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अप्रैल, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: शुरूआत

सेवा निवृत कृषि विभाग के कर्मचारी फूल सिंह दो वर्ष पहले बारह हजार रुपये मे कोल्ड आइल प्रेस मशीन खुद के उपयोग के लिए लाए थे उसी से उन्होंने खाद्य तेल निकाल कर छोटे पैमाने पर बेचने की शुरूआत की थी आज उनका कारोबार खूब फल फूल गया था दस हज़ार वर्ग फीट के भूख॔ड में उन्होंने बड़ी आइल प्रेस मशीन लगवा ली थी वे हर महीने दस हजार लीटर तेल निकाल कर बेच रहे थे वहीं ग्राइन्डर एवं आटा चक्की से आटा मसाले और बेसन का कारोबार भी कर रहे थे। आइल प्रेस मशीन खरीदने का दो वर्ष पूर्व उनके मन में तब विचार आया जब नगर के आयुर्वेद चिकित्सक मुकेश नेमा जी ने रिफाइन्ड तेल न खाने की सलाह देते हु कच्ची घानी का तेल उपयोग करने की सलाह दी यह तेल उन्हें बाजार में नहीं मिला तब उन्होंने छोटी आइल प्रेस मशीन खरीदो थी और वे उसी तेल का खाने में उपयोग कर रहे थे यह बात जब उन्होंने अपने मित्रों को बताई तो उनमें से कुछ मित्रों ने उन से तेल खरीदने की बात कही जो उन्होंने मान ली। यह एक छोटी सी शुरुआत थी धीरे धीरे और लोगों ने भी उनसे तेल लेना शुरू किया । जब इसकी डिमाँड बड़ी तो वे और बढ़ी मशीन ले आए मगर उसकी माँग बढ़ती जा रही थी। फू...

कहानी: मकान

नरेन्द्र के युवा बेटे अविनाश की शादी इसलिए नहीं हो पा रही थी क्योंकि उनके पास बहुत छोटा मकान था। बेटी की शादी तो उन्होंने कर दी थी पर बेटे की शादी में दिक्कत आ रही थी। कोई भी रिश्ता लेकर आता था तो घर देखकर अपना मन बदल देता था। जब वो रिटायर हो गए तब उन्होंने जो पैसे मिले उनसे बड़ा घर बना लिया तब कहीं अविनाश की शादी हुई। आज उन्होंने नए घर में अपने बेटे की बहू स्मिता की अगवानी की थी। आज वे बहुत ख़ुश थे। नरेन्द्र जी सिंचाई विभाग में बाबू की नौकरी करते थे। जब उन्हें उनके माता पिता ने घर से अलग कर दिया था तब उन्होंने कम बजट में यह छोटा सा मकान बनवाया था। जिसमें एक किचिन और दो छोटे छोटे कमरे थे। उस में बहुत दिनों तक सुखपूर्वक रहे लेकिन जब बच्चे बड़े हो गए तो जगह की कमी महसूस होने लगी। यह मकान जो था उसकी छत टीन शेड की थी। मकान में कॉलम बीम भी नहीं थे। बारह बाई तीस का मकान था। उसे तोड़े बिना डबल स्टोरी नहीं बनाया जा सकता था। बेटी के शादी के बाद उन्हें बेटे की शादी की चिंता थी। अविनाश एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था। उसका वेतन इतना अच्छा नहीं था कि वो बड़े किराये के मकान में रह सके। नर...

कहानी: समधी का रिटायरमेंट

शिक्षा विभाग में पदस्थ शिक्षक रामनरेश का हाल ही में रिटायरमेन्ट हुआ था। वे बी ई ओ ऑफिस के एकाउण्टेन्ट चन्द्र मोहन के समधी थे। इसलिए उनका एक भी रुपया खर्च नहीं हुआ था। सारे प्रकरण निपट गए थे तथा पूरे रुपयों का भुगतान हो गया था। दूसरी ओर एक अन्य शिक्षक कमलसिंह भी रिटायर हुए थे। एकाउण्टेन्ट को पचास हज़ार रुपये की रिश्वत देने के बाद भी उनके कुछ क्लेम अधूरे थे और वे बार बार ऑफिस के चक्कर लगा रहे थे। रामनरेश के लड़के नीरज की सगाई कुछ दिनों पूर्व चंद्रमोहन की लड़की निशा से तय हुई थी। वे दोनों नए नए समधी बने थे इसलिए रामनरेश जी को एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ा था। कमल सिंह सबसे यही कहते कि मेरे लड़के से उनकी बेटी की शादी थोड़ी हो रही है जो वे मेरा काम करें जबकि मैंने तो उन्हें मुँह माँगी रिश्वत दी है। फिर कमल सिंह यह सोचकर मन में संतोष कर रहे थे कि कम से कम उनका काम तो हो रहा है। सुरेश जी जो दो साल पहले रिटायर हुए थे उन्होंने रिश्वत देने से इंकार कर दिया था जिसके कारण उनका एक भी क्लेम उन्हें नहीं मिला था। सर्विस बुक ही ठीक नहीं हुई थी। बेचारे ऑफिस के चक्कर लगा लगाकर परेशान हो गए थे। हाई बी प...

कहानी: नौकरानी

आदिवासी अंचल में पैंतालीस साल पहले पदस्थ डॉक्टर विनोद गौतम की उस वक्त नौकरानी रही आदिवासी महिला शरबती आज संकुल प्राचार्य के पद से सेवानिवृत हुईं थी इस अवसर पर आयोजित समारोह में डॉ साहब भी शामिल हुए थे उन्होंने भी शरबत जी की बहुत प्रशंसा की थी शरबती जी ने अपनी सफलता का सारा श्रेय डॉक्टर साहब को दिया था। डॉक्टर विनोद गौतम की पैंतालीस साल पहले एम बी बी एस से पास आऊट होने के बाद पहली पदस्थापना आदिवासी अंचल के ग्राम गादिया के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में हुई थी वे अपनी माँ शारदा को साथ लेकर नौकरी ज्वाइन करने आए थे वे उस समय युवा थे। वहीं पर आदिवासी मजदूर पीरू भी रहता था उसकी लड़की शरबती पन्द्रह साल की किशोरी थी वो डॉक्टर सा की मम्मी से काफी घुल मिल गई थी । उसने गाँव के स्कूल से पाँचवी की परीक्षा पास कर ली थी आगे इसलिए नहीं पढ़ पाई थी कि गाँव में मिडिल स्कूल था हीं नहीं डा साहब उस गाँव में पाँच साल रहे इस बीच उनकी शादी डॉक्टर नीरा से हो गई वह भी डॉक्टर थीं। शरबती बालिग होने के बाद उनके यहाँ नौकरानी का काम करने लगी थी पर डॉ साहब उसे अपने परिवार का सदस्य ही मानते थे। जब उनका वहाँ से...

कहानी: नारायणी

महिमा ने पच्चीस साल के अपने विधवा के जीवन में अपने बेटा आकाश को आई टी इंजीनियर तथा बेटी मेघा को डॉक्टर बनाकर यह सिद्ध कर दिया था कि नारी भी समर्थ नारायणी होती है। पच्चीस साल पहले महिमा के पति राजू की अधिक शराब पीने के कारण सत्ताइस साल की अल्पायु में ही दुखद मौत हो गई थी। तब उसकी बेटी रूपाली तीन वर्ष की थी तथा बेटा आकाश एक साल का। उसके पति राजू की एक छोटी सी चाय की दुकान थी जिसका नाम राजू टी स्टॉल था। महिमा से उसकी चार साल पहले शादी हुई थी। तब राजू शराब तो पीता था पर कभी कभार ही। लेकिन दोस्तों की संगति में रहकर वो कुछ अधिक ही शराब पीने लगा था। शराब पीकर वो महिमा से झगड़ा करता था। इससे तंग आकर उसके पिताजी ने उसे घर से अलग कर दिया था। राजू महिमा के साथ किराये के मकान में रहने लगा था। घर से अलग होने के बाद वो पूरी तरह से शराब का आदी हो गया था। पूरे समय शराब के नशे में डूबा रहता था। शराब ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। वो बीमार पड़ गया जब उसे डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा कि अधिक शराब का सेवन करने से इनका लीवर खराब हो गया है। अभी इनका इलाज तो हो सकता है लेकिन इन्हें शराब का ...

कहानी: दो बहूओं की सास

चंचला की उम्र बहत्तर साल की थी उनके दो बेटे रवि एवं प्रकाश थे तथा दो बेटियाँ नीरा तएवं रमा थीं सबकी शादी हो गई थी दो बहुओं के होते हुए भी चंचला अकेली रहकर अपना बुढ़ापा काट रही थी इसमें बहुओं का कोई दोष नहीं था दोष चंचला का ही था बहुओं के प्रति उसका व्यवहार सही नहीं था बड़ी बहू सुषमा तो सीधी सरल थी तथा उसने सबकी खूब सेवा भी की थी पर उसको भी चंचला ने अपने घर से निकाल दिया था छोटी बहू उमा तो शादी के कुछ दिन बाद ही अलग हो गई थी। चंचला का सबसे बड़ा बेटा रवि था उन्होंने रवि की सबसे पहले शादी की थी उसकी पत्नी सुषमा ने बी एस सी बी एड किया था इसके बाद भी उसने गृहस्थी के कामों में अपने आपको खपा दिया था रवि एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था । रवि के पापा राम रतन ब्लॉक ऑफिस में क्लर्क थे। सुषमा को रोज सात लोगों का दोनों समय खाना बनाना पड़ता था रोटियाँ बना बना कर सुषमा के हाथ दर्द करने लगते थे सुब्ह पाँच बजे से रात के ग्यारह बजे तक उसे फुर्सत नहीं मिलती थी उसकी दोनों ननद घर का कोई काम नहीं करतीं थीं । तथा सुषमा की झुटी बुराई कर सास से डाँट खिलाती रहती थीं। समय गुजरा दोनों ननदो...

कहानी: काजल की कोठरी से बचकर

श्याम नगर के सरपंच राधेश्याम जी ने ईमानदारी की जो मिसाल कायम की थी उसके सभी कायल थे । सरकारी नौकरी छोड़कर सरपंच बने राधेश्याम जी के पास खुद की सायकिल तक नहीं थी वे अत्यंत सादगी पूर्ण जीवन जी रहे थे। यही कारण था कि उनका सभी ओर खूब मान सम्मान था । काजल की कोठरी में रहते हुए भी उन्होंने अपने आपको निष्कलंक रखा था। छ़ साल पहले राधेश्याम जी श्यामनगर के सरकारी स्कूल में शिक्षक थे उनके बड़े भाई विरोधी राजनैतिक दल के नृता थे इसकी कीमत राधेश्याम जी को बड़ी भारी चुकानी पड़ी थी उनका तबादला दुर्मम स्थान पर बसे सेमल गाँव में कर दिया गया था वहाँ से उन पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें सस्पेण्ड कर दिया गया। चार महीने बाद आरोप झूठे साबित होने पर वे बहाल तो हो गए पर उनकी पदस्थापना ऐसी जगह कर दी गई जहाँ जरायम पेशा लोग रहते थे। राधेश्याम जी ने तय कर लिया कि अगर वे भ्रषट तंत्र से लड़ना चाहते हैं तो उन्हें नौकरी छोड़ना पड़ेगा। उनके पास श्याम नगर में तीस एकड़ उपजाऊ सिंचित जमीन थी वे नौकरी से इस्तीफा देकर श्यामनगर आ गए और अपनी खेतीबाड़ी को सम्हाल लिया नौकरी छोड़ने पर वे स्वतंत्र हो गए थे और खुलकर सामने आ ग...

कहानी: कामयाबी

नीरज हर्षपुर गाँव में हाईवे से लगी डेढ़ सौ एकड़ जमीन में मेडिसिन की फेक्ट्री खोली थी तथा एक बड़ा रिसर्च सेन्टर भी बनवाया था। अस्सी एकड़ जमीन उसने दलाल के माध्यम से खरीदी थी तथा साठ एकड़ जमीन शासन ने उसे लीज पर प्रदान की थी। नीरज उसमें वो दवाइयाँ बना रहा था जो पहले विदेशों से मँहगी कीमत पर ली जाती थीं। अस्सी हजार से एक लाख रुपये तक के इंजेक्शन नीरज की फेक्ट्री पन्द्रह सौ रुपये की कीमत में तैयार कर रही थी। आज नीरज ने अपनी फेक्ट्री की एक युनिट में अपने ताऊजी के दो लड़के बाबूलाल और मान सिंह को काम करते देखा तो उसे बड़ी हैरत हुई। उनके पास तो साठ एकड़ जमीन थी। उसके हिस्से की तीस एकड़ जमीन भी उनके पास थी। फिर उन्हें नौकरी करने की क्या जरूरत पड़ गई। नीरज को सतरह साल पहले का समय याद आ गया जब उसके ताऊजी चमनलाल और उनके चार बेटों ने उस पर प्राण घातक हमला किया था तथा उसके हिस्से की तीस एकड़ जमीन छीन कर उसे गाँव से बाहर निकाल दिया था। नीरज के माता पिता का बस दुर्घटना में निधन हो गया था। तब नीरज आठवीं में पढ़ता था। माता पिता के निधन के बाद ताऊजी ने पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया थ...

कहानी: गुरूजी

गुरूजी के नाम से बड़गाँव के सेवानिवृत शिक्षक स्व ज्ञान प्रकाश जी एव उनकी स्व पत्नी दीपिका की आज युगल मूर्ति का ग्रामीणों ने अनावरण समारोह आयोजित किया था उनकी यह मूर्ति गाँव के गुरूकुल छात्रावास के विशाल प्रांगण में स्थापित की गई थी इस के साथ ही गुरूकुल का नाम भी दीपिका ज्ञान प्रकाश गुरूकुल रखा गया था ज्ञान प्रकाश जी आदर्श शिक्षक थे अपने जीवन के पूर चौंसठ वर्ष उन्होंने ऐस गाँव में बिताए थे उनके प्रयासों से कभी अत्यंत पिछड़ा माना जाने वाला गाँव आज जिले का सबसे प्रगतिशील गाँव माना जाता था। चौंसठ वर्ष पूर्व जब ज्ञान प्रकाश जी इस गाँव में शिक्षक बनकर आए थे तब उनकी उम्र महज अठारह वर्ष की थी वे इंटर पास करने के बाद ही शिक्षक पद पर नियुक्त हो गए थे। जब वे बड़गाँव में आए तब गाँव में कोई स्कूल नहीं था शासन ने यहाँ प्राथमिक स्कूल खोला था ज्ञान प्रकाश जी की पदस्थापना उस स्कूल में हुई थी वे गाँव के पहले शिक्षक थे। शाला भवन था नहीं पटेल कृपाराम ने अपनी दालान दे दी थी जिसमें उन्होंने पहली कक्षा से पढ़ाने की शुरूआत की थी दालान से लगे दो कमरे थे जो पटेल ने ज्ञान जी को रहने के लिए दिए थे। वे ...

कहानी: नियम से हटकर

शिक्षा विभाग के एकाउण्टेन्ट वीरेन्द्र तिवारी को गंभीर बीमारी से जूझते हुए आठ साल हो गए थे । आठ साल से उनका इलाज चल रहा था उनकी सारी छुट्टियाँ खत्म हो गई थीं फिर भी उनकी नौकरी चल रही थी जिसकी उन्हें पूरी तनख्वाह मिल रही थी सरकारी नौकरी के सारे लाभ दिए जा रहे थे उनकी नौकरी उनका बेटा निशिकाँत कर रहा था। और यह सब कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में हो रहा था फिर भी किसी को कोई एतराज नहीं था सभी ने नियम कानून से हटकर इंसानियत को सर्वोपरि रखा था उनके इलाज में हर महीने एक लाख बीस हज़ार रुपये खर्च हो रहे थे यह पूरा खर्च शुरू से ही शिक्षा विभाग का स्टॉफ उठा रहा था जो वेतन उन्हें दिया जा रहा था उससे परिवार का खर्च चल रहा था। आठ साल पूर्व वीरेन्द्र तिवारी एक मिलनसार कर्मचारी के रूप में जाने जाते थे। एक दिन वे मोटर सायकिल से ट्रेजरी की ओर जा रहे थे तभी एक कार उन्हें टक्कर मारकर चली गई । उनके सिर में भारी चोट लगी थी जिसके कारण वे चलने से फिरने से लाचार हो गए थे उनका डॉक्टरों ने हर संभव इलाज किया पर कुछ लाभ नहीं हुआ । टक्कर मारने वाला भी पकड़ में नहीं आया था वो ठीक से बोल भी नहीं पाते थे ह...

कहानी: बेटी की कमाई

रामसुख पुराने विचारों के इंसान थे बेटी के घर का पानी तक नहीं पीते थे आज उनकी जान उनकी बेटी आई टी इंजीनियर रचना के कमाए हुए पैसों से बची थी। रचना को तीन लाख रुपये वेतन मिल रहा था और उसके वेतन से रामसुख जी के घर की कायापलट हो गई थी। आज राम सुख को बीमारी से निजात भी रचना के कमाए हुए पैसों ने दिलाई थी। रामसुख जी के दो बेटे मोहन तथा सोहन थे और एक बेटी रचना थी सोहन मोहन को राम सुख जी ने प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया था और रचना सरकारी स्कूल में पढ़ी थी इसके बाद भी रचना अपनी कक्षा में हमेशा टॉपर रही थी नवमी से उसे मेरिट छात्र वृत्ति मिल रही थी राम सुख जी उससे छात्रवृत्ति के पैसे नहीं लेते थे वो उन्हें बैंक में जमा रहने देती थी रटना नवमी से ही ट्यूशन पढ़ाने लगी थी। मेधावी तो वो थी ही उसने बारहवीं में भी टॉप किया था। तथा इंजीनियरिंग टेस्ट भी क्वालिफाई कर लिया था उसका चयन आई आई टी मुंबई में हो गया था रचना ने कहीं कोई कोचिंग नहीं की थी रचना के पिताजी साधाण किसान थे वो घर का खर्च मुश्किल से चला पाते थे रचना पूरे जिले में एकमात्र ऐसी छात्रा थी जिसका चयन आइ आइ टी में हुआ था लेकिन पिताजी ने उसे आगे पढ़ान...

कहानी: डीहाइड्रेशन

पत्नी रूपा की जिद के चलते साले के लड़के निखिल की शादी में बीमार होने के बाद भी शामिल होने के कारण वैभव की तबियत गंभीर रूप से ख़राब हो गई थी और उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था पत्नी भी शादी के कार्यक्रम में रमी हुई थी रात को दो बजे जब वो वैभव के कमरे में आई तब देखा की वो बेसुध पड़ा था । उसने सबसे मदद की गुहार की पर कोई तैयार नहीं हुआ जिसके लड़के की शादी थी वो उसका भाई था उसने बहन से कहा सुब्ह जब शादी संपन्न हो जाएगी तब अस्पताल ले जाएँगे तब तक रुकना पड़ेगा मगर रूपा समझ रही थी अगर सुब्ह तक रुकी तो वो अपने पति की जान से हाथ धो बैठेगी वो जैसे तैसे वैभव को अस्पताल ले गई डॉक्टरों ने वैभव की हालत को देखकर कहा कि अगर इनको कुछ देर और अस्पताल नही लाया जाता तो इनकी जान हम भी नहीं बचा पाते वैभव पूरे दस दिन अस्पताल में रहा उसके इलाज में पूरे पाँच लाख रुपये खर्च हो गए थे रूपा को अपने भाई के लड़के की शादी बड़ी भारी पड़ी थी भाई ने इस बीच उसकी कोई खोज खबर नही ली थी ना ही देखने आए थे। शादी के दो दिन पूर्व से ही वैभव की तबियत कुछ बिगड़ने लगी थी वो हार्ट पेशेन्ट के साथ शुगर का भी मरीज था सुब्ह से उसे...

कहानी: बराबर का हक

उमानाथ जी के दो बेटे और दो बेटियाँ थीं। सब की शादी हो गई थी। उन्होंने अपने जीते जी अपनी पुश्तैनी एक एकड़ जमीन दो करोड़ रुपये में बेचकर चार मकान बनवाए थे। चारों मकान उन्होंने अपनी चारों संतानों के नाम कर दिए थे। बेटियों के नाम भी उन्होंने दो मकान किए थे। उन्होंने किसी के साथ अन्याय नहीं किया था। सतहत्तर वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ था। निधन के पहले वे बची हुई आधा एकड़ जमीन स्कूल को दान कर गए थे। उनकी पत्नी का निधन दो वर्ष पूर्व हो गया था। आज उनकी तेरहवीं में सब उनकी प्रशंसा कर रहे थे कि उन्होंने बेटों के साथ ही बेटियों का भी ख्याल रखा था। दो वर्ष पहले जब उनकी पत्नी श्यामा का निधन हुआ तब उनकी दोनों बेटी सुधा और सरला का मायका ही छूट गया। उमानाथ जी की जमीन शहर से लगी हुई थी। उसकी कीमत अच्छी हो गई थी। बेटे उमानाथ जी पर उसे बेचने का दवाब बना रहे थे। दोनों बेटे और उनकी पत्नियाँ बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनके पिताजी बहनों को एक रुपया भी दें। उमानाथ जी को भी बहुएँ बुढ़ापे में रोटी नहीं दे रही थीं। टिफिन सेन्टर से खाना मँगाकर खा रहे थे वे गाँव के मकान में अकेले रह रहे थे। उससे लगा आधे एकड़ का ए...

कहानी: मायके की शादी

मनीष को अपनी पत्नी रीता के भतीजे की शादी बड़ी मँहगी पड़ी थी जिसमें उसके पूरे डेढ़ लाख रुपये खर्च हो गए थे जबकि दोमहीने पूर्व जब उसके भानजे की शादी हुई थी तब रीता ने अपने पास रखे लेनदेन वाले कपड़ों तथा उसी के पास रखी चाँदी की पायल को उजलवाकर काम चला लिया था बहुत कम पैसे खर्च किए थे। भतीजे की शादी के बाद वो अपने भाई भाभी का गुणगान गाते हुए थक नहीं रही थी जबकि ननद के लड़के और उसके भानजे की शादी की ढेरों कमियाँ गिना रही थी तथा अभी तक उनकी बुराइयाँ कर रही थी। रीता के भतीजे की शादी के एक महीने पहले से ही रीता उसकी तैयारियों में जुट गई थी भतीजे को उसने पन्द्रह हजार रुपये का सूट सिलवाया था जबकि भानजे को जो पेन्ट शर्ट के पीस दिए थे उनकी कीमत पाँच सौ रुपये भी नहीं थी भानेज बहू की मुँह दिखाने में पुरानी चाँदी की पायल उजलवाकर दी थीं जिनकी रिसेल वेल्यू बारह सौ रुपये थी और भतीज बहू को मुँह दिखाई में पैंतालीस हज़ार रुपये के कान के सोने के टॉपस दिए थे। भतीज बहू को बीस हज़ार का लँहगा चुन्नी दिया था और कई प्रकार के नेगों में खुलकर खर्च किया था खुद के लिए नए कपड़े बनवाए थे अलग अलग रस्मों के लिए अल...

कहानी: बुढ़ापे में कमाई

सोमनाथ जी बहत्तर वर्ष की उम्र में पैदल ही गली गली में घूमकर समोसे बेचते थे तब कहीं उन्हें तथा उनकी पत्नी को दो वक्त की रोटी मिलती थी कभी खूब धन संपन्न सोमनाथ जी की आज यह हालत थी । सोमनाथ जी के दो बेटे अमित और सुमित थे तथा बेटी सुनिधि थी जिसका दो साल पहले दुखद निधन हो गया था । सोमनाथ जी की दो दुकानें थीं एक दुकान उन्होंने किराये पर दे रखी थी तथा एक दुकान वे खुद चलाते थे दुकान किराने की थी और खूब चलती थी। उसकी आमदानी से सोमनाथ जी ने दो फ्लेट खरीदे थे अमित और सुमित के नाम से दोनों बेटों की जैसे ही शादी हुई तो वे अपनी अपनी पत्नियों को लेकर फ्लेट में रहने लगे दोनों भाईयों ने एक एक दुकान पर कब्जा कर लिया था सोमनाथ जी पुत्र मोह के कारण कुछ कर न सके न ही उन्होंने इसकी पुलिस में कोई रिपोर्ट दर्ज कराई सुनिधि की शादी हो चुकी थी ।उसकी शादी में उन्होंने खूब दहेज दिया था यह शादी अमित सुमित की शादी से पहले हुई थी दोनों फ्लेट तथा दोनों दुकानों पर बेटों का कब्जा होने के बाद भी उनके पास जो मकान था उसमें चार किरायेदार रह रहे थे जिसके किराये से उनका खर्च चल रहा था। जब सोमनाथ जी के हाथ में पैसाथा तब...

कहानी: मोरनी के अंडे

आज किशनलाल की जान उसके खेत में रह रहे दो मोरों ने बचाई थी। दिन भर उसने खेत में काम किया था। दोपहर में खाना खाकर आम के पेड़ के नीचे कुछ देर के लिए लेटा हुआ था। उसकी आँख कब लग गई ये पता ही नहीं चला। तभी मोरों की आवाज से उसकी आँख खुल गई तो देखा कि वे दोनों मोर एक जहरीले साँप से लड़ रहे हैं। वो उनकी लड़ाई देखने लगा आखिर में मोरों ने उसे मारकर अपना भोजन बना लिया। तभी उसके पड़ोस के खेत वाला सेवाराम उसके पास आया उसने बताया यह साँप तुम्हारी तरफ तेजी से बढ़ रहा था तभी अचानक मोरों ने उस पर हमला कर दिया। फिर तुम्हारी नींद खुल गई आज इन मोरों के कारण तुम्हारी जान बच गई। इन मोरों से किशनलाल को बड़ा लगाव था। उसकी उनसे मित्रता थी। आज उन्होंने मित्रता का फर्ज निभा दिया था। किशनलाल सोच रहा था कि इंसानों से पशु पक्षी कई गुना अच्छे और भले होते हैं। ये दोनों मोर उसके खेत में रहकर ही पले बढ़े थे जिसमें किशनलाल की मुख्य भूमिका थी। दो साल पहले की बात है किशनलाल किसी काम से जंगल गया था। वहाँ एक जगह पर उसने मोरनी के पंख बिखरे देखे उसके पास ही दो अंडे पड़े थे। किसी बेरहम शिकारी ने मोरनी का शिकार किया था। अंडों प...

कहानी: सी ए बनने का सपना

रवीन्द्र वर्मा जिनका विद्रार्थी जीवन में सी ए बनने का सपना था जो पूरा नहीं हो सका था आज उनका बेटा अनुज सी ए बन गया था । आज उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था जो सपना वे पूरा नहीं कर पाए थे वो सपना उनके बेटे अनुज ने पूरा कर दिया था। रवीन्द्र जी ने हायर सेकेण्डरी में कामर्स विषय यही सोच कर ,लिया था कि वे आगे चलकर सी ए बनेंगे उन्होंने बहत्तर प्रतिशत अंक से हायर सेकेण्डरी की परीक्षा पास भी कर ली थी । इसके बाद बी कॉम में एडमीशन ले लिया था। लेकिन प रिवा की आर्थिक स्थिति इतवी दय नीय थी की वर्मा जी को अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर प्राइमरी शिक्षक की नौकरी करना पडी थी वर्मा जी के पिताजी राम मोहन कृषि विभाग में बाबू थे । उनकी जुआ खेलने तथा सट्टा लगाने की आदत थी । घर में वे आधी तनखा लाकर देते थे वर्मा जी का एक छोटा भाई नीरज था तथा बहन निशा थी। इतने कम पैसों में परिवार का खर्च नहीं चल पा रहा था पिताजी को अपनी जिम्मेदारी का अहसास ही नहीं था माँ के कपड़े पुराने होकर फट जाते थे । माँ वही कपड़े पहने रहतीं थीं। फिर भी पितेजी एक बड़ी रकम जुएँ सट्टे में गँवा देते थे जो ऊपर की कमाई होती थी वो सट्टे की भेंट चढ़...

कहानी: पर्यवेक्षक

आठवीं की परीक्षा में पर्यवेक्षण के दौरान सस्पेण्ड होने से बचे कमल सर आज बड़ी राहत की साँस ले रहे थे। क्योंकि जिसके कारण वे सस्पेण्ड होने वाले थे वो परीक्षार्थी महेश आज आए रिजल्ट में पास हो गया था। कमल सर पहले प्राथमिक शाला करमन खेड़ी में पदस्थ थे। उनका हाल ही में प्रमोशन हुआ था और वे यु डी टी बनकर माध्यमिक शाला आमगाँव में आए थे। उन्हें कार्यभार ग्रहण करे कुछ ही दिन हुए थे तभी आठवीं की परीक्षा आ गईं। कमल सर की ड्यूटी पर्यवेक्षण हेतु कक्ष क्रमाँक दो में लगा दी गई थी। कमल सर अच्छी तरह से अपनी ड्युटी कर रहे थे। वहीं एक परीक्षार्थी दीपक अपने आगे बैठे परीक्षार्थी अमित को बार बार परेशान कर रहा था कुछ बताने के लिए। इस पर कमल सर ने दीपक को डाँट दिया तथा चेतावनी दी कि अगर फिर उसने ऐसा किया तो उसकी कॉपी छीनकर कक्ष से बाहर कर दिया जाएगा। दीपक का पेपर तो पूरी तरह बिगड़ गया था लेकिन उसने मन ही मन में अमित तथा कमल सर से बदला लेने का इरादा कर लिया था। परीक्षा जैसे ही समाप्त हुई तो कमल सर ने सबकी कॉपी एकत्रित की और पेड पर जमाकर रख ली तथा कुछ लिखापढ़ी करने लगे। दीपक ने मौका देख अ...

कहानी: दूसरी पत्नी

गाँव की सीधी सरल स्वभाव की पत्नी शीला को छोड़कर सुधीर ने शहर की चंचल चपल लकड़ी रिया से शादी की थी जिसने उसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया था रिया उसे छोड़कर अपने प्रेमी के साथ रह रही थी उसने चालीस लाख रुपये सुधीर से कोर्ट में केस दायर कर झूठे आरोप लगाकर वसूल कर ,विए थे तथा हर महीने बीस हज़ार रुपये का गुजारा मत्ता ले र रही थी वो सुधीर को दो बार गुंडों से बुरी तरह पिटवा भी चुकी थी तथा धमकियाँ देती रहती थी की तेरी सरकारी नौकरी खा जाऊँगी एक दिन देखना तेरे हाथ पैर तुड़वाकर तुझे दर दर भिखारी बनाकर ही दम लंगी सुधीर गहरे तनाव में जिंदगी जी रहा था दूसरी ओर शीला महिला बाल विकास विभाग में सुपर वायजर बन गई थी उसकी शादी बहुत अच्छे लड़केसोमेश से हुई थी और सुखपूर्वक रह रही थी उसका दो साल का बेटा अंकुर था सुधीर के पास सिवाय पछतावा और दुख कू कुछ नहीं बचा था। सुधीर गाँव का रहने वाला था उसने बी एस सी कृषि में की थी तथा कृषि विकास अधिकारी के पद पर कार्यरत था उसकी शादी शीला से उसके पिता के जोर देने पर हुई थी शीला आठवीं तक पढ़ी थी वो देखने में सुंदर सुशील थी सरल,स्वभाव की थी तथा पति का बहुत खूयाल रखती थी पर...

कहानी: कुमाता

रोशनी जब ग्यारह वर्ष की थी तब उसकी मम्मी उसे तथा उसके तीन बहन भाईयों को छोड़कर अपने प्रेमी के साथ फरार हो गई थी रोशनी ने ग्यारह वर्ष की उम्र से अपने छोटे बहन भाईयों को पाला था रोशनी पढ़ने में होशियार थी मगर उसके बूढ़े दादा दादी ने उसकी शादी अठारह वर्ष की उम्र में ही कर दी शादी के दो साल बाद वो मायके आई थी अपने छ़ माह के बेटे अंशु के साथ जबकि उसकी सहेलियाँ कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं और पढ़ने लिखने की उम्र में रोशनी गृहिणी होने के साथ ही एक बच्चे की माँ भी बन गई थी। रोशनी के दो भाई तथा एक बहन थी इस तरह वे चार भाई बहन थे जब उनकी माँ अपनी ममता को त्यागकर अपने प्रेमी के साथ चली गई तब रोशनी का सबसे छोटा भाई राहुल कुल एक वर्ष का था उसका दूध भी नहीं छूटा था। रोशनी के पापा नौकरी के सिलसिले में बाहर रहते थे । रोशनी अपने दादा दादी और माँ रेशम बाई के साथ अपने तीनों भाई बहनों के साथ रह रही थी किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी की रेशम बाई का किसी से चक्कर चल रहा है वो तो जब प्रेमी के साथ फरार हुई तब रोशनी के दादा दादी के होश उड़ गए रोशनी के पापा तो बदहवास हालत में घर आए उन्होंने रेशम बाई को ढूँढ़ने क...

कहानी: मायके वाले

सरोज के मायके वालों ने सरोज को पचास लाख रुपये की चपत लगाई थी और जब सरोज को उनकी जरूरत पड़ी तो सभी ने उससे कन्नी काट ली थी। माँ जो घंटों बात करा करतीं थीं वो फोन नहीं उठा रही थीं। जो भाई कहता था की आधी रात को भी मैं मदद करने के लिए तैयार रहूँगा उस भाई ने बोलचाल बंद कर दी थी और पिताजी जिन्हें फुर्सत ही फुर्सत थी उन्होंने भी कह दिया था कि उनके पास आने की फुरसत नहीं है। इस घड़ी में भी सरोज के जेठ दीपक ने उसका पूरा साथ दिया था। पूरे पन्द्रह लाख रुपये अपनी जेब से खर्च किए थे तब कहीं सरोज के पति सूरज की जान बची थी। सूरज और दीपक दोनों सगे भाई थे। दीपका बड़ा भाई था। दीपक चौदह साल की उम्र में गाँव से पढ़ने के लिए शहर में आए थे। उनके पिताजी लखनलाल खेतिहर मजदूर थे। दीपक जी ने काम करते हुए अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला था। पिताजी से एक रुपये भी कभी नहीं लिया था। बी एस सी करने के बाद दीपक जी ने एक फेक्ट्री में केमिस्ट की नौकरी की पर नौकरी उन्हें रास नहीं आई और उन्होंने फेरी लगाकर कपड़े बेचना शुरू कर दिया। इसी बीच उनका छोटा भाई सूरज भी आगे की पढ़ाई करने के लिए उनके पास आ गया। सूरज की पढ़ाई का खर्च भी...

कहानी: साले का लड़का

रमेश शहर की एक बड़ी फेक्टरी में सुपर्वाइजर के पद पर कार्यरत थे। वे अपने साले के लड़के दिनेश की आदतों से परेशान थे। जब से वो उनके पास आया था तभी से वो किसी न किसी रूप में परेशान करता रहा था। आज उसे अवैध रूप से गाँजा बेचने के अपराध में सजा हो गई थी और वो जेल चला गया था। उसके जेल जाने का दोषी रमेश जी के साले ने उन्हें माना तथा उनके किए सारे अहसान भुलाकर उनसे खूब झगड़ा किया तथा सभी रिश्ते तोड़ लिए। जब रमेश जी ने साले को जो पाँच लाख रुपये कर्ज में दिए थे वे जब वापस माँगे तो उसने साफ इंकार कर दिया न मेरे पास पैसे हैं और न ही मैं तुम्हारा कर्ज अदा करने वाला हूँ, तुम से जो बने तो कर लो और कर्ज की रकम वापस लेने कभी मेरे घर मत आ जाना नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा। रमेश जी ने अपने साले को पाँच साल पहले पाँच लाख रुपये कर्ज में दिए थे। यह पैसे उनकी खून पसीने की गाढ़ी कमाई के थे साल जब कर्ज लेने आया था तब खूब रोया गिड़गिड़ाया था। बोले बिटिया की शादी करना है और मेरे पास फूटी कौड़ी तक नहीं। इस साल फसल में भी नुक्सान हो गया है। रमेश जी पर उनकी पत्नी ने भी दबाव बनाया हारकर उन्होंने पाँच लाख रुपये का...

कहानी: ग्राम संपर्क अभियान

आज तहसील के बड़े गाँव शोभाखेड़ी में ग्राम संपर्क अभियान था। पूरे हाई स्कूल का स्टॉफ सुबह सात बजे ग्राम के हाई स्कूल में आया था। दिन भर गर्मी में परेशान होने के बाद वे सब शाम को सात बजे घर आए थे। अभियान में एस डी एम तथा बी ई ओ की मोजूदगी ने उन्हें स्कूल नहीं छोड़ने दिया था। अगर विवेक सर सूझ बूझ से काम लेकर उनके भोजन की व्यवस्था नहीं करते तो उन्हें पूरे दिन भूखा रहना पड़ता। विवेक सर एक लोक प्रिय शिक्षक थे। छात्र उन्हें अपना आदर्श मानते थे। अभियान के दो दिन पहले पंचायत के सरपंच और सचिव स्कूल में आए थे और प्राचार्य विजय सिंह से स्कूल कहकर गए थे कि स्कूल के पूरे स्टॉफ को उस दिन सुबह सात बजे आना है तथा बारह बजे अधिकारियों के जाने के बाद स्कूल छोड़ना है। उस दिन रविवार था पूरा स्टॉफ अपनी छुट्टी खत्म होने से दुखी था। सरपंच ने यह कहा था आपके भोजन की व्यवस्था हम करेंगे आप इसकी चिंता मत करना। स्कूल में दो चपरासी थे तथा प्राचार्य सहित दस का स्टॉफ था चाय स्कूल के टी क्लब में बनती थी। उस दिन सभी सात बजे आ गए थे। आते ही सब को चाय टी क्लब से दी गई थी। ठीक दस बजे विवेक जी ने सबको गरमा गरम पोहे का नाश्ता...

कहानी: निठल्ला

राम करन की उम्र पचास साल हो गई थी उस के चार बच्चे थे उसने अपनी पूरी जिंदगी में कभी एक रुपया भी कमाकर घर में नहीं दिया था उसको पत्नी मीना एक प्राइवेट अस्पताल में नर्स का काम करती थी रामकरन के ससुर मरते समय,अपना चार मंजिला मकान अपनी बेटी मीना के नाम कर,गए थे जिसके किराये तथा मीना की नौकरी से घर का खर्च चल रहा था उनमें आपस में कभी कभी जमकर लड़ाई होती थी । ऐसा लगता था कि कहीं कोई कैसी की जान न ले ले पर वाक युद्ध ही चलता रहता था उनके बीच कभी हाथापाई की नौबत नहीं आई थी आज भी दिन में उनकी जमकर,लड़ाई हुई थी दोनों घर से,निकलकर सड़क पर आ गए थे लेकिन शाम को जब दोनों स्कूटी से साथ निकले तो नए किरायेदार सतीश को बड़ा ताज्जुब हुआ यह देखकर पुराना किरायेदार राकेश बोला यह कोई नई बात नहीं है आए दिन इनके बीच ऐसा होता रहता है मोहल्ले का कोई भी इनकी लड़ाई को कभी गंभीरता से नहीं लेता है। रामकरन की मीना से शादी छब्बीस साल पहले हुई थी । रामकरन तब विधायक जी का कार्यकर्ता था । उसने ओमप्रकाश जी के संपत्ति विवाद संबंधी कुछ काम कराए थे। ओम प्रकाश जी को रामकरन का यह व्यवहार,अच्छा लगा रामकरन पढ़ा लिखा तो था ही वि...

कहानी: बुआ

माँ के मरने के बाद रेशम बुआ सिर्फ एक बार मायके गई थी तबसे पूरे पाँच साल हो गए थे उसे मायके गए हुए। इस बार होली की भाई दूज पर अशोक भैया भी नहीं आए थे। आज रेशम बुआ भोपाल में आयोजित एक सामरोह में शामिल होकर सीधे इन्दौर अपने घर आ गई थी। जबकि भोपाल में उसका मायका था पर मायके से उसका मन अपनी भाभी के व्यवहार से इतना उचट गया था कि उसने घड़ी भर को भी वहाँ जाना उचित नहीं समझा था। अशोक भैया से भी उसे कोई उम्मीद नहीं थी वो तो भाभी के गुलाम हैं तो उसके खिलाफ एक शब्द भी बोलने की उनकी कभी हिम्मत नहीं होती थी। छः साल पहले तक बुआ हर साल गर्मी की छुट्टियों में मायके जाती थी तब उसकी माँ जीवित थी और माँ की पेंशन से घर का खर्च चलता था। अशोक भैया का तो धंधा मंदा ही चलता था इसलिए भाभी भी अपनी ननद रेशम बुआ तथा उनके बच्चों का ख्याल रखती थी। रेशम बुआ की गरमी की छुट्टियाँ बड़े आराम से गुजरती थीं।लेकिन माँ का निधन हार्ट अटेक से हो जाने पर जब बुआ मायके आई तब उसे भाभी के व्यवहार में फर्क नजर आया। बुआ को भी ये लगा की माँ से ही तो बेटी का मायका रहता है जब माँ ही नहीं रही तो फिर कैसा मायका। माँ के निधन के बाद...

कहानी: दूसरा अवसर

बैंग्लोर की अच्छी नौकरी का ऑफर ठुकराने के बाद नवनीत को पाँच साल पहले गृह नगर भोपाल में उसी कंपनी में नौकरी करने का दूसरा अवसर मिला था जिसका लाभ लेने में उसने देरी नहीं की थी । आज नवनीत कंपनी की भोपाल शाखा का मुख्य प्रबंधक था तथा उसकी पत्नी वैशालो सेक्रेटरी के पद पर,कार्यरत थी नवनीत का वेतन ढाई लाख रुपये प्रतिमाह था तथा वैशाली को डेढ़ लाख रुपये भिल रहे थे नवनीत अपने माता पिता एवं अपने बच्चों के साथ सुखपूर्वक रह रहा था।। पाँच साल पहले नवनीत भुवन और,भास्कर ने बी टेक के बाद मुंबई से एम बी ए किया था तब तीनों को बैंग्लौर की एक कंपनी ने प्लेसमेन्ट में नौकरी का ऑफर,दिया था उनका वेतन अस्सी हजार रुपये था नवनीत को एक लाख रुपये वेतन का ऑफर था लेकिन नवनीत की माँ की तबियत,बहुत खराब थी इसलिए उसने नौकरी का ऑफर ठुकरा दिया था कंपनी के सी ई ओ ने उसे बहुत समझाया दो साल बाद उसका वेतन डेढ़ गुना करने की बात कही थी पर नवनीत ने अपने केरियर,से ज्यादा माता पिता की सेवा को अधिक महत्व दिया था नवनीत के ऑफर को ठुकरा देने पर भुवन ने अपने साले नीलेश को वो नौकरी दिलवा दी थी। नवनीत ने भोपाल,आकर माँ के इलाज तथा उनकी प...