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कहानी: काकाजी

वीरेन्द्र काकाजी सत्तर वर्ष की उम्र में भी युवाओं की तरह क्रियाशील थे। उन्होंने मात्र पन्द्रह वर्ष की उम्र से कमाना शुरू किया था आज वो शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी थे उनके दोनों भतीजों तथा उनके परिवार दोनों बेटियों तथा उनके परिवार ने वीरेन्द्र,काकजी का सत्तरवाँ जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया था।
पूरा गौतम नगर उन्हें,काकाजी के नाम से जानता था।
आज से चौंसठ वर्ष पूर्व गौतमनगर एक साधारण सा कस्बानुमा गाँव था। जिसमें मिडिल तक ही स्कूल था वीरेन्द्र काकाजी ने उसी स्कूल से आठवीं पास की थी उनके घर की स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि उन्हें आगे पढ़ाई के लिए दंसरे शहर में भैजा जा सके । वीरेन्द्रा काकाजी के पिताजी रामधन जी सीधे सादे इंसान थे उनके पास कुल पाँच एकड़ जमीन थी उसमें ही खेती कर वे अपने परिवार का खर्च चला रहे थे वीरेन्द्र काकाजी के बड़े भाई नरेन्द्र तो बिल्कुल भी पढ़े लिखे नहीं थे वे भी खेती करते थे उनके पास दो बैल थे वे बँटाई से जमीन लेकर खेती करते थे कुल मिलाकर जौतमनगर में उनका परैवार साधारण हैसियत वाला था। गौतम नगर में हर मंगलवार को साप्ताहिक हाट लगा करती थी। उसमें बाहर से फड़िया आते थे जो लोगों से फुटकर में कृषि उपज खरीदते थे ।वीरेन्द्र जी को यह धंधा अच्छा लगा इस बार जब मंगलवार आया तो वह भी दरी बिछाकर तराजू बाँट लेकर अपनी फड़ लगाकर बैठ गए। उन्होंने न तौल में बेईमानी की न मौल में जबकि दूसरे फडिया यह सब करते रहे थे इसका परिणाम यह हुआ कि शाम को जब बाजार उठा तो उनके फड़ में सबसे अधिक मात्रा में अनाज था। वीरेन्द्र जी ने उसी दिन वो अनाज बैलगाड़ी में लादकर बड़े थोक व्यापारी को बैच दिया जो मुनाफा हुआ उसे देखकर वे खुद चौंक गए इतना रुपया तो वे दस दिन मजदूरी करते तब भी नहीं कमा पाते । अब उन्होंने आसपास के हाट बाजारों में भी फड़ लगाना शुरू कर दी थी अठारह साल की उम्र में तो उन्होंने गौतमनगर में गल्ले की बड़ी दुकान खोल ली थी इसका लायसेन्स भी उन्हें मिल गया था सैंकड़ों क्विंटल अनाज वे प्रतिदिन खरीटने लगे थे। इस कमाई से उन्होंने तीस एकड़ जमीन खरीद ली थी और बड़े भैया नरेन्द्र जी के हवाले कर,दी थी इसी के साथ डेरी भी उन्होंने खोल ली थी तीन एकड़ जमीन में बाग लगाया था जिसमें आम अभरूद आँवला नीबू के पेड़ लगाए गए थे । उनके पिताजी डेरी का काम देख रहे थे जब उनके परिवार का जीवन स्तर बढ़ा तो नरेन्द्र की शादी चे लिए कुई बड़े घरों से रिश्ते आए। नरेन्द्र जी की शादी बाईस साल की उम्र में हुई उसके चार साल बाद वीरेनूद्र जी को भी शादी हुई तब उनकी उम्र भी बाइस वर्ष की ही थी। नरेन्द्र की पत्नी उमा और वीरेन्द्र की पत्नी कीर्ती दोनों हिलमिलकर रहती थीं नरेन्द्र के दो बेटे श्याम और नीरज थे तथा वीरेन्द्र जी की दो बेटी कुसुम और सुमन थीं। परिवार को एक सूत्र में बाँधने का श्रेय वीरेन्द्र काका को था नरेन्द्र जी तो जितना वीरेन्द्र काका बताते उताना कर देते थे लेनदेन वीरेन्द्र जी के हाथ में था। वीरेन्द्र जी ने दोनों भतीजों के लिए अलग अलग मकान बनवाए थे दोनों बेटियों के लिए भी वैसे ही म कान बनवाए गए थे। उनके दो पेट्रोल पम्प तथा गैस की एजेन्सी थी दोनों भतीजों को उन्होंने एम बी ए कराया था तथा दोनों को कारोबारी बना दिया था उनकी दोनों बेटियाँ भी बिजनिस कर रही थीं। वीरेन्द्र काका ईमानदार मेहनती और न्याय प्रिय व्यक्ति थे जिसके कारण उनका पूरे शहर में बहुत सम्मान होता था। वे शहर के सबसे बड़े दान दाता भी थे तथा जरूरतमंदों की मदद करने में हमेशा आगे रहते थे यही कारण था कि आज उनका सत्तरवाँ जन्मदिन बड़े धूमधाम से मनाया गया था।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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