अधिकाँश लोगों का यह अनुभव है कि जो जहर अपनों के दिए दंश में होता है उतना हज़ारों बिच्छुओं में भी नहीं होता यह जहर इंसान को मारता नहीं है बल्कि जिंदगी भर तड़फाता है इसकी पीर कभी भी कम नहीं होती है। कुछ, लोग अपनों का शोषण करते हैं उसके हकों को छीन कर खा जाते हैं। उसे कई तरह से परेशान करते हैं उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हैं और उसे उस वक्त छोड़ देते हैं जिस वक्त उसे इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
राजेश की उम्र चौदह साल की रही होगी तब उसका भाई रोहित एक व्र्ष का था तब उसके माता पिता की सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मृत्यु हो गई थी उससे छोटी दो बहन और थीं। राजेश ने आठवीं पास की ही थी और वो नौवी में एडमीशन की तैयारी कर रहा था। पर उसके ऊपर,मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। अंत्येष्टि में बहुत लोग शामिल हुए सब उसके सिर पर हाथ फेरकर यह कहकर गए की हम माँ बाप की कमी का अहसास नहीं होने देंगे। लेकिन तेरहवीं के बाद किसी ने मुड़कर भी नहीं देखा राजेश ने पढ़ाई छोड़कर ढाबे पर काम करना शुरू किया और अपने बहन भाईयों की परवरिश करने लगा जब भाई स्कूल जाने लायक हुआ। तब उसको एस डी एम साहब ने कं टजेन्सी पर भृत्य के पद पर रख लिया उसका काम साहब के यहाँ खाना बनाने का था । साहब अच्छे थे उनकी मेडम भी दयालु थी। साहब का जब तबादला हुआ इस के पहले वो राजेश को परमानेन्ट कर गए थे। तथा उसे सरकारी आवास भी दिलवा दिया थे। राजेश ने सारी जिंदगी अपने भाई बहनों के लालन पालन में गुजार दी रोहित को खूब पढ़ाया लिखाया और उसे सरकारी अफसर बनवा दिया दोनों बहनों को पढ़ा लिखाकर सरकारी स्कूल में टीचर बनवा दिया अच्छी जगह उनकी शादी करा दी भाई की शादी भी धूभधाम से की । राजेश बूढ़ा होता जा रहा था उसने खुद शादी नहीं की थी उसके रिटायर भेन्ट में दो वर्ष का समय था। तभी उसका तबादला दो सौ किलोमीटर दूर ग्रामीण अंचल में कर दिया गया राजेश ने भाई से कहा तो भाई बोला आप चिंता मत करो मैं रुकवा दूँगा पर उसने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया तब राजेश ने खुद तबादला रुकवाने की कोशिश की तब पता चला कि उसका तबादला उसके भाई ने बहू के कहने में कराया है। और वही तबादला रुकने नहीं दे रहा है। उसकी उच्च वर्ग की पत्नी एक चपरासी को जेठ के रूप में अपने साथ रखना नहीं चाहती थी। राजेश बुरी तरह टूट चुका था। उसने तबादले आदेश का पालन कर नए स्थान पर ज्वाइन कर लिया था। उसका भाई तथा बहू के इससे अपार खुशी हुई थी । यह दंश राजेश को अपनों के द्वारा दिया गया था जिसकी तडफन हजार बिच्छुओं के दंश के बराबर थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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