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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कहानी: बेवफ़ाई

तीस साल पहले अपनी पत्नी सुनीता की बेवफ़ाई से पीड़ित सुरेश तलाक के बाद आज पचपन साल की उम्र में गोद लिए बेटे श्याम मोहन एवं राघव तथा बिटिया सोनिया के साथ सुखपूर्वक रह रहे थे और उनकी साथ बेवफ़ाई कर प्रेमी से शादी करने वाली सुनीता तिरेपन साल की उम्र में अकेली रहकर अपना जीवन गुजार रही थी उसका दुनिया में कोई भी ऐसा नहीं था जिसे वो अपना कह सके। सुरेश की शादी जब सुनीता से हुई थी उसके पहले उसने सुनीता से कहा था कि यदि वो किसी से प्रेम करती हो तो बता दे ।कहीं वो माँ पिता के दवाब में आकर तो शादी नहीं कर रही तब सुनीता ने ऐसी किसी बात से इंकार कर दिया था और फिर सुनीता तथा सुरेश की शादी हो गई थी । सुरेश ने दहेज में कुछ भी नहीं लिया था उसके पास पैसे की कमी नहीं थी सुरेश बिजली का ए क्लास का ठेकेदार था उसकी बाजार में बिजली के सामान की सबसे बड़ी दुकान थी बड़ा घर था जिसमें सुख के सभी साधन मौजूद थे सुरेश को सुनीता ने अपने प्रेमी की भनक नहीं लगने दी थी वो जिससे प्रेम करती थी उसका नाम रोहन था वो अवारा था कोई काम नहीं करता था तथा नशे का भी आदी था सुरेश से शादी कराने में उसकी भी भूमिका थी दोनों ...

कहानी: मंदी

पिछले दो महीने से जगदीश टेलर का धंधा बहुत मंदा चल रहा था। वो जेन्टस टेलर था रेडीमेड कपड़ों के चलन ने उस पर गहरा असर डाला था। पूरे एक हफ्ते में मात्र दो जोड़ी पेन्ट शर्ट उसके पास सिलने आए थे जिनसे उसे एक हजार रुपये मिलने वाले थे जिसमें से आज उसे पाँच सौ रुपये मिल गए थे। इससे उसके मन को बहुत संतोष मिला था जगदीश दुर्बल इंसान था। उससे और कोई काम बनता नहीं था। पचपन साल की उम्र हो गई थी इसलिए टेलर का काम कर रहा था। शादी विवाह के सीजन में उसका काम कुछ अच्छा चला था। जिसमें उसने दो महीने का दुकान का बकाया किराया छः हज़ार रुपया अदा कर दिया था। अब फिर दो महीने का किराया फिर बाकी था। आय इतनी थी नहीं इसी बात की उसे चिंता थी। जगदीश पाँच साल पहले शहर के बड़े टेलर सोहन की दुकान पर काम करता था। लेकिन जब उसके यहाँ काम करने वाले अधिक और काम कम हो गया तो उसने कुछ कामगारों की छँटनी कर दी। उनमें जगदीश भी शामिल था। जगदीश ने अपनी खुद की टेलर की दुकान खोल ली थी। कुछ समय तक तो उसका काम ठीक चलता रहा। तब वो अपशी पत्नी और बच्चों को भी गाँव से शहर में ले आया था। बच्चों के एडमी...

कहानी: परित्याग

किशोर का बीस साल पूर्व उसके उन माता पिता ने  परित्याग कर दिया था जो उसे अनाथालय से गोद लाए थे तथा लिखित में यह वचन देकर आए थे कि वे इसको अपनी संतान की तरह लाड़ प्यार से रखेंगे, इस से कभी भेद नहीं रखेंगे। आज किशोर पूरे चौँतीस साल का हो गया था। उसकी शहर में कपड़े की दुकान थी। उसके दोनों बच्चे अनुरोध एवं अनुराधा अच्छे स्कूल में पढ़ रहे थे। उसकी पत्नी ममता नगर निगम में पार्षद थी तथा समाज सेवा भी करती थी। वे शहर के प्रतिष्ठित नागरिक थे। किशोर को अनाथालय में उसकी अज्ञात माँ उस समय छोड़ गई थी जब वो एक दिन का था। उसको गोद लेने के लिए कई निस्संतान दंपत्ति आगे आए थे। उनमें से एक जीवन और उसकी पत्नी माया भी थी। उनकी शादी के आठ साल बीत जाने के बाद भी उन्हें कोई संतान नहीं हुई थी। उन्होंने किशोर को गोद ले लिया था। शुरू में तो उन्होंने उसका लालन पालन अच्छी तरह से किया लेकिन उनके मन में यह बात गहरे से बैठ गई थी कि यह कोई अपना खून थोड़ी है पराया है। किशोर जब बारह साल का हो गया तब शादी के बीस साल बाद जीवन और माया को अपनी संतान का सुख मिला। उनके यहाँ बेटे का जन्म हुआ था जिसका...

कहानी: अपनापन

राकेश कभी मोती नाम के जिस देशी कुत्ते से सबसे अधिक नफरत करता आज उसी कुत्ते से उसका अपनापन था उसे वो अपना सबसे सगा मानता था मोती भी राकेश को बहुत चाहता था मोती से राकेश का ये लगाव जग जाहिर था।जबकि एक समय वो भी था जब राकेश को देशी कुत्तों से बहुत नफ़रत थी वो पहले कभी किसी कुत्ते को रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं डालता था जबकि अब उसकी दशा ये थी कि जब तक वो मोती को खाना नहीं खिला देता था तब तक खुद भी खाना नहीं खाता था । बात दो वर्ष पुरानी है जब मोती तीन साल का था । राकेश की पत्नी मोती से लगाव रखती थी वो राकेश के घर के सामने बैठा रहता था तब राकेश को कुत्तों से बहुत चिढ़ थी। मोती को घर के पास बैठा देखकर उसका गुस्सा काबू से बाहर हो जाता था वो मोती को कभी डंडे से तो कभी पत्थर से मारकर भगा दिया करता था एक बार ठंड के मौसम में उसने मोती पर ठंडा पानी डाल दिया था जिससे मोती बहुत देर तक दुखी स्वर में भौंकता रहा था तथा ठंड से थरथर काँपता रहा था । तब राकेश की पत्नी मधु ने उससे कहा था उस बेचारे का कसूर क्या था जो आपने उसके साथ ऐसा किया ये ती क्रूरता की हद है तब राकेश कुटिलता के साथ बोला था । मैंने ठ...

कहानी: प्रापर्टी

अनिमेष ने आखिरी मकान भी आज बेच दिया था अब एक छोटा सा मकान बचा था जिसमें वो रहने के लिए आ गया था उसकी उम्र पैंतालीस वर्ष की थी दस साल पहले जब उसके पिताजी रामविलास जी का निधन हुआ था तब उनके शहर में एक दर्जन मकान थे चार दुकाने थी वे प्रापर्टी डीलिंग का काम करते थे तथा मकान निर्माण का ठेका भी लेते थे उससे भी उनकी अच्छी आमदानी होती थी । अनिमेष की अपने पिताजी से बिल्कुल नहीं बनती थी वो अपने पिताजी का सबसे बड़ा आलोचक था वो हमेशा पिताजी के विपरीत चलता था। अनिमेष को ऐसा बनाने में उसकी माँ निशा का भी हाथ था । वो अपने बेटे को रामविलास जी के खिलाफ भडकाती थी वो कहती ये आदमी हद दर्जे का कंजूस है इससे मैं परेशान रहती हूँ क्या फायदा इतना रुपया कमाने से जबकि ठीक से रह भी न सको अनिमेष से कहती बेटा तू अपने पिता के जैसा मत बनना खूब दिल खोलकर के खर्च करना अनिमेष माँ के कहे अनुसार चलता था पिताजी कुछ कहते तो उनकी ह॔सी उड़ाता था राम विलास जी जब काम पर जाते तो पीने का पानी एवं लंच घर से ले जाते थे जबकि अनिमेष को बाहर जब भी प्यास लगती वो मिनरल वाटर की बॅटल खरीद लेता था भूख लगती तो मँहगी होटल मे ख...

कहानी: जनार्दन सेठ

सुखताल गाँव के सामान्य कृषक जनार्दन पूरे गाँव में सेठ के नाम से जाने जाते थे। उनकी उम्र पिन्च्यानवे साल की हो गई थी मगर आज भी दान करने में वे पीछे नहीं हटते थे। गाँव का जो हायर सेकेण्डरी स्कूल है उसके लिए सत्तर साल पहले जगह उन्होंने ही दी थी। तब वो प्राइमरी स्कूल था उसमें दो कमरे और दालान भी आपने अपने पैसों से ही बनवाई थी। वे मनमौजी थे उनके बारे में गाँव में कई किस्से प्रचलित थे। हाल ही में शिवरात्रि पर उन्होंने गाँव के सारे व्रतधारियों को अपनी तरफ से फलाहार कराया था। पिन्चयानवे साल की उम्र में भी वे पूरी तरह स्वस्थ थे। उन्हें किसी प्रकार की कोई बीमारी नहीं थी। उनके पूरे बत्तीस दाँत अभी तक सही सलामत थे। जनार्दन सेठ के बारे में कई प्रकार की अफवाह फैली हुईं थीं। कोई कहता उनको कहीं से गढ़ा धन मिल गया है। कोई कहता उन्हें कोई अज्ञात साधु सिद्धि दे गया जिससे उनके पास कभी धन की कोई कमी नहीं होती है। जनार्दन सेठ की एक ही बेटी थी निर्मला उसकी उम्र भी अब तिरेपन साल की हो गई थी। उसकी शादी उन्होंने पैंतालीस साल पहले जब की थी तब उसकी भव्यता की दूर दूर तक कई दिनों तक चर्चा चली थी। उस समय उनके समाज म...

कहानी: छिपा हुआ धन

गढ़े धन की खोज में अपनी जान गँवा चुके फूलचंद के दोनों बेटे रोहित और दिनेश आज शहर के सफल व्यापारी थे। रोहित अनाज का बड़ा व्यापारी था तथा दिनेश का टू व्हीलर तथा फोर व्हीलर ऑटोमोबाइल का शोरूम था। उनका मकान शहर के आलीशान मकानों मे से एक था। तीस पहले की बात है जब रोहित की उम्र दस साल तथा दिनेश की उम्र आठ साल की थी तब फूलचंद अपने खेत  में एक जगह पर गढ्ढा खोद रहे थे। खुदाई कुछ ज्यादा गहरी हो गई थी। उस खुदाई में उन्हें एक छोटा घड़ा मिला उसमें सौ चाँदी के सिक्के थे। फूलचंद उसे पाकर बड़े खुश हुए। उस समय चाँदी का भाव छः हजार रुपये किलो था। मगर सुनार ने उन सिक्कों के बदले फूलचंद जी को साढ़े चार हजार रुपये ही दिए थे। सस्ता जमाना था वे पैसों को उन्होंने मौज मजे में खर्च कर दिए थे। इसके बाद उन्हें धरती में गढ़ा धन पाने की चाहत हो गई थी। किसी ने उन्हें एक तांत्रिक का पता बताया था। जो राजस्थान के किसी गाँव में रहता था। फूलचंद उसे अपने साथ ले आए उसने पूजा अनुष्ठान के नाम से उनसे बहुत सारे रुपये ऐंठ लिए थे। खेती पर उन्होंने ध्यान देना बंद कर दिया था। तांत्रिक के कहने पर उन्हो...

कहानी: चरित्र अभिनेता

चरित्र अभिनेता दिनेश मोहन ने पचपन साल की उम्र में पहली बार फीचर फिल्म में अभिनय किया था। फिल्म के रीलिज होने के बाद फिल्म जहाँ सुपर हिट साबित हुई वहीं दिनेश मोहन का अभिनय भी कमाल का रहा। इसके बाद तो उनके पास दो दर्जन फिल्में आ गई जिनमें उन्हें चरित्र अभिनेता का रोल मिल गया था। आज उन्हें फिल्म फेयर पुरुस्कार मिला था और वे बहुत ख़ुश थे। दिनेश मोहन जी पाँच साल पहले तक राज मिस्त्री का काम करते थे। भैपाल में जिस घर में वे काम कर रहे थे वो नाट्य निर्देशक विनोद कुमार जी का घर था। उनके घर रंगकर्मियों का आना जाना लगा रहता था। कभी कभी नाटक की रिहर्सल भी होती थी। विनोद कुमार जी पिछले कुछ दिनों से परेशान थे। अगले महीने उनके नाटक का राजधानी के नाट्य गृह में मंचन होना था और नाटक का मुख्य किरदार निभाने वाला कोई उन्हें नहीं मिल रहा था। रोज वे कितनों का ऑडिशन लेते पर निराशा हाथ लगती। एक दिन लंच में जब विनोद कुमार जी कुछ सोचते हुए बाहर टहल रहे थे तब दिनेश जी ने उनसे बात करने की हिम्मत की। विनोद कुमार जी यही समझे की यह निर्माण कार्य के संबंध में बात कर रहा होगा लेकिन जब दिनेश ने साफ उर्दू जबान में विनोद ...

कहानी: लाड़ला बेटा

नारायण दास जी ने अपने जिस बेटे को करोड़ों की संपत्ति दी थी वही बेटा उनको अस्सी वर्ष की आयु में उज्जैन के मेले में अकला छोड़कर घर आ गया था। नारायणदास जी को भूलने की बीमार थी। उन्हें अपने नाम के सिवा कुछ याद नहीं था। दो दिन तक जब वे एक ही स्थान पर भूखे प्यासे बैठे रहे तब लोगों का ध्यान उन पर गया। पर वे किसी को अपने घर का पता बता नहीं सके थे। संयोग से उनकी बेटी सरोज तथा दामाद घनश्याम उधर से गुजरे तो भीड़ देखकर रुक गए। भीड़ के पास जब सरोज ने बदहवास हालत में अपने पिता को देखा तो काँप गई। वहीं एक दुकानदार ने बताया कि दो दिन पहले एक व्यक्ति इन्हें यहाँ बिठाकर गया था। तभी से ये भूखे प्यासे बैठे हैं। सरोज उन्हें अपने घर ले आई थी तथा उनकी अच्छी तरह से देखभाल कर रही थी। इस घटना को घटे दो वर्ष हो गए थे। वे सरोज को भी नहीं पहचानते थे। उसे वे अपनी बहू समझते थे और कहते बहू मेरी बहुत अच्छी है जो मेरा ख्याल रख रही है। नारायणदास जी की शादी के तीन साल बाद सरोज का जन्म हुआ था। सरोज के जन्म पर उन्हें बड़ा दुख हुआ था उन्हें बेटे की उम्मीद थी। सरोज से उन्हें इतनी चिढ़ थी की वे उसे गोद में लेना ...

कहानी: नए एस डी एम

नए एस डी एम साहब ने कान्ट्रेक्टर द्वारा निर्माण कराए जा रहे स्कूल का कार्य रुकवा दिया था तथा पाँच लाख रुपये का भुगतान भी रोक दिया था। उसी सिलसिले में उनसे मिलने ठेकेदार विनोद वर्मा आया था। लेकिन जब मिलकर वो वापिस आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। उसकी ठेकेदारी खतरे में पड़ गई थी। ब्लेक लिस्टेड होने का डर सताने लगा था। नए एस डी एम साहब आर पी मौर्य जी ने कार्यभार ग्रहण करने के बाद निर्माणाधीन स्कूल भवन का निरीक्षण किया था। इंजीनियर नीरज जैन भी उनके साथ थे। स्कूल का निर्माण कार्य शुरू ही हौआ था। पाँच लाख रुपये ठेकेदार को मिल चुके थे। पाँच लाख का चेक और जारी होना था। एस डी एम साहब ने चैक देने से पहले निर्माण कार्य का निरीक्षण करना जरूरी समझा था और वे इंजीनियर जैन साहब को अपने साथ लाए थे। जैन साहब ने जाँच कर बताया नींव बहुत कमजोर है, निर्धारित मोटाई का सरिया नहीं डाला गया, सीमेंट बहुत कम मिलाई गई है, कुछ कालम जमीन को बिना खोदे ही उठा दिए गए हैं। इसे देखकर एस डी एम साहब बहुत नाराज हुए थे। तभी उन्होंने ठेकेदार को ब्लेकलिस्टेड करने का मन बना लिया था। संयोग बात यह थी की ठेकेदार उनका ...

कहानी: डॉक्टर गुप्ता

डॉक्टर आर के गुप्ता नगर के सबसे लोकप्रिय डॉक्टर थे पच्चीस साल पहले जब वे जिला अस्पताल में पदस्थ होकर आए थे तब वे एक एम बी बी एस डॉक्टर थे फिर उन्होंने सर्जरी में मास्टर ढिग्री हासिल की और आज उनकी सर्जरी के इतने चर्चे थे कि दूर दूर से मरीज उनके पास आते थे और स्वस्थ होकर जाते थे वे जिला अस्पताल में सिविल सर्जन के पद पर कार्यरत थे जिला मेडिकल ऑफिसर होने के बाद भी उनका व्यवहार सबके प्रति सहज सरल था उन्होंने ऐसे कई मरीजों को ठीक किया था जो इलाज कराकर हार गए थे फिर भी उनकी बीमारी ठीक नहीं हुई थी ताज्जुब की बात तो यह थी आज प्रदेश के मुख्यमंत्री खुद उनके पास इलाज के लिए आए थे गुप्ता जी ने उनसे वही सहज सरल व्यवहार किया था। मुख्यमंत्री जी ने कहा था आपकी बहुत प्रशंसा सुन रखी थी आज वैसा ही आपको पाया आज के इस धन केन्द्रत युग में आपके जैसे सेवाभावी बहुत ही कम मिलते हैं। डॉक्टर गुप्ता जी का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था उनके पिता अमीर चंद गुप्ता की किराने की दुकान थी जब वे दस साल के थे तब उनकी माँ शाँति देवी का सही इलाज नहीं होने के कारण दुखद शिधन हो गया था डॉक्टर उनका ऑपरेशन ठीक से नहीं ...

कहानी: होली की छुट्टी

कंजीलाल और उसकी पत्नी बुधिया एक निर्माणाधीन मकान में,काम करते थे कु॔जीलाल मिस्त्री का काम करता था उसे एक हजार रुपये रोज मिलते थे बुधिया मजदूरी करती थी उसे पाँच सौ रुपये रोज मिलते थे वे होली की छुट्टी मनाकर पाँच दिन बाद काम पर आए थे ,दोपहर में जब वे लंच कर रहे थे तब इंजीनियर से वहाँ आए गुप्ता जी कह रहे थे ये गरीब केसी होली मनाते होंगे कितने पैसे खर्च करते होंगे उनकी बात सुनकर जो कुंजी लाल ने जवाब दिया उससे गुप्ता जी हैरत में पड़ गए। कुंजीलाल ने उनसे कहा आपको होली की कितने दिन की छुट्टी मिली थी वे बोले तीन दिन की ओर चौथे दिन का हमने अवकाश ले लिया था पाँचवे दिन हम भी ऑफिस गए थे कोई काम तो था नहीं इसलिए यूँ ही खाली बैठकर आ गए थे कुंजीलाल बोला छुट्टी का आपको वेतन मिलेगा की नहीं वे बोले मिलेगा मुझे महीने में दो लाख दस हजार रुपये की तनख्वाह मिलती है सात हज़ार रुपये रोज के कुंजीलाल बोला आपने होली पर कितने रुपये खर्च किए गुप्ता जी बोले दस रुपये की एक गुलाल की पुड़िया भी खर्च नहीं हुई। कुंजीलाल बोला आपको छुट्टी के दिनों में अठ्ठाइस हजार रुपये मिले और आपने सिर्फ दस रुपये खर्च कि...

कहानी: ननद

रजनी और राजेश बहादुर गढ़ में दो साल से अलग रह रहे थे इस से पहले रजनी सास ससुर तथा ननद के साथ अपनी ससुराल में रहती थी । ननद के कारण उन्हें अलग होना पडा था। उसकी ननद सुषमा उसे तंग करती थी । अगर वे ऐसा नहीं करते तो उन दोनों को एक दूसरे को छोड़ना पड़ता जो उन्हें किसी हाल में भी मंजूर नहीं था। रजनी और राजेश एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थे उनकी छः माह की बच्ची भी थी जिसका नाम प्रिया था।  बात तब की है जब राजेश और और रजनी सेमरा गाँव में संयुक्त परिवार में रहते थे उसी गाँव में एक निजी स्कूल था उसमें राजेश टीचर था राजेश ने बी ए बी एड किया था वहाँ उसे मात्र तीन हज़ार रुपये तनखा मिलती थी रजनी हायर सेकेण्डरी पास थी और पत्राचार से डी एड कर रही थी रजनी को सबसे ज्यादा तंग उसकी ननद सुषमा करती थी सुषमा की ससुराल सेमरा में ही थी उसका घर थोडी ही दूर था सुषमा को रजनी से चिड़ थी वो दिन में आकर रजनी की बुराई अपनी माँ से करती थी । रजनी की सास फिर रजनी पर ताने कसती थी ठीक व्यवहार नहीं करती थी एक दिन की बात हैराजेश स्कूल में था तब दोनों सास ननद ने रजनी पर ताने कसे तथा झगड़े के लिए उक...

कहानी: मनोरोग

आठ साल पहले जिस नवनीत की मानसिक स्थिति गंभीर हो गई थी तथा उसके पिता उसे प्रेत बाधा मानकर तांत्रिकों के पास ले जाकर उसकी हालत खराब कर रहे थे वहीनवनीत बड़े भाई जीतेन्द्र के द्वारा उसका समय पर उपचार कराने के कारण आज आई आई एम से एम बी ए करने के बाद एक कंपनी में मैनेजर बनकर डेढ़ लाख रुपये महीने का वेतन ले रहा था। नवनीत के बड़े भाई जीतेन्द्र इन्दौर में कृषि शिभाग में उप संचालक के पद पर कार्यरत थे। आठ वर्ष पहले उनके छोटा भाई नवनीत ने हायर सेकेण्डरी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी पर नंबर कम आने के कारण वो दुखी था उसके बड़े ऊँचे सपने थे जिनके टूटने का उसे डर सता रहा था इस डर ने उसे डिप्रेशन में ला दिया था वो कुछ दिनों से बहकी बहकी बातें करने लगा था उसके पिताजी हरिप्रसाद जी जो किसान थे उनसे किसी ने कह दिया कि नवनीत पर प्रेत बाधा है किसी तांत्रिक के पास ले जाना पड़ेगा हरिप्रसाद उसे तांत्रिक के पास ले गए तांत्रिक ने उसे जंजीर से बाँधकर पीटा हरिप्रसाद यही समझे की वो भूत को पीट रहा है इससे नवनीत की मनोदशा और उधिक खराब हो गई वो तांत्रिक पर हमला करने के लिए आगे बड़ा तो उसने उस...

कहानी: हालात

दस साल पहले अनोखीलाल व्यवसाय में घाटा होने पर सब कुछ गँवाकर अपने गाँव शीलखेड़ा में मज़दूरी करके अपना जीवन यापन कर रहा था। आज उसके बेटे नवनीत ने सफलतापूर्वक व्यवसाय करते हुए शहर में पाँच करोड़ रुपये का मकान खरीदा था तथा अपने पिताजी एवं माँ तथा भाई बहनों को शहर में अपने साथ रहने के लिए ले आया था। वैसे भी अनोखीलाल जी की उम्र पैँसठ साल तथा उनकी पत्नी की उम्र तिरेसठ साल हो गई थी। अब उनसे मेहनत मजदूरी का काम नहीं बनता था। अनोखीलाल जी की उम्र जब पच्चीस साल की थी तब वे अपने गाँव शीलखेड़ा से अपनी चार एकड़ जमीन बेचकर शहर आ गए थे। यहाँ आकर उन्होंने गल्लामंडी में अनाज की खरीद फरोख्त का व्यापार शुरू किया था। इसके पहले वे गाँव में खेती करते थे। जिसमें उन्हें अक्सर नुक्सान उठाना पड़ता था। इसी से तंग आकर उन्होंने अपनी जमीन बेचकर व्यवसाय शुरू किया था। पाँच साल तक तो उनका कारोबार ठीक चलता रहा फिर उन्होंने एक व्यापारी राकेश को अपना पार्टनर बना लिया। छः महीने तक उन्हें अच्छा लाभ हुआ फिर अनोखीलाल जी को टाईफाइड हो गया और वे दो महीने तक कारोबार नहीं देख सके। दो महीने बाद जब वे अपनी दुकिन प...

कहानी: शिक्षा मंत्री का साला

प्रदेश के शिक्षा मंत्री रामनरेश जी का साला जो मंत्री जी के नाम का दुरूपयोग कर कई प्रकार की अनियमितताएँ कर रहा था तथा अधिकारियों पर रौब जमाकर भ्रष्टाचार से धन कमा रहा था उससे मंत्री की छवि खराब हो रही थी। इस पर मंत्री जी अधिकारियों को उसके खिलाफ कार्यवाही के सख्त निर्देश दिए थे जिसके कारण आज उसे सस्पेण्ड कर दिया गया था। इसके साथ ही पुलिस की कार्यवाही में उसके मकान से सत्तर करोड़ रुपये जप्त किए गए थे। अब वो हवालात में बंद था। छः महीने पूर्व जब विधानसभा चुनाव के बाद रामनरेश जी की पार्टी सत्ता में आई तब उन्हें राज्य का शिक्षा मंत्री बनाया गया था। उनके शिक्षा मंत्री बनते ही उनके साले  दीपक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दीपक एक सरकारी स्कूल में शिक्षक था। उनके मंत्री बनने के बाद दीपक का समय मंत्री जी के बंग्ले पर गुजरने लगा। वो दो महीने तक स्कूल नहीं गया फिर भी किसी अधिकारी की इतनी हिम्मत नहीं थी कि उसके खिलाफ कोई कार्यवाही कर सके। उसको पूरा वेतन मिल रहा था। इन दो महीनों में उसने मंत्री जी के नाम से बहुत रुपया कमाया था। मंत्री जी की छवि एक ईमानदार नेता की थी पर उनका साला उनकी छवि खराब कर र...

कहानी: अंतिम संस्कार

शारदा देवी का पिच्यासी वर्ष की आयु में दुखद निधन हो गया था उनके दो बेटे होते हुए भी उनका अंतिम संस्कार उनकी बेटी सुनीता ने मुखाग्नि देक किया था उनके बेटे अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए थे । सुनीता ने ही अपने पास से रुपये खर्च कर,उनकी तेरहवीं की थी तथा प्रयाग में जाकर गंगा जी में अस्थियों का विसर्जन कराया था सुनीता के दोनों भाई किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए थे। उसका एकमात्र कारण यही था कि शारदा देवी ने सुनीता के नाम मकान कर दिया था सुनीता और उसका पति उसी मकान में शारदा देवी के साथ रहते थे। सुनीता पन्द्रह वर्ष से माँ के साथ रह रही थी पन्द्रह वर्ष पूर्व सुनीता के पति सुरेश का किसी से लेनदेन को लेकर झगड़ा हो गया था जिसके उसे सजा हो गई थी सुनीता को ससुराल वालों ने अपने साथ रखा नहीं तो वो अपने एक साल के बेटे नितिन को लेकर मायके आ गई। सुनीता के पिताजी अमृतलाल शिक्षा विभाग में चपरासी के पद से रिटायर हुए थे। अपनी नौकरी के दौरान उन्होंने रजत नगर में,यह छोटा सा मकान बनवाया था यही उनकी एक मात्र संपत्ति थी जिसमें वे रह रहे थे बड़ा,बेटा भी चपरासी के पद पर नौकरी कर रहा था ...

कहानी: दंश

मानपुर गाँव के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रघुराज सिंह की नाराजी के कारण दस वर्ष पूर्व गाँव छोड़कर जाने को मजबूर हुए तिलकराम की आज ब्रज नगर में ड्राईक्लीनिंग एवं लान्ड्री की बहुत बड़ी दुकान थी तथा बहुत बड़ा मकान था जिसमें आठ किरायेदार रह रहे थे तथा उनका पूरा परिवार खुशहाल था। दस वर्ष पहले जब तिलकराम मानपुर गाँव में रहते थे तब उनकी पत्नी शाँति देवी दाई का काम करती थी। तिलकराम कपड़े धोने का एवं कपड़ों में प्रेस करने का काम करते थे। तिलकराम की बेटी रूपा की शादी हो गई थी। बेटे राजीव की शादी उन्होंने छः महीने पहले मोहिनी से की थी। गाँव का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रघुराज सिंह था। गाँव में उसकी बहुत बड़ी हवेली थी। उसके पास दो सौ एकड़ जमीन थी। किसी में हिम्मत नहीं थी उसकी बात को काटने की वो जिससे जो कह देता था वो उसे करना ही पड़ता था। एक बार की बात है रघुराज सिंह के घर धुलाई के लिए कपड़े लेने जाना था। शाँति देवी कहीं दाई का काम करने गईं थीं तो मोहिनी रघुराज सिंह जी की हवेली पर कपड़े लेने चली गई। उसने घूँघट में अपने चेहरे को छिपा रखा था। ड्यौढ़ी से आगे निकलकर जब दालान में पहुँची तो रघुराज सिंह की पत...

कहानी: रेस्टोरेन्ट

तृप्ति रेस्टोरेन्ट के मालिक सुनील आज एक सफल व्यवसायी थे। उनका रेस्टोरेन्ट खूब चलता था। जिससे उनकी खूब कमाई हो रही थी। तीन साल पहले सुनील की पत्नी मात्र दो छात्रों के लिए खाना बनाकर खिलाने से इसकी शुरूआत की थी और आज वो तृप्ति रेस्टोरेन्ट के नाम से विख्यात हो गया था। सुनील तीन साल पहले तक सोयाबीन प्लान्ट में सुपरवाइजर थे। वेतन अच्छा था लेकिन तीन साल पहले प्लान्ट बंद हो जाने के कारण उसकी नौकरी छूट गई थी। उनके पास घर का मकान था। जिस जगह उनका मकान था उसके आसपास पचास स्कूल कॉलेज और इंस्टीट्यूट थे। सुनील ने आठ साल पहले जब यहाँ यह प्लाट खरीदा था तब यहाँ चारों ओर जंगल ही जंगल था। यह जगह शहर से बारह किलोमीटर दूर थी। सुनील ने तब दो हजार वर्ग फीट का प्लाट मात्र चालीस हजार रुपये में खरीदा था। आज यहाँ तीस हजार रुपये वर्ग फीट जमीन का रेट चल रहा था। सुनील के प्लाॅट खरीदने के बाद इस क्षेत्र का विकास होना शुरू हो गया। यहाँ एक बड़ा इंजीनियरिंग कॉलेज खुला। फिर धीरे धीरे महानगर के बहुत से शिक्षण संस्थान यहाँ खुल गए। सरकार ने यहाँ सत्तर फीट चौड़ी सड़क बना दी। सुनील का घर रोड के सामने...

कहानी: राजनीति

राम मोहन तीसरी बार सरपंच का चुनाव जीते थे लेकिन यह चुनाव वो अपने खास दोस्त आलोक की बदौलत नहीं जीते थे। बल्कि अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी राजेश के कारण जीते। यही तो राजनैतिक चाल है जिसका शिकार आलोक हो गया। आलोक जो कभी उनका खासम खास था आज वो उनका सबसे बड़ा दुश्मन बन गया था। और जितनी क्षति पहुँचा सकता उतनी क्षति वो राम मोहन की कर रहा था। इस बार शायद वो राम मोहन को परास्त करने में सफल भी हो जाता लेकिन राजेश के सहयोग से वे फिर चुनेव जीत गए थे। आलोक राम मोहन जी का सबसे बड़ा समर्थक था और सबसे खास भी। जब राम मोहन पहली बार सरपंच बने थे तब आलोक उनके संपर्क में आया था। अब आलोक ने राममोहन की निकटता प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास किए थे और वो इसमें सफल भी हो गया था। कुछ समय बाद तो राम मोहन पूरी तरह आलोक के वश में हो गए थे। वो जो कहता उसे करते थे इससे आलोक की गाँव में भी बड़ी प्रतिष्ठा थी। आलोक को राममोहन जी ने बहुत लाभ पहुँचाया था। कभी जिसके पास घर का मकान तक नहीं था आज वो शानदार मकान में रह रहा था। दस एकड़ सिंचित जमीन थी उसके पास और बत्तीस लाख की बड़ी कार भी उसके पास थी। आलोक को महत्व देने ...

कहानी: बेईमानी की पराकाष्ठा

तीन साल पहले अपने सगे बड़े भाई विनीत की बेईमानी के शिकार होने के कारण अपना मकान गँवा बैठे सुधीर कुमार पूरे तीन साल बाद आज अपने नवनिर्मित मकान में गृह प्रवेश कर रहे थे। आज वो खुश थे पर उनके मन में अपने बड़े भाई द्वारा की गई बेईमानी का अब भी मलाल था। सुधीर कुमार एक बड़ी कंपनी के मुंबई में सेल्स मैनेजर थे। उनकी पत्नी लता बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर थी। उन्होंने भोपाल में पाँच साल पहले चार करोड़ रुपये में छः हज़ार वर्गफीट का आवासीय भूखंड खरीदा था। जिस पर वो दो हज़ार वर्गफीट में मकान बनवाना चाहते थे तथा चार हजार वर्गफीट का एरिया खुले छोड़ने का विचार थे। इसके लिए उन्होंने इंजीनियर से नक्शा भी बनवा लिया था लेकिन समस्या यह थी की मकान बनवाएगा कौन। इसका लाभ उठाया उनके बड़े भाई विनीत ने जो कोई काम धंधा करता नहीं था छोटी मोटी नेतागिरी कर लेता था सौ पचास रुपये की भी उसकी हैसियत नहीं थी। उसकी पत्नी एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी करती थी। उसकी आय से ही उनका खर्च चल रहा था। विनीत को जब पता चला कि उसका छोटा भाई मकान बनवा रहा है तो वो फौरन अपने भाई सुधीर के घर पहुँच गया और बोला कि भैया मैं हूँ न मैं पूर...

कहानी: हिस्सा

दस साल पहले गाँव से शहर आए ब्रजेश ने पन्द्रह बाई तीस वर्ग फुट का टीन शेड वाला कच्चा मकान तीन साल तक पाई पाई जोड़ने के बाद खरीदा था। मकान में पैसे उसके खर्च हुए थे। लेकिन वो मकान उसने अपनी माँ के नाम से रजिस्ट्री करा कर लिया था। उसके कारण उसे वो मकान छोड़कर दूसरी जगह किराये से रहना पड़ा था। इसके बाद फिर उसने लोन लेकर दूसरा मकान खरीदा था। आज उसने उस मकान में गृहप्रवेश किया था। पुराने मकान छोटे भाई ने पूरी तरह कब्जा कर लिया था। दस साल पहले ब्रजेश जब गाँव से आया तब उसकी उम्र पूरे अठारह वर्ष की भी नहीं थी। गाँव से आने का कारण यही था कि उसके माता पिता छोटे भाई और बहन को तो बड़े लाड़ से रखते थे और उसे प्रताड़ित करते थे। स्कूल जाने नहीं देते थे। पन्द्रह वर्ष की आयु से ही उससे मजदूरी कराना प्रारम्भ करा दिया था। तब ब्रजेश ने सोचा मजदूरी करना ही है तो क्यों न शहर में जाकर की जाए। यह सोचकर ब्रजेश शहर में आ गया था। यहाँ आकर वो मजदूरी करने लगा था। शहर में मजदूरी के गाँव से दोगुने पैसे मिलते थे। एक बार वो हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्राचार्य वर्मा जी के घर पर मजदूरी कर रहा था तब ...

कहानी: विपदा

हरीश चार माह पूर्व तीन दिन के लिए अपने गाँव नींबू खेड़ा गया था साथ में पत्नी और बच्चों को भी ले गया था उसके गाँव में उसके भतीजे की शादी थी वो गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था चार महीने बाद जब गाँव से वापस शहर आया तो सब कुछ बदला हुआ था वो जिस धर्मशाला में रात में चौकीदारी की नौकरी करता वहाँ कोई और ये काम कर रहा था शहर में जहाँ उसकी चाय की छोटी सी गुमठी थी वहाँ किसी ओर की दुकान लगी थी उसकी गुमठी गायब थी। उसने अपनी गुमठी की तलाश की तो गुमठी नाले किनारे मिल तो गई पर वो पूरी तरह कबाड़े में बदल चुकी थी यह विपदा उसके लिए बीमारी से भी भारी पड़ गई थी। आज दोपहर को जब वो घर आया तो बहुत उदास था पत्नी को जब उसने सारी बात बताई तो वो भी दुखी हो गई फिर बोली मकान मालिक तीन चक्कर लगा चुका है । पाँच महीने का बकाया किराया माँग रहा है। सुनकर हरीश सोच में पड़ गया उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो पाँच महीने का किराया दे सके उसकी पत्नी निर्मला बोलो अब क्या करेंगे । गाँव जाएँ तो वहाँ कोई रोजगार धंधा नहीं है और शहर में भी रोजी रोटी छिन गई है ।इस पर हरीश ने कहा एक जगह हम्माली का काम मिला है बोरे ट्रक पर...

कहानी: विश्वासघात

पन्द्रह साल पहले अपने साढू के विश्वास घात के कारण जो डुप्लेक्स दीपेन्द्र नहीं खरीद पाया था उसकी आज कीमत सत्तर लाखा रुपये थी। वो प्रापर्टी बैंक नीलामी में बिक रही थी और पन्द्रह डूप्लेक्स थे। दीपेन्द्र चाहता था कि  साढ़ू और वो दो डुप्लेक्स खरीद लें लेकिन वो प्रापर्टी हाथ से निकल गई थी। आज दीपेन्द्र ने मुख्य शहर से अठारह किलोमीटर दूर पचपन लाख रुपये में एक डुप्लेक्स खरीदा था जिसमें उसका रिटायरमेन्ट में मिला सारा रुपया खर्च हो गया था। बात पन्द्रह साल पुरानी है जब दीपेन्द्र महानगर में एक मकान में किराये से रहता था। मकान का किराया बहुत अधिक था। दीपेन्द्र के तीनों बच्चे पढ़ रहे थे। दीपेन्द्र महानगर से सत्तर किलोमीटर दूर के गाँव इमली खेड़ा की शासकीय माध्यमिक शाला में शिक्षक के पद पर कार्यरत था। बच्चे और उसकी पत्नी प्रभा महानगर में रह रहे थे। दो कमरे का छोटा सा मकान था उसमें ही साढ़ू की लड़की सरिता भी रहने आ गई थी। उसने बी एड में एडमीशन ले लिया था। दीपेन्द्र का साढ़ू एक कमाऊ विभाग में सब इंजीनियर था। उसकी रिश्वत से अच्छी कमाई हो जाती थी। उसके पास बहुत पैसा था। उसी दौरान...

कहानी: भेदभाव

आज बिशनपुर ग्राम की माध्यमिक शाला के शिक्षक रामकिशन शर्मा जी का रिटायरमेन्ट का दिन था वे स्कूल के सबसे अच्छे शिक्षक थे शाला के सभी छात्र छात्रा इस अवसर पर लुखी थे क्योंकि उनके बीच से एक अच्छे और आदर्श शिक्षक सेवानिवृत होकर जा रहे थे विद्यालयद्य में आज उनका विदाई समारोह था जिसमें सभी छात्र छात्राओं ने उन्हें भाव भीनी विदाई दी थी विद्यालय के वर्तमान में पदस्थ शिक्षक तथा पूर्व शिक्षक एवं छात्र भी शामिल हुए थे दुख की बात यह थी कि ग्राम का सरपंच सुथीर तथा पंच एवं सचिव बार बार फोन कॉल करने पर भी आयोजन में शामिल नहीं हुए थे जबकि एक माह पहले बिशनपुर के लोकल शिक्षक रामदास की सेवानिवृत्ति के अवसर पर सरपंच पंच सचिव सब शामिल हुए थे तथा उनका सम्मान भी किया था। सरपंच के द्वारा जो यह भेदभाव किया गया था उससे वे बहुत दुखी थे। रामकिशन सेवानिवृति के कार्यक्रम के बाद घर आए घर पर भी उनसे बहुत लोग मिलने और उनका सम्मान करने आए थे। आज रामकिशन सर सोच रहे थे गतमाह जब रामदास जी का रिदायरमेन्ट हुआ था तब उन्होंने उनके समारोह के सफल आयोजन में अपनी अच्छी भूमिका निभाई थी पर आज वे भी घर में मौजूद रहते हुए भी...

कहानी: पेट्रोल का खर्च

नितिन के बड़े भाई रामेश्वर तीन महीने तक हार्ट की गंभीर बीमारी से जूझते रहे। उनका हार्ट की तीनों नलियों मे ब्लाकेज थे। उसमें उनकी सारी जमा पूँजी खर्च हो गई थी। उन्हें अपनी जाँच कराने जिस प्राइवेट अस्पताल में जाना था वो उनके घर से बारह किलोमीटर दूर था। रामेश्वर जी की ऐसी हालत नहीं थी कि वे स्कूटी चला के जा सकें इसलिए उनकी पत्नी रमा ने अपने देवर नितिन को फोन लगाकर कहा था कि वो अपनी कार लेकर आ जाए। तुम्हारे भैया को डॉक्टर को दिखाने ले जाना है। नितिन कार लेकर तो आ गया था लेकिन डॉक्टर को दिखाने के बाद उसने कार को पेट्रोल पंप लाकर खड़ी की तथा उसमें पाँच सौ रुपये का पेट्रोल तथा रमा भाभी से कहा कि वो पेट्रोल के पैसे का भुगतान करें। रमा भाभी ने सहजता से भुगतान कर दिया। बात आई गई हो गई पर यही बात जब उनके यहाँ काम करने वाली बाई राजुल ने जब कॉलोनो में और लोगों को बताई तब एक अलग ही सच सामने आया। राजुल बता रही थी की जब रमा भाभी का फोन आया था तब नितिन की पत्नी निशा ने नितिन को कहा था कि वो साफ मना कर दे। वे कैब करके चले जाएँगे पेट्रोल तो जलेगा न पेट्रोल क्या मुफ्त में आता ...

कहानी: बिल्डर

सुदीप सिविल इंजीनियर था और महानगर के बड़े बिल्डर सुथीर जी के ऑफिस में अपनी नौकरी के सिलसिले में आया था। उनके यहाँ इंजीनियर का पद रिक्त था। यहाँ आने के बाद जब उसने सुधीर कन्सट्रक्शन के मालिक को देखा तो उसे बडी हैरत हुई क्योंकि वे उसके स्कूल के सहपाठी थे तथा बारहवीं पास करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी। सुदीप ने उस वक्त सुधीर जी को खूब अपमानित किया था। बारहवीं पास करके कौनसी नौकरी मिलेगी तुम गरीब के गरीब ही रहोगे। सुदीप ने बारहवीं पास करने के बाद बी ई में एडमीशन ले लिया था। वो सुधीर को बड़ी हिकारत से देखता था। उससे बात करना तक उचित नहीं समझता था। आज उसी सुधीर से उसकी पूरे पच्चीस साल बाद भेंट हुई थी। सुधीर से मिलने के बाद उसे ऐसा लगा कि सुधीर उसे नौकरी पर नहीं रखेगा। वो उठकर जाने लगा तो सुधीर जी ने उसे रोक लिया तथा  अच्छे वेतन पर उसे नौकरी पर रख लिया। सुधीर की गिनती शहर के सबसे प्रभावी व्यक्ति के रूप में होती थी। उनकी ऊँची पहुँच थी तथा सभी उनका सम्मान करते थे जबकि सुदीप उनके मुकाबले जीरो था। नौकरी पाकर सुदीप बहुत ख़ुश था। क्योंकि वो पिछले छः माह से खाली घर बैठा हुआ था। ...