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व्यंग्य : ढुलमुल लोग

जो अपनी बात पर कायम नहीं रहते जो किसी के बहकावे में जल्दी आ जाते हैं ऐसे ढुलमुल लोग भरोसे के काबिल नहीं रहते इनकी कभी किसी से गहरी दोस्ती नहीं होती न इनकी दोस्ती स्थाई रहती कोई इनके हितैषी के खिलाफ़ भी इनके कान भर दे तो यह उस हितैषी को भी अपना दुश्मन समझने लगते हैं।
ऐसे लोग हमेशा आपको परेशान हाल दिखेंगे ये चिड़चिड़े स्वभाव को होंगे तथा किसी को भी बेइज्जत करने में जरा भी नहीं हिचकिचाएँगे। दिनेश जी को हम ऐसी श्रेणी में रख सकते हैं। उन्होंने जो दस साल पहले मकान बनवाया था उसमें बीस बार तोड़फोड़ करवा चुके हैं फिर भी वे संतुष्ट नहीं है कोई यदि उनसे कह दे यह दीवाल यहाँ हटा से दो इसके कारण घर में परेशानियाँ आ रही हैं तो वे मान जाएँगः। और नुक्सान उठाकर वो दीवाल गिरा भी देंगे लेचिन फिर भी उनकी परेशानियेँ दूर नहीं होंगी तो अंधविश्वास के दल दल में फँसकर%अपना समय और धन बर्बाद करते रहेंगे।लेकिन खुद में कभी सुधार नहीं लाएँगे।हैरत की बात तो यह है कि इतनी ठोकरे खाने के बाद भी उन्होंने आज तक संभलकर चलना नहीं सीखा है। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें किसी निर्णय पर भी स्थिर नहीं रहने देता। जिसका सबसे ज्यादा नुक्सान तो इन्हें खुद ही उठाना पड़ता है। कहते हैं कि जो एक बार ठोकर खा जाए पिर वो सँभल कर चलता है और ठोकर खाने की नौबत ही नहीं आने देता । लेकिन यह नियम इन पर लागू नहीं होता । यह ठोकर खाने से भी सबक नहीं लेते तथा बार बार ठोकर खाते रहते हैं। यह खुद सुधरना नहीं चाहते और कोई इन्हें सुधार भी नहीं सकता इस लिए लोग इन्हें इनके हाल पर छोड़ देते हैं। वैसे तो कोई इन पर तरस नहीं खातः जो कोई तरस भी खाता है तो यह उसे ऐसा पका ते हैं कि वो फिर दुबारा उनकी तरफ कभी मुड़कर भी नहीं देखता।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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