर्जे के अहंकारी होते हैं।
आत्ममुग्ध लोग मीन मेख निकाले बिना रह ही नहीं सकते यह अपने आसपास चापलूस लोगों को देखना पसंद करेःगे जो इनकी खूब चापलूसी करे और इनकी प्रशंसा करे। यह किसी से बात भी करेंगे तो उसे बोलने का मौका ही नहीं देंगे अपनी सारी भड़ास निकालने के बाद उसे बोलने का अवसर दिए बिना ही निकल जाएँगे। खुशामदी लोग इनसे खूब लाभ उठाएँगे। इनको किसी का काम पसंद नहीं आएगा चाहे वो इनके काम से कई गुना बेहतर ही क्यों न रहा हो।इनको तो परिस्थतियाँ ही सुधार सकती हैं। जब यह किसी संकट में घिर जाएँ तो इनकी दशा बड़ी दयनीय हो जाती खुद को मजबूत बतेने के फेर में वे किसी को अपनी कमजोरी कभी नहीं बताते। इसका उन्हे भारी से भारी खामियाजा ही क्यों न उठाना पड़े। सरिता अपने इकलौते बेटे आशीष की खूब तारीफ करती थी उसकी बुराई सुनना जरा भी पसंद नहीं करती थीं जबकि आशीष एक सही लड़का नहीं था लेकिन वो इसका दोषी दूसरों को ठहराती थीं पति से बचा बचा कर बहुत नैसा दिया था उसे उन्होंने। उसे शराब की लत लग गई थी। जब उसकी किडनी और लीवर पर असर पड़ा और जब मरज लाइलाज हो गया तब उन्होंने इलाज कराना शुरू कराया वो भी सबसे छिपाकर। पर आखिर डॉक्टर ने जवाब दे ही दिया और आशीष आज दुनिया में नहीं है। उसकी मौत के बाद उसकी शराब खोशी की खबर सबको लग सकी। जब छतबर लगी तब लोगों को बड़ी हैरत हुई। सबने यही कहा कि काश उसे ऐसा पहले बताया होता तो आज ये नौबत ही नहीं आती।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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