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जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य: रिश्वत की लत

कई सरकारी महकमों में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें रिश्वत लेने की लत लग चुकी है जैसे एक शराब के नशे का आदि जब तक शराब नहीं पी ले तब तक उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता उसी तरह ये रिश्वत खोर जब तक इन्हें रिश्वत नहीं मिल जाए तब तक इन्हें चैन नहीं मिलता तब तक इनका मूड भी खराब रहता है रिश्वत के नोट पाकर इनका मूड फ्रेश सो जाता है और इनमें ताजगी भर जाती है चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है। इनके बच्चे तथा इनकी पत्नी भी इनको मिली रिश्वत पर मौज करते हैं और पत्नी इन्हें हर समय रिश्वत लेने की प्रेरणा प्रदान करती रहती है। ऐसे ही रिश्वत के आदि एक विभाग के सरकारी कर्मी दिवाकर जी थे जो महज पाँच हज़ार रुपये की रिश्वत लेते हुए रिटायर मेन्ट के दिन पहले विजिलेंस की टीम के द्वारा पकड़ा गए। दो दिन बाद उनका ऑफिस में भव्य विदाई समारोह था तैयारियाँ अंतिम चरण में थीं लेकिन दिवाकर जी दो दिन पहले ही हवालात में पहुँच गए थे । जिस समय उनका ऑफिस में विदाई समारोह पर हार फूल से स्वागत होना था उस समय पुलिस उनका जलालत भरा अभव्य स्वागत कर रही थी रिश्वत लेते हुए पकड़ाए जाने पर भी रिवाकर जी के चहरे पर कोई पछतावा अथवा ...

व्यंग्य: जलने जलाने वाले

संसार जलने जलाने वाले लोगों से भरा पड़ा है जलने वाले लोगों में उनकी संख्या ज्यादा है जो बराबरी नहीं कर पाते। औ जो बराबरी करते हैं वे एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे रहते हैं एक पड़ोसी ने अपने अच्छे भले घर को इसलिए गिरवा दिया क्योंकि उसके पड़ोसी ने उससे अच्छा घर बनवा लिया था उसने जब तक उससे अच्छा घर नहीं बनवा लिया तब तक चैन नहीं लिया । उससे अच्छा घर बनवाकर उसके कलेजे को बड़ी ठंडक पहुँची जो जलन थी वो मिट गई। लेकिन उस जलन को मिटाने में वो गले गले तक कर्ज में डूब गया चटनी से रोटी खाने तक की नौबत आ गई। हमारेशहर के कन्हैयालाल जी से बात हुई तो बोले आजकल हमसे लोग बहुत जलते हैं हमने किसी का क्या बिगाड़ा है ।हमने कहा सबसे अधिक कौन जलता है वो बोले हमारा सगा छोटा भाई ।हमने कहा तुम उसे जलाते क्यों हो वे बोले ये तो कोई बात नहीं हुई ।हमने कहा क्योंकि तुम्हें उसको जलाने में मजा आता है तुम सरकारी नौकरी करते हो वो प्राइवेट तुम्हारा मकान पक्का है उसका खपरैल वाला तुम उसे अपनी खुशी में शामिल नहीं करते तो वो तुम से जलता है। उन दोनों की आपस में बिल्कुल नहीं बनती आए दिन उनके बीच लड़ाई होती है...

व्यंग्य: सियासत की गिरवट से ऊबकर

हरिराम जी ने जिस भ्रष्ट नेता बदलूसिंह के विरोध में विरोधी राजनैतिक पार्टी ज्वाइन की थी उसी बदलू सिंह के दल बदल कर उनकी पार्टी में आ जाने से व्यथित होकर उन्होंने सक्रिय राजनैतिक जीवन से संन्यास ले लिया था और वे अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में व्यस्त हो गए थे हरिराम के इस कदम से उनके आस पास के चापलूसों से उनका पीछा छूट गया था साथ ही उनका जमीर भी कायम था।  हरिराम यह देखकर हैरान थे कि चभी जो बदलूसिंह के विरोध में उनके साथ आंदोलन करते थे वे अब बदलूसिंह की चापलूसी कर रहे थे बदलूसिंह पहले जिस पार्टी के विधायक थे उस पार्टी ने उन्हें विधायक का टिकट नहीं दिया था इस से क्षुब्ध होकर उन्होंने हरिराम जी की पार्टी ज्वाइन कर टिकट भी हासिल कर लिया था और चुनाव जीतकर फिर विधायक बन गए यह देखकर अवसर वादियों ने अपना रुख बदल लिया था। अब सारे अपने जमीर को गिराकर बदलू सिंह को खुश करने में लगे हुए थे। केवल हरिराम ही ऐसे थे जो बदलूसिंह के चुनाव जीतने के बाद उनसे मिलने नहीं गए थे। बदलूसिंह के चाल चलन में कोई फर्क नहीं आया था वे अब भी उतने ही भ्र्ष्ट थे और दोनों हाथों से ध...

व्यंग्य: दूसरों पर दोष मढ़ने वाले लोग

ज्यादातर असफल लोग अपनी गलतियों का दोष दूसरों पर मढ़ते नजर आ जाएँगे ये किसी भी हाल में अपनी गलतियों को मानने को तैयार नहीं होते ख्यालों की दुनिया सजाकर कड़वी हकीकत भुलाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं ऐसे लोग ।ऐसे लोगों की समाज में प्रतिष्ठा नहीं होती लोग भी इनके सामने झूठी सहानुभूति दिखाकर इनके भरम को बनाए रखते हैं। ऐसे ही एक इंसान हैं कामता प्रसाद जी एक सरकारी दफ्तर में बाबू हैं। सरकारी आवास में रहकर उन्होंने अपना पूरा जीवन गुजार दिया जब उनके सहकर्मी ओम प्रकाश ने आवासीत भूख॔ड खरीदा तो उसे उन्सोंने अव्वल दर्जे का मूर्ख साबित करने की कोशिश में कोई कमी नहीं की उनकी नजर में सरकारी आवास छोड़कर खुद के मकान में जाना मूर्खता थी। जब ओम प्रकाश जी ने उस पर लोन लेकर मकान बनवाया तब भी उन्होंने उसकी आलोचना की । मकान बनाकर ओम प्रकाश जी ने उसे किराये पर दे दिया तब भी कामता प्रसाद उनको मूर्ख कहते रहे जब कामता प्रसाद जी का तबादला दूसरी जगह हुआ और उन्हें सरकारी मकान छोड़ना पड़ा तब उन्हें घबराहट हुई हारकर किराये का मकान लेकर उन्होंने तीन साल गुजारे जब वापस आए तो सरकारी आवास नहीं मिला उधर देखा तो...

व्यंग्य: पाखंडियों के जलवे

चालाक चपल और चतुर लोगों जो बातें बनाने में माहिर होते हैं वे अनेक प्रकार के पाख॔ड रच कर तंत्र !मंत्र!जादू टोने का भ्रम फैलाकर लोगों को मूर्ख बनाकर खूब धनवान बन गए हैं इन्होंने मान सम्मान और प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर ली है इनके जाल में फंसे लोग अपनी मेहनत की कमाई इनके हवाले कर के बर्बादी की कगार पर!आ गए हैं। ऐसे ही शहर के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की बेटी अचानक बीमार हो गई इलाज चला पर जल्दी ठीक नहीं हो पा रही थी किसी ने उन्हें एक कथित बाबा का पता बता दिया उस कथित बाबा ने उन्हें अपने जाल में फँसा लिया उन्होंने अपनी बेटी का इलाज बंद करके कथिता बाबा पर विश्वास कर! लिया जो पढ़ा लिखा भी नहीं था साल भर में उस कथित बाबा ने उनसे लाखों रुपये हड़प लिए इसके बाद भी वे अपनी बेपी की जान नहीं बचा पाए आखिर में वो तड़प तड़पकर मरी वे घर के मकान को बेचकर किराये के मकान में आ गए थे और उस कथित बाबा की झुग्गी अब आलीशान मकान का रूप ले चुकी थी उस कथित बाबा के यहाँ रोज लोगों की भीड़ लग रही थी जिनसे वो खूब पैसा ऐंठ रहा था। और शहर के अत्यंत प्रभावशाली लोगों में उसकी गिनती होने लगी थी । इस तरह के पाख॔डी ल...

व्यंग्य: गरज निकालने वाले

नत्थूलाल जी आजकल श्याम लाल की बड़ी ख़ुशामद कर रहे थे उन्होंने श्यामलाल जी को पूरी तरह मोहित कर लिया था श्यामलाल जी भी उनका अपनापन देखकर पुरानी कड़वाहट भूल गए थे और नत्थूलाल जी को अपना करीबी समझने लगे थे नत्थूलाल जी का ये प्रेम ऊपरी दिखावा था दर असल श्याम लाल जी से उन्हें अपनी गरज निकालनी थी इस लिए वे उनकी इतनी ख़ुशामद कर रहे थे और इस ताक में थे कि कब उनकी गरज निकले और वे कब श्यामलाल को जिन्हें वे अपने पीठ पर लादकर चल रहे थे उन्हें किसी गहरी खाई में ले जाकर पटक दें । ये गरज निकालने वाले लोग बड़े शातिर होते हैं जब इन्हें गरज निकालने होती है तो गधे को भी अपना सब से खास रिश्तेदार बना लेते हैं जिससे उनका मतलब न हो वो भले ही उनका बाप ही क्यों न हो उस से भी मौँह मोड़ लेते हैं इसी बात का रोना बाबूलाल भी रो रहे थे उनका इकलौता लड़का नरेश शादी के बाद उसी मकान में अपना हिस्सा लेकर अलग रहने लगा था जबसे वो अलग हुआ था तब से उस ने माँ बाप से बोलचाल तक बंद कर दी थी दोनों के आँगन एक ही थे एक बार नरेश के ससुर आए हुए थे नरेश उनकी खातिरदारी कर रहा था वो उनके लिए होटल से गरमागरम नाश्ता लेकर आया था उनक...

व्यंग्य: अचानक वरिष्ठ रंगकर्मी बनने की करामात

गाँव खेड़े में होने वाले नाटकों में छोटे मोटे रोल करने वाले रतिराम जी सरकार बदलने तथा लालजी राम के संस्कृति मंत्री बनने पर संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष बनने के बाद अचानक रातोंरात प्रदेश के वरिष्ठ रंगकर्मी बन गए थे। अखबारों में उनके इंटर व्यू छप रहे थे रंगकर्म पर उनकी कही हर बात को प्रमुखता दी जा रही थी एक निजी विश्विद्यालय ने तो उन्हें रंगकर्म के क्षेत्र!में उनके किए योगदान पर पी एच डी की मानद उपाधि तक दे दी थी रंगकर्म पर उनकी लिखी एक पुस्तक भी प्रकाशित होने वाली थी राज्य की राजधानी में उन्हें सरकारी बंग्ला मिल गया था और अकादमी का चालीस एकड़ के परिसर एवं उसमें बने भव्य भवन उनकी जागीर बन गए थे। जबसे रतिराम अकादमी के अध्यक्ष बने थे तबसे हर बड़ा से बड़ा रंगकर्मी उनके सामने अदब से पेश आ रहा था उनकी कही बात को गंभीरता से ले रहा था अब रतिराम आम आदमी के दर्जे से खारिज होकर खास आदमियों में शामिल हो गए थे उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा मिल गया था और अब वे हवाई जहाज में सफर करने लगे थे। रतिराम के जीवन की शुरूआत छोटे से गाँव शेरपुर से हुई थी । उनके पिताजी के पास थोड़ी सी खेती थी जबकि लाल...

व्यंग्य: गरीबों का खून चूसकर गाल लाल करने वाले लोग

शहर का सबसे बड़ा सूदखोर श्याम लाल विधायक जी का खास आदमी था बताया छाता है कि विधायक जी का भी बहुत सा पैसा इस सूदखोरी के धंधे में लगा हुआ था जिसका माध्यम श्यामलाल था विधायक जी श्यामलाल का हर तरह से संरक्षण करते थे श्यामलाल की ब्याज दर इतनी ऊँची होती थी जो कर्जदार का खून तक चूस लेती थी सूदखोरी के खून चूसने वाले पैसे से वो गोल मटोल हो गया था उसके गाल गुलाब की तरह सुर्ख दिखते थे। एक बार जो उसके चंगुल में फँस जाता था वो पूरी तरह बर्बाद हो जाता था।ऐसे ही एक कर्जदार किशनलाल का दस लाख का ट्रेक्टर श्यामलाल ने पचास हजार रुपये में हड़पने के बाद पाँच लाख का कर्ज बाकी बताकर मकान गिरवी रखवा लिया और दो साल बाद वो भी हड़प लिया श्यामलाल ने वहाँ गोदाम बनाकर उसे किराये पर उठा दिया किशनलाल बेघर हो गया था। अब श्यामलाल किशनलाल की दो बीघा जमीन पर नजर आ गई वो उस जमीन को हड़पने की चाल चलने लगा । श्यामलाल ने उसके पहले ही वो जमीन बेचकर उसके पैसों से बेटी की शादी कर दी और वो शहर भी छोड़ दिया आजकल श्यामलाल भोपाल में किराये की झुग्गी में रहकर मजदूरी कर रहा था। जबकि श्यामलाल की डेयरी से बड़े साहब को पाँच लीटर गाय का...

व्यंग्य : दुर्योधनों से भरा देश

ऐसा लगता है कि सारा देश ही दुर्योधनों से घिर गया है ये दुर्योधन हर श्रेत्र के साम्राज्य पर अवैध रूप से कब्जा करके बैठे हैं ।जिनका संरक्षण करने वाले धृतराष्ट्र भी मौजूद हैं और शक्तिमान पितामह भी जो प्रतिज्ञा में बंधेकर ऐसे दुर्योधनों का साथ देकर अथर्म को बढ़ावा दे रहे हैं । हैरत की बात तो यह है कि पाँडवों को न्याय दिलवाने वाला कोई नजर नहों आ रहा है बेबस विदुर सिर्फ न्याय नीति धर्म की बातें करने के अलावा और कुछ भी नहीं कर पा रहा है और दुर्योधन के द्वारा किए हुए अपमान को सह रहा है। ये दुर्योधन समाज सेवा हो या चिकित्सा या कोई और क्षेत्र का साम्राज्य हो सबके अलग अलग दुर्योधन हैं और धृर्तराष्ट्र हैं जो पाँडवों के हकों को छीनकर उन्हें निर्वासित कर खुद मजे कर रहे हैं और उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है साहित्य के क्षेत्र!में भी ऐसे तुर्योधनों और उनके दरबारियों की भरमार हैं ऐसे मंचीय कविता साम्राज्य पर भी दुर्योधन काबिज हो गए हैं। द्वापर में तो भगवान ने अवतार लेकर दुर्योधन और उसका साथ देने वालों का विनाश कर के धर्म की स्थापना कर दी थी लेकिन ये कलियुग है कलियुग के दुर्योधन बड़े चतुर चालाक ...

व्यंग्य: बड़े नाम वाले लोग

ज्यादातर बड़े नाम वाले लोग कोरे नाम का ही लाभ उठाते है असल मेहनत तो वो लोग करते हैं जिनका नाम कभी सामने नहीं आता एक ऑफिस में पूरा प्रोजेक्ट बाबू सेवा लाल जी ने बनाया बड़े साहब ने सिर्फ उस पर दस्तखत किए लेकिन जब प्रोजेक्ट पास हुआ तो उसका सारा श्रेय बड़े साहब को मिला सेवालाल जी तो इसी से संतुष्ट हो गए कि साहब कितने खुश हैं। सेवालाल जी की रात दिन की मेहनत ने बड़े साहब के नाम को खूब चमका दिया था इसका फायदा सेवाला जी को बिल्कुल नहीं मिला था सेवालाल जी की दम पर बडे साहब का प्रमोशन हो गया था किसी ने बड़े साहब से कहा कि सेवालाल जी का भी कुछ भला कर दो इनका भी प्रमोशन करा दो इस पर! बड़े साहब ने कहा इनका इस ऑफिस में होना जरूरी है इनका प्रमोशन करके मैं इस ऑफिस की व्यवस्था खराब नहीं करूँगे मैं ही क्या इनका प्रमोशन कोई भी अधिकारी नहीं करेगा नए साहब आएँगे तो यही सेवालाल जी उनके भी काम आएँगे।   दूसरों की मेहनत पर मजे करने वाले बहुत मिल जाएँगे जो सही मेहनत करने वाले के हिस्से में छाछ छोड़ेंगे और सारे मक्खन का उपभोग वे करेंगे कहते हैं कि बरगद के पेड़ के नीचे कोई और पेड़ नहीं पनपता...

व्यंग्य: खरी बात खोटों से कहने की सज़ा

एक तरफ जहाँ चापलूसों की भरमार हैं वहीं दूसरी तरफ बेहिचक खरी बात कहने वाले भी बहुत हैं पर ये खरी बात कहने का बड़ा नुक्सान उठाते हैं एक पार्टी के प्रमुख से पार्टी की बार बार हार से छुब्ध होकर एक छोटे नेता ने खरी और सीधी बात कहकर उस प्रमुख को नाराज कर दिया। चापलूसों ने आग में घी का काम किया और उस प्रमुख ने अपनी कमियों और !गलतियों पर ध्यान न देकर उस खरी बात कहने वाले नेता को पार्टी से ही निकाल दिया सही और खरी बात कहने की उसे ये सजा मिली थी। वो दौर कब का गया जब मुखिया का सब अनुकरण करते थे और!मुखिया की बात पर लोग सब कुछ लुटा देते थे आज के अधिकाँश मुखिया दलाली कर रहे हैं उन्होने अपना ईमान कब का बेच दिया है । ऐसे ही एक स्वयंभू संगठन के अध्यक्ष के पास एच पीड़ित आया बोला आप हमारे नेता हो आपकी बड़ी ऊँची पहुँच है मेरा तीन साल पहले अनुचित सूथानांतर कर दिया गया था। आप मेरा सही जगह स्थानांतर करा दीजिए उन्होंने आवेदन ले लिया चार दिन बाद आए बोले मैंने बात कर ली है काम हो जाएगा लेकिन दो लाख रुपये देने होंगे पीड़ित बोलाआप तो मंचों से बड़ी बड़ी बातें करते हो फिर यह पैसा क्यों वे बोले मंच के भा...

व्यंग्य: बेहयाई के मजे।

ऐसे लोगों की भी आपको कोई कमी नहीं मिलेगी जो अव्वल दर्जे के ढीठ लोग होते हैं ये इतना बेहया होते हैं कि बड़े से बड़े अपमान को हँसकर सहन कर जाते हैं इन्हें कोई पद इनकी योग्यता से नहीं मिलता ये उसे अपने सम्मान को खोकर हासिल करते हैं इनकी कोई कितनी ही बेइज्जती क्यों न करे इन्हें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है ऐसी ही शहर के एक नेता हैं नन्नूलाल जी प्रदेश में किसी भी पार्टी की सरकार हो पर नन्नूलाल जी सत्ताधीशों शों के इर्द गिर्द उनकी चापलूसी कर अपनी बेइज्जती को सहन कर मुस्कुराते हुए नजर आते हैं। नन्ललाल जी को यह कला अपने पिताजी से विरासत में मिली थी उनके पिताजी राखीलाल सेमल खेड़ा के सरपंच के करीबी बनकर रहते थे जो भी सरपंच बनता था वे उसके खासमखास बन जाते थे वे नन्नूलाल से षे कहते अगर शहद को पाना है तो मधुमक्खी के डंक सहकर भी कोशिश करना होगा। नन्नलल! जब बड़े हुअः तो गाँव में किसी की भी शादी होती थी उनके बारातियों में नन्नूलाल सबसे आगे रहते थे । राजनीति भे जब नन्नूलाल जी ने प्रवेश किया तो थोड़े ही दिनों में वे सत्ता की मलाई की झपटने में सफल होने लगे थे। जब मंत्री का जिले में कहीं जान...

व्यंग्य: लुटता पिटता आम आदमी

इस देश के सारे खास आदमी आम आदमी की चिंता में मुटिया रहे हैं और!आम आदभी चिंता मिटाने की फिक्र!में दुबला हुआ जा रहा है आम आदमी को कम से कम मजदूरी या वेतन भिलता सै और अधिक से अधिक उसको ही लूटा जा रहा है चाहे सरकारी दफ्तर हो या अस्पताल हो या बाजार में बिकता हुआ कोई सामान हो वो सामान आम आदमी को कभी सस्ता नहीं मिलता शहर के एक मेडिकल स्टोर पर एक आम आदमी इंजेक्शन लेने आया दुकानदार ने उसकी कीमत बारह सौ रुपये बताई तो आम आदमी बोला भैया इसमें कुछ कम नहीं होंगे दुकानदार!रूखाई से बोला देख नहीं रहे इसकी एम आर पी चौदह सौ रुपये है दो सौ कम तो कर दिए अब क्या मुफ्त में लोगे क्या। वो आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे देकर चला गया एम आर नया था उसने कुछ देर पहले उस दुकानदार को वो इंछेकूशन दो सौ रौपये भें दिया था दुकानदार ने उस आम आदमी से एक हजार झपट लिए थे वो एम आर कुछ नहीं बोला अगर बोलते तो वो दुकानदार उसकी नौकरी खा जाता   चुनाव में इस आम आदमी को दो हजार रुपये देकर खरीदने की कोशिश की जाती है और बाद में उसी आम आदमी को बेरहमी से लूटकर खास लोग मजे करते है। सुब्ह नीलामी में आम आदमी किसान के रूप ...

व्यंग्य: चापलूसी का सुख

राजनीति हो खेल हो या समाज सेवा हो हर जगह आपको चापलूस मिल जाएँगे । जहाँ चापलूस होंगे वहाँ वे भी होंगे जिनकी वे चापलूसी कर रहे हैं । जो चापलूसी कर कर के घिस गए हैं वो सोचते हैं कब चापलूसी का फल मिलेगा कब हमारे आका हमें पद दिलवाएँगे और कब हमारे पास भी चापलूसों की भीड़ होगी। ऐसे ही शहर के सबसे बड़े चापलूस करन सिंह जी हैं उन्होंने लगातार बीस साल पहले सुरेश भैया की चापलूसी करना शूरू की थी तब कहीं वे अब उवकी कृपा वे से शहर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बन पाए जब से वे अध्यक्ष बने तब से उनके पास भी चापलूसों की अच्छी खासी संख्या हो गऍई है और!अब उन्हें चरम सुख प्राप्त हो रहा है दूसरी ओर!उनके साथ!के एक खुदूदार टाइप के नेता लीला राम बीस साल के राजनैतिक जीवन में पार्षद तक नहीं बन पाए थे अभी हाल! ही में उन्होंने प्रभारी मंत्री जी को किसी बात पर खूब खरी खोटी सुना दी जिसका नतीजा ये हुआ कि मंत्री जी ने उन्हें पार्टी से बाहर करा दिया इससे उनकी रही सहो पूछ परख भी छत्म हो गई। जबकि करन सिंह का बड़ा रुतबा है क्योंकि वे मंत्रीजी के सबसे चहेते और सबसे पुराने चापलूस हैं जब सुरेश भैया बीस साल पहले प...

व्यंग्य : मंच के सेटिग बाज कवि

एक चुटकुले बाज अपनी कुल जमा तीन कविताओं की बदौलत कवि सम्मेलन के जाने माने कवि दीपक जी अपने चुटकुलों से सबको हँसाने में माहिर थे उनके पास न तो चुटकुले अपने थे न ही वे तीन कविताएँ अपनी थी वे कविताएँ भी हथियाई हुई थीं दीपक जी जब इन्दौर के बड़े मंच पर! चुकुलों से लोगों को खूब हँसा रहे थे तब श्रोताओं के बीच में एक भूतपूर्व कवि सतीश जी बैठे सुए थे जो अब कविता लिखना छोडकर किराने की दुकान चला रहे थे और! जिन तीन कविताओं की बदौलत दीपक जी कवि सम्मेलन के सफल कवि थे वे सतीश जी की ही थीं ।  सतीश जी तब लिखना छोड़ दिया था जब लिखने से उनके भूखों भरने की नौबत आ गई थी तबु उन्होंने अपनी कविता की डायरी लकडी के बक्से में बंद कर पैसा कमाना शुरू कर दिया था। उस समय दीपक जी कॉलेज में पढ़ते थे तब उन्होंने कॉलेज में कवि सम्मेलन कराया था सतीश जी उस समय तंग हाल थे तब दीपक जी ने उनके राशन पानी की व्यवस्था कर के उन से तीन कविताएँ लिखवाई थीं। उस कवि सम्मेलन से दीपक जी ने कविता पाठ की शुरूआत की थी वहीं उन्हें मंच के गुरू घंटाल कवि रोशन जी मिल गए उनके पास भी कुल आठ कविताएँ थीं पर वे भी मंच की शान थे दीपक ...

व्यंग्य : बड़े लोग

कुछ बड़े लोग ऐसे होते हैं जिन्हें गरीबों से बहुत नफरत हुआ करती है ये बात तो गरीबों के भलेके दिखावे की करते हैं लेकिन गरीबों के शोषण में इनका बड़ा हाथ होता है ये उन्हें कभी पनपने ही नहीं देते पेटभर रोटी जुटा ले और झुग्गी में रह ले इतना ही वे उनूहें देने देते हैं और गरीब इनकी मीठी बातों में आकर इन्हें अपना हितैषी समझता रहता है। ऐसे ही एक निजी अस्पताल के संचालक का कहना था कि अगर कोई गरीब आए तो उसे तब तक फालतू के इलाज में उलझाकर रखो जब तक उसके आयुष्मान कार्ड की रकम पूरी खर्च न हो जाए सही इलाज तब करो जब वो अपना घर बार जमीन बेचकर पैसा जुटाकर लाए जब इलाज कराचर लौटे तो उसके पेट भरने के लायक रोटी की भी व्यस्था न हो सके और वो मुफ्त के भोजन की लाइन में खड़ा नजर आए। गरीबों से नफरत करने वालों में उन बड़े लोगों की अच्छी संख्या है जो खुद गरीबी से उठकर बड़े आदमी बने हैं ऐसे ही मंत्री महोदय जीवन लाल जी भी गरीबों के मसीहा का मुखौटा लगाकर रहते थे हाँलाकि वे गरीबी से मंत्री बनने के बाद ही बाहर हो गए थे अब वे भी अमीरों की जमात में शामिल थे। लेकिन हर साल वे अपने स्वर्गीय पिताजी के जन्मदिन पर...

व्यंग्य: आयोजक की मौज

हर छोटे बड़े शहर कुछ ऐसे आयोजक मिल जाएँगे जो मुक्त चंदन घिसकर रेवताओं को खुश कर के उनसे मनचाहा वर प्रापत करके मौज करते हुए मिल जाएँगे। ये लोग अपनी जेब से एक रुपया भी खर्च नहीं करते बल्कि हर आयोजन में काफी पैसा हड़पने में कामयाब होते हैं और उस पैसे से मौज करते हैं। इनकी आयोजन पर पूरी पकड़ रहती है। किसको अध्यक्ष बनाना है, किसको मुख्य अतिथि, किससे संचालन कराना है, किसके फोटो अखबार में देना है और किसके नाम छपवाना, कौन आभार व्यक्त करेगा इसका निर्णय भी उनके हाथ में रहता है। लोग अपनी प्रशंसा सुनने के आदि रहते हैं। कोई अगर उनकी निंदा कर ले उसे ऐसी जगह ले जाकर निपटाते हैं कि फिर वो कहीं का नहीं। जो आयोजन के लिए चंदा देते हैं उनका नाम लेने वाला कोई नहीं होता। उनके चंदे पर मजे करने वाले आयोजक सारा श्रेय लूट लेते हैं। ऐसे ही शहर के एक स्वनाम धन्य आयोजक हैं धनसुखलाल जी। उनके बड़े जलवे हैं पहले वे मजदूरी करते थे। वहीं से उनसे एक पार्टी के नेता ने कहा एक बस भरकर भीड़ के लिए लोगों की जरूरत है। क्या तुम व्यवस्था कर सकते हो। धनसुख बोले क्यों नहीं उस नेता ने उसके लिए एडवाँस में रुपये दे दिए। उसमें उनकी इ...

व्यंग्य : भूतपूर्व होने का दुख

कहते हैं जितना सुख पद पर बने रहने पर प्राप्त होता है उससे कई गुना दुख पद छूट जाने के बाद भूतपूर्व होने पर होता है कई लोग तो इस स्थिति को सह नहीं पाते और उनका मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है यही हाल उच्च अधिकारी के पद से रिटायर हुए राजेश वर्मा का था आज सुब्ह उनकी पत्नी ने उन्हें बुरी तरह लताड़ दिया था पहले तो उसने उनसे कहा अब आपके पास कोई काम तो है नहीं ऐसा करो बाजार से सब्जियाँ खरीद कर ले आओ बेचार सब्जियाँ खरीद कर लाए तो पत्नी झल्ला पड़ी तुम्हें सब्जियाँ खरीदना भी नहीं आता पता नहीं कैसे इतने बडे अधिकारी का पद सम्हालते होंगे बेचारे अपना सा मौँह लेचर रह गए पद के छिनते ही गाड़ी बँग्ला नौकर चाकर सब हट गए थे वेतन की आधी पेंशन मिल रही थी ऊपर की कमाई पूरी तरह बंद हो गई थी किसी को डाँट फटकार कर अपने मन गुबार भी नहीं निकाल सकते थे ऐसे ही शहर की एक संस्था के अध्यरक्ष वीरेन्द्र जी दस साल से अपने पद पर जमे हुए थे इसके लिए उन्हें बहुत कुछ करना पड़ता था राजेश जी घूमते हुए एक निर्माणाधीन मकान के पास से जा रहे थे अचानक उनकी नजर अनिल प्रसाद पर पड़ी जो मजदूरी कर रहे थे वे अनिल को जानते वे रईस ...

कुंडली: मार कर बैठे हुए लोग

कुछ चपल चालाक रेंगकर चलने  वाले लोग  आपको जाहाँ कुंडली मारकर बैठे हुए दिख जाएँ तो समझ लेना  कि वे   वहाँ दुग्ध पान कर के विष उत्पन्न करने का कार्य कर रहे हैं ये लोग कुंडली मारकर कई वर्षों से जमे हुए इन्हें हटाने की किसी में हिम्मत नहीं होती ये अपना फन फैलाकर जब किसी को फुँफचार कर देखते हैं तो उसकी रूह काँप जाती है।  ऐसे ही शहर के एक कथित समाज सेवी  कामता प्रसाद हैं वे एक समाज सेवी संगठन पर कुँडली  मारकर चालीस वर्षों से बैठे  हुए दुग्धपान का आनंद ले रहे हैं। पूरा संगठन कामता जी के झोले में समाया हुआ है हर साल सरकार से मोटा अनुदान लेकर हड़प जाते हैं रसीद कट्टा हमेशा उनके पास रहता है । चंदा वसूलने में उन्हें महारत हासिल है   चंदे से उनको सबसे ज्यादा लाभ होता है उस पर वे अपना हक समझते है। वे हर साल चुनाव का नाटक करते हैं लेकिन पदाधिकारी सब उनके खास अपने  होते हैं। जो विरोध करता है उसे निपटाना वे अच्छी तरह जानते हैं ऐसे लोगों का कोई जमीनी आधार नहीं होता। ये लोग अच्छी तरह जानते हैं कि किस से कितना लाभ उठाया जा सकता है और किस हद तक उस...

व्यंग्य: प्रशंसा की भूख

योगेश कुमार जी उन जैसों लोगों में शामिल थे जिन्हें अपनी प्रशंसा सुनकर बहुत ख़ुशी होती थी उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं थी इसलिए वे खूब पैसा खर्च कर के अपनी प्रशंसा कराते थे मुफ्त खोरों की मंडली उनके साथ हमेशा रहती थी ।उन्हें कवि बनने की धुन सवार हुई थी तो कविता से उनका दूर दूर तक वास्ता नहीं होने के बावजूद भी उनके चार कविता संग्रह छप चुके थे वे शहर के स्वघोषित वरिष्ठ कवि भी थे। एक बार वे किसी मुशायरे में गए तो उन्हें ग़ज़लकार बनने की सनक सवार हुई ऊल जलूल बेसिर पैर की बहुत सारी ग़ज़ल उन्होंने लिख डालीं ताली बजाने वालों और वाह वाह करने वालों की उनके पास कोई कमी नहीं थी जो खूब उनकी झूठी तारीफों के पुल बाँधकर उनके पैसों पर मौज करते थे। ग़ज़लकार बनने के लिए उनूहोंने नगर के नूर साहब के घर के बहुत चक्कर लगाए थे उनकी खूब खुशामद की थी तब नूर साहब ने उनकी बेसिर पैर की चार ग़ज़लों ठीक करने के फेर में अपनी जादुई लेखनी से चार ग़ज़ल !लिखकर दी थीं उन चार ग़ज़लों को योगेश जी हजारों लाखों बार रिपीट कर चुके थे और वरिष्ठ शायर होने का ठप्पा भी लगा बैठे थे । पिछले दिनों उनके पाँचवें कविता संग्रह...

व्यंग्य : मुखौटा लगाए गिरगिटिए

जिस समाज के लोगों का नैतिक पतन हो जाता है सोच घटिया हो जाती है उस समाज के लोगों के बीच मुखौटा लगाए गिरगिटिए टाइप के लोगों का बडा महत्व होता है इनकी अपनी कोई सोच नहीं होती ना हीं कोई विचारधारा माहौल देखकर अपना रंग बदलने में ये माहिर होते हैं और वैसा ही मुखौटा अपने चेहरे पर लगा लेते हैं। ऐसे ही शहर के नेता खूबचंद जी भी हैं सुब्ह वे बूचड़खाने की माँग करने वालों के साथ थे तो दोपहर में वो गौशाला का चंदा इकठ्ठा करने वालों का साथ दे रहे थे शाम को वे जीवदया मंडल की बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।  लोग तो उन्हें अपने बीच पाकर ख़ुश हो जाते थे एक व्यक्ति ने अपनी पिताजी की तेरहवीं पर मृतूयुभोज न देते हुए उन रुपयों से सरकारी स्कूल में एक कमरा बनवाया था उस कार्यकूरम के मुख्य अतिथि के रूप में खूबीलाल जी ने भाषण देते हुए मृत्युभोज का प्रबल विरोध कर कमरा बनवाने वाले की खूब तारीफ की थी। और दो घंटे बाद खूबीलाल जी एक तेरहवीं में आयोजित मृत्युभोज में शामिल हो गए थे। और विशाल जनसमूह को देखकर अपना राजनैतिक लाभ उठा रहे थे वहाँ उन्होंने मृत्युभोज के विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला था। खूबीलाल जी...

व्यंग्य: चापलूसी की महिमा

नत्थूलाल के पास कोई विशेष योग्यता नहीं थी ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं था उसकी एक ही खूबी थी कि कुशल पुरा क्षेत्र में कोई उससे बड़ा चापलूस नहीं था आज उसी चापलूसी की बदौलत वो जनपद अध्यक्ष था उसकी निगाह में बाकी सब छोटे लोग थे जिन्हें वो अपने स्तर का नहीं मानता था।  नत्थूलाल को जिन्होंने प्राइमरी में पढ़ाया था वे शिक्षक विजय जी का तबादला दुर्गम स्थान पर हो गया था वे यह सोचकर नत्थूलाल के पास तबादला रुकवाने गए कि वो उनका पूर्व शिष्य है एर नत्थूलाल ने उनसे इसके एक लाख रुपये माँगे तो सर बोले कि कुछ तो लिहाज करो इस पर नत्थूलाल बोला तमीज से बात करो तुम्हारे एच एम तो मेरे साभने कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं करते तबादला मन पसंद जगह पर कराना है तो रुपये देना पड़ेगे तुमने मुझे बहुत जलील किया था मुझे नालायक और निकम्मा कहते थे और!जिस आशीष की तुम तारीफ करते नहीं थकते थे न वो भी मेरे पास आया था उससे मैंने इसी काम के पूरे पाँच लाख रुपये लिए थे और उसने बिना ना नुकुर किए दे दिए थे। डॉक्टर बनकर भी उसे काम तो मेरे से पड़ा न विजय सर के पास और कोई चारा नहीं था। उन्हें आखिर रुपये देना पढ़े। इसक...

व्यंग्य: ऐसे जीता चुनाव

रोशनलाल जी को राजनीति में आए पूरे पन्द्रह साल हो गए थे पर वे अभी तक कोई बड़ा पद हासिल नहीं कर सके थे इस बार उन्होंने अपने आप को पूरी तरह बदलकर अपने जमीर को बेचकर विधायक का चुनाव लड़ा था और पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने के बाद भी वो जीत गए थे।उनका भव्य!जुलूस निकला था हारने वाला अलग थलग पड़ गया था और अपनी हार का शौक मना रहा था। रोशनलाल जमीर रखकर राजनीति में आए थे और जमीर बेचकर चुनाव जीते थे उन्होंने दो बार के विधायक रहे अशोक को हराया था पार्टी ने उन्हें निकाल दिया था पर इसकी परवाह उन्होंने की नहीं थी राजनीति में रहते हुए वे अच्छी तरह समझ गए थे कि छल कपट प्रपंच झूठ धोखा विश्वासघात के बिना राजनीति में बने रहना कठिन है इस बार पार्टी से टिकिट के लिए अशोक पूरे दो करोड़ रुपये देकर आए थे। रोशनलाल तीन करोड़ रुपये लेकर पहुँचते इसके पहले ही अशोक के नाम की घोषणा हो गई। लेकिन उनके समर्थकों ने उन्हें चुनाव मैदान में उतार दिया अशोक को अभिमान ने जकड़ रखा था वो ये मानकर चल रहे थे उन्हें हराने वाला कोई नहीं है जबकि उनसे खार खाए लोगों की अच्छी खासी संख्या थी घमंड में आकर उन्होंने कार्यक...

भ्रष्टाचार या शिष्टाचार -- व्यंग्य

भ्रष्टा चार  पर इतना अधिक लिखा और कहा जा चुका है कि  लोग अब इस बात को महत्व ही नहीं देते भ्रष्टाचार हमारे देश में सहज रूप से स्वीकार्य हो चुका है। रिश्वत देना लोगों की आदत बन चुकी है वही रिश्वत लेना  भी  भी लोगों ने अपने अधिकार में शामिल कर लिया है घर पर गैस सिलेंडर लाने वाले को भी ऊपर से रुपये देना दस्तूर में शामिल हो गया है । यहाँ मैं इस विषय में ज्यादा कुछ न कहते हुए  कुछ संस्मरण देना चाहूँगा। एक जिला अस्पताल में सिविल सर्जन के रूप में डॉक्टर अशोक पदस्थ थे उनकी लडकी  कॉलेज में पड़ती थी केमिस्ट्री लेब में वो हादसे का शिकार होकर बेहोश हो गई उसके सहछात्र उसे अस्पताल ले आए।ड्राक्टर अशोक उसके इलाज में इतने तन्मय हो गए कि वो यही भूल गए कि यह उनकी अपनी बेटी है उन्होंने एक पर्चे पर दवाएँ लिखकर  एक सह छात्र को दिया और दवाएँ मँगवाई उसी दुकान से जहाँ उनका कमीशन तय था दवाएँ दो हजार  रुपये की आई जिसके  पैसे चारों छात्रों ने आपस में चंदा कर के दे दिए थोडी देर बाद  फिर चार हजार रुपये की दवाई का पर्चा थमा दिया अब वे एक दूसरे का मुँह देख रहे थे एक हिम...

हास्य व्यंग्य: दयनीय लोग

इन दिनों शहर में अनेक स्थानों पर साहित्यिक एवं सास्कधतिक आयोजन होते रहते हैं। ये आयोजन अक्सर रविवार को होते हैं। आयोजन चाहे कितने ही बड़े क्यों न हो पर किसी भी आयोजन में पचास से ज्यादा दर्शक कभी नहीं होते। ऐसे आयोजन बिरले ही होते हैं जिनमें पचास ज्यादा दर्शक आ जाते हों। लेकिन मंच जरूर भरपूर रहता है। आयोजक के कब्जे में माइक रहता है जिसका उपयोग बीच बीच में कर के वे अपनी भड़ास निकालते रहते हैं। ऐसे में वे लोग बड़े दयनीय नजर आते हैं जो आयोजन में अपनी भागीदारी के लिए आयोजकों की चापलूसी करते नजर आते हैं। इन्हें उनके सामने बार बार झुकते देखकर लगता है कि इनमें रीढ़ की हड्डी है भी की नहीं। हो भी तो शायद कमर के पास से टूटी हुई हो। हाल ही में शहर में एक साहित्यिक आयोजन हुआ। आयोजन को प्रदेश स्तरीय बताया गया। बड़े भारी भरकम व्यक्तित्व के धनी लोगों से मंच की शोभा बढ़वाई गई। हाॅल का किराया ही बारह हज़ार रुपये था। कार्यक्रम में भोजन की व्यवस्था भी रखी गई थी। इसका जिक्र आमंत्रण पत्र में भी किया गया था। भारी भरकम नाम वाले अतिथियों के नाम भी छापे गए थे। एक होटल वाले को खाने क...

कहानी: बुज़दिल पिता

शंकर लाल आज सेमलखड़ा गाँव का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति था। पिछले दस साल से वो गाँव का सरपंच था। उसके पास अस्सी एकड़ जमीन थी और गाँव में एक बड़ा मकान था। उसकी उम्र पैंतीस साल थी और यह सब उसने पन्द्रह सालों में हासिल किया था। उसके पिता चमन लाल गाँव के सबसे बुजदिल इंसान थे। जिसके कारण वे अपने पिता की चालीस एकड़ जमीन से हाथ धो बैठे थे।दो मकान उनके दूसरों ने हड़प लिए थे और वे एक झोपड़ी में रहकर दूसरों के खेतों में मजदूरी कर रहे थे। हैरत की बात यह थी कि वे अपने ही खेत में मजदूरी करते थे। जिसे दूसरों ने हड़प लिया था। अब वे अत्यंत बूढ़े हो गए थे पर अभी भी उनकी बुजदिली दूर नहीं हुई थी। साठ साल पहले जब शंकर लाल के दादाजी देवीलाल जी का निधन हुआ था तब वे अपने बेटे चमनलाल को विरासत में चालीस एकड़ जमीन तथा दो बड़े मकान, आठ भैंसें, छः बैल और बहुत सारी संपत्ति छोड़कर गए थे। मगर चमनलाल बहुत डरपोक किस्म के इंसान थे। वे अपने पिता की संपत्ति को सँभाल नहीं सके। गाँव के दबंगों ने उनकी पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया। उन्हें उनके ही मकान से बेदखल कर दिया था। डर के मारे उन्होंन...