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कहानी: भानजे की किराना दुकान

राकेश अग्रवाल की न्यू बस स्टेण्ड के पास किराने की दुकान थी। यह दुकान कालका नगर की सबसे अच्छी दुकान मानी जाती थी। दुकान सुबह आठ बजे खुलती थी और रात के दस बजे तक बंद होती थी। इस बीच दुकान पर ग्राहकों का ताँता लगा रहता था। राकेश अग्रवाल बड़ा बाजार में स्थित मूलचंद किराना स्टोर्स के प्रोपरायटर मूलचंद के भानजे थे। मूलचंद जी की किराना दुकान नब्बे साल पुरानी थी जबकि राकेश को दुकान खोले हुए अभी दस साल ही हुए थे मगर फिर भी वे शहर के प्रमुख किराना व्यवसायी थे।
राकेश दस साल पहले तक अपने मामा मूलचंद की किराना दुकान पर काम करते थे। मूलचंद अपने भानजे राकेश को उस समय अपनी बहन विमला से लाए थे जब  राकेश जी की उम्र ग्यारह साल की थी और उन्होंने पाँचवी की परीक्षा पास कर ली थी। उस समय मूलचंद जी की अपनी संतान नहीं थी। राकेश स्कूल से आने के बाद दुकान पर आ जाते और अपने मामा के काम में हाथ बँटाते थे। राकेश जी के हायर सेकेण्डरी पास होने के बाद मूलचंद जी ने उनकी पढ़ाई छुड़वा दी थी। अब वो पूरे समय किराने की दुकान पर रहकर काम करते थे। मूलचंद की दो संतान हुई थीं जिसमें बेटी का श्वेता तथा बेटे का नाम सौरभ था। मूलचंद जी ने जब राकेश इक्कीस साल के थे तभी उनकी शादी कर दी थी। अब राकेश की बहू मामी के कामों में हाथ बँटाती थी और राकेश दुकान पर दिनभर काम करते थे। मूलचंद जी राकेश जी का भरपूर शोषण कर रहे थे। राकेश जी को पूरे सत्ताइस साल हो गए थे मूलचंद जी के यहाँ काम करते हुए। वे अपने बच्चों का पालन पोषण बड़े लाड़ प्यार से कर रहे थे जबकि राकेश को वे बिना वेतन का नौकर समझते थे। आज जो मूलचंद जी की दुकान शहर की प्रतिष्ठित दुकान थी तो राकेश जी की बदौलत। धीरे धीरे मूलचंद जी का व्यवहार राकेश जी के साथ कटू होता चला गया। वो किसी के भी सामने राकेश की बेइज्जती कर देते थे। ग्राहकों के सामने ही उन्हें बुरी तरह डाँटते तथा अपमानजनक व्यवहार करते थे। यह सब देखकर राकेश बहुत दुखी रहते थे। सोचते मेरी निष्ठा का ये परिणाम तो कहीं से ठीक नहीं है। एक दिन मूलचंद जी ने साफ शब्दों में राकेश से कह दिया कि मैं तुम्हें दुकान से हटा रहा हूँ। तुम्हारे लिए एक दुकान देखी है मैंने मैं तुम्हें कुछ रुपये दूँगा और दुकान में सामान भी मैं भर दूँगा मगर मूलचंद जी की बातें हवाई थीं। शहर के आखिरी कोने की दुकान किराये से लेकर मूलचंद जी ने राकेश को दी थी और दुकान में जो उन्हें सामान मूलचंद जी ने दिया वो सामान भी अच्छी गुणवत्ता का नहीं था पर राकेश क्या करते उसी दुकान में अपनी किस्मत आज़माने के लिए आ गए। नगर प्रशासन ने नए बस स्टैण्ड के लिए जो जगह चिन्हित की उसके बगल का छः हजार वर्गफीट का प्लॉट राकेश जी ने पहले ही खरीद रखा था। इधर राकेश जी की दुकान खूब चल निकली थी जिसे देख मामा को बड़ी जलन होती थी। आखिर जब मूलचंद जी से जलन सहन नहीं हुई तो उन्होंने दुकान मालिक के कान भर दिए और मकान मालिक ने दुकान खाली करने का नोटिस दे दिया था। राकेश समझ गए थे कि यह चाल उनके मामा की ही चली हुई है। उन्होंने बैंक से लोन लिया और अपने छः हज़ार वर्गफीट के प्लॉट पर बढ़िया सुपर बाजार बना दिया। नया बस स्टेण्ड बन गया था, बसें रुकने लगी थीं। कई कॉलोनियाँ बन गई थीं। तेजी से निर्माण कार्य हो रहे थे, शहर आगे की तरफ बढ़ रहा था। दो साल में वो पूरा सूना एरिया आबाद हो गया था। बहुत सी दुकानें खुल गईं थीं। राकेश जी का सुपर बाजार भी खूब चल निकला था।जबकि मामा का तो सारा कारोबार धीरे धीरे खत्म होता जा रहा था। उन्हें अपने किए की सजा मिल रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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