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कहानी: अंतर

मनीष और सतीश दोनों सगे भाई थे । दोनों आज से दस वर्ष पूर्व अलग अलग हुए थे तब दोनों में जो बँटवारा हुआ था वो बराबर हुआ था मगर आज दोनों की हैसियत मे ज़मीन आसमान का अंतर था मनीष आज भी नौकरी कर रहा था जिसमें उसे चालीस हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिल रहा था इसमें ही उसकी जैसे तैसे गुजर बसर हो रही थी जबकि सतीश का नमकीन का बिजनिस था और,प्रतिदन की बिक्री ही उसकी लाखों में थी उसके पास पचास कर्मचारी काम कर रहे थे वो एक बड़े मकान में रह रहा था।
बचपन से ही मनीष तथा सतीश के स्वभाव में बहुत अंतर,था मनीष किसी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहता था और सतीश को जोखिम भरे काम करना अच्छा लगता थे उनके पिताजी रघुवीर की किराना की दुकान थी उसकी आय से उन्होंने शहर में दो मकान तथा शहर से दो किलोमीटर दूर एक एकड़ जमीन खरीदी थी वो जमीन खाली पड़ी थी कोई उसे देखने तक नहीं जाता था मनीष रघुवीर के साथ दुकान पर रहता था जो रघुवीर बताते उतना काम कर देता इससे आगे उसकी कोई सोच नहीं होती थी सतीश प्रापर्टी डीलिंग का काम करता था दोनों भाई हायर सेकेण्डरी से अधिक नहीं पढ़े थे दोनों भाइयों की शादी हो गई थी सब एक साथ रह रहे थे पर एक दिन अचानक रघुवीर जी को दुकान पर ही हार्ट अटेक आ गया जिससे उनकी मौत हो गई उनकी मौत के बाद दोनों भाइयों का आपस का तालमेल बिगड़ गया उनकी पत्नियों में भी आए दिन झगड़ा होने लगा अंततः उन्होंने तय,कर लिया की वे अब एक साथ नहीं रहेंगे अलग अलग रहेंगे और फिर उनके बीच बँटवारा हो गया मनीष ने दुकान ले ली तथा सतीश को एक एकड जमीन दे दी गई दोनों को एक एक मकान मिले पैतृक मकान माँ के पास रहने दिया जिसमें चार किरायेदार रह रहे थे जो माँ की आय का जरिया थे इसके अलावा आठ लाख के जेवर थे जो दोनों ने बाँट लिए पाँच पाँच लाख रुपये नगद भी दोनों के हिस्से में आए थे। कहने वाले तो यह कह रहे थे कि बड़े भाई ने अपने छोटे भाई के साथ बेईमानी की है पर सतीश ने इस पर कोई ऐतराज नहों उठाया था सतीश ने अपनी एक एकड़ जमीन पर ध्यान केन्द्रित किया जमीन ठीच कराई समतल बोर लगवाया शेड बनवाया कुछ पैसे खर्च कर भट्टी बनवाई और सेव नमकीन का बिजनिस शुरू किया भोपाल से सामग्री खरीद कर लाया इन सब में उसके पूरे दस लाख रुपये खर्च हो गए थे दूसरी और मनीष ने सारे पैसे बैंक में जमा कर दिए थे वो यही समझता रहा कि एक दिन सतीश कंगाल हो जाएगा पर सतीश को मालूम था कि कैसे रास्ता निकालना हैं सतीश की जमीन के सामने से बरखेड़ा पहुँच मार्ग निकला था हाल ही में उसपर सड़क बनाई गई थी उस जगह का नाम बरखेड़ा जोड़ पड़ गया था। सतीश ने दो लाख रुपये में पुरानी वेन खरीदी थी सतीश माल तेयार कराता पैकेजिंग कराता फिर वेन में नमकीन की थैलियाँ रख दुकानों पर सप्लाई करने निकल जाता था सतीश अनथक काम कर रहा था । वो माल की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं कर रहा था उसका माल सबसे बेस्ट होता था जिसका लाभ सतीश को जल्दी ही मिलने लगा जिससे माल की डिमांड इतनी बड़ी की लगातार तीन शिफ्टो में काम करने के बाद भी माल की कमी पूरी नही हो रही थी आखिर सतीश ने अपना मकान तथा जैवर बेचकर तथा बैंक से लोन लेकर साठ लाख रुपये की पूँजी इकठठी की और बड़ा नमकीन प्लाँट लगा लिया इससे उनका उत्पादन कई गुना बढ़ गया और सप्लाई भी ठीक हो गई थी। सतीश की तीन साल की मेहनत रंग लाई उसका प्रोडक्ट एक बडा ब्रान्ड बन गया था दूसरी और मनीष की किराना दुकान ठप्प हो गई थी वो दुकान मनीष ने बेच दी और सारा काम धंधा बंद कर दिया। मनीष ने साल भर तक कोई काम नहीं किया था और,उसके ठाठ बाट रईसों से थे डेढ़ साल में मनीष रोड पर आ गया था उसके मकान पर साहूकारों ने कब्जा कर लिया था बँटवारे के पाँच साल बाद मनीष कंगाल हो गया था उसने एक कंपनी में नौकरी कर ली थी जिससे उनकी गुजर बसर चल रही थी। जबकि सतीश ने हाल ही में पिचहत्तर लाख रुपये में दो एकड़ जमीन खरीदी थी।जिस पर वो वेयर हाऊस बनवा रहा था। 



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 
भोपाल मध्यप्रदेश

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