राजेश निशा की आज शादी की पच्चीसवीं सालगिरह थी जो उन्होंने बड़ी धूमधाम से मनाई थी। उनके बेटे रोहन ने भी अपना एम बी ए पूरा कर लिया था और उसे अच्छा पैकेज मिला था जबकि अभी उसकी उम्र मात्र तेईस वर्ष ही थी। बेटी अमिता का बी एस सी, बी एड कंपलीट हो गया था तथा वो सरकारी स्कूल में नौकरी के लिए प्रयासरत थी। आज राजेश और निशा की रिश्ते की डोर बहुत मजबूत थी पर आज से बीस साल पहले यह डोर टूटते-टूटते बची थी।
पच्चीस साल पहले जब निशा और राजेश की शादी हुई थी तब राजेश शिक्षा विभाग में एल डी सी के पद पर कार्यरत थे जबकि निशा के पिता सुरेशचंद्र भाई राकेश सुपर स्टोर चलाते थे। उनका जमा-जमाया व्यापार था अच्छी कमाई होती थी तथा परिवार आर्थिक रूप से सुदृढ़ था। दूसरी ओर राजेश के पिताजी रमेश और भाई दिनेश सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। उनका जीवन स्तर साधारण था। शादी के बाद निशा को अपनी ससुराल का रहन-सहन समझ में नहीं आया। वह सोचती ये लोग इतने कम पैसे में कैसे अपना गुजारा करते होंगे जबकि वे सब आराम से अपना जीवन यापन कर रहे थे। एक दिन निशा ने राजेश से पूछा आपको कितनी तनख्वाह मिलती है। जब राजेश ने अपनी तनख्वाह बताई तो सुनकर निशा को बहुत धक्का लगा बोली इतनी कम तनख्वाह है आपकी अगर हम अलग हो गए तो इस तनख्वाह में कैसे अपना गुजारा करेंगे। फिर कहने लगी इतना रुपया तो मैं अपने पर खर्च कर देती थी। राजेश ने जवाब दिया कि हम तो नौकरी पेशा हैं हमें बँधी-बँधाई तनख्वाह मिलती है इसी में हमें महीने का खर्च चलाना पड़ता है। निशा राजेश के उत्तर से खुश नहीं थी। कुछ दिनों बाद उसके भैया उसे लेने आए तो निशा मायके जाकर अपने मम्मी-पापा से खूब लड़ी। बोली आपने मेरी गरीबों के परिवार में शादी क्यूं की, इससे तो अच्छा होता कि आप मुझे कुएँ में धकेल देते। उस पर किसी की समझाइश का असर नहीं हो रहा था। निशा ज्यादातर मायके मे ही रहा करती थी, ससुराल बहुत कम जाती थी। इधर उसके भाई की शादी भी हो गई थी तथा भाभी आ गई थी। इस तरह पूरे चार साल हो गए थे। निशा दो बच्चों की माँ बन गई थी। राजेश जब भी निशा से मिलने ससुराल आते तो उनसे कोई अच्छा व्यवहार नहीं करता था। सब उन्हें नीचा दिखाते, वे निशा और बच्चों की खातिर अपमान सहकर भी वहाँ रहते थे। एक दिन निशा के पापा ने राजेश से कहा- नौकरी में क्या रखा है इतनी कम तनख्वाह में कैसे गुजारा चलेगा। ऐसा करो नौकरी छोड़ दो मैं तुम्हें दुकान खुलवा देता हूँ फिर तुम भी यहीं हमारे साथ रहना। ससुर की बात सुनकर राजेश अनमना हो गया पर उसने नौकरी छोड़ने से साफ इंकार कर दिया। इस पर निशा बोली अगर पापा की बात नहीं मानते तो मुझ से भी कोई रिश्ता मत रखो। या तो नौकरी छोड़ो या मुझे छोड़ दो। राजेश कुछ नहीं बोले चुपचाप अपने घर आ गए। इसके बाद वे जब भी निशा को फोन लगाते तो वह यही कहती कब नौकरी छोड़ रहे हो और जब वो मना करते तो निशा फोन काट देती थी। आखिर राजेश ने फोन करना ही बंद कर दिया। ससुराल जाना तो उनका छूट ही गया था। इधर जब निशा के भाभी-भैया को ये लगा कि निशा अब हमेशा के लिए यहाँ रहेगी तो उनके व्यवहार में परिवर्तन आ गया। निशा के ठाठ-बाट सब खत्म हो गए थे। निशा की भाभी ने उसे नौकरानी बनाकर रख दिया था। सुबह छः बजे से रात के दस बजे तक वो घर के काम में लगी रहती थी। पापा, मम्मी और भाई अब उसका पक्ष नहीं लेते थे। उसके दोनों बच्चों की बिना कसूर के ही अक्सर पिटाई कर दी जाती थी। अब निशा को राजेश की बहुत याद आती थी। वो अब राजेश के फोन का इंतजार करती पर राजेश जी का फोन नहीं आता था। एक दिन की बात है एक अत्यंत सुंदर युवती निशा के पास आई और बोली क्या आपका नाम ही निशा है। निशा के हाँ कहने पर उसने कहा मैं राजेश जी के ऑफिस में काम करती हूँ वो बहुत अच्छे नेकदिल इंसान हैं। मैं उनकी सज्जनता से प्रभावित हूँ, मैं उन्हें अक्सर उदास देखा करती थी जब मैंने उनकी उदासी का कारण पूछा तो उन्होंने तुम्हारा नाम लिया इसलिए मैं तुम्हारे पास आई हूँ। अगर तुम उनके साथ नहीं रहना चाहतीं तो उन्हें तलाक दे दो उनके दोनों बच्चे उन्हें लौटा दो फिर अपनी मनपसंद व्यक्ति से शादी कर लो। तुम भी खुश और वे भी खुश। इस पर निशा बोली तुम कौन होती हो मुझको ऐसी सलाह देने वाली। तब वो युवती बोली मैं राजेश जी को बहुत चाहती हूँ और उनसे शादी करना चाहती हूँ। मुझे अच्छी तरह मालूम है उनसे अच्छा इंसान मुझे कोई और नहीं मिलेगा, मैं दोनों बच्चों को भी अपना लूँगी। यह सुनकर निशा अवाक रह गई क्या जवाब देती सारी गलती तो उसी की थी। वो युवती तो चली गई लेकिन निशा को बेचैनी दे गई। उसने राजेश का नंबर ढूँढकर उसे फोन लगाया और बोली फोन करना क्यों बंद कर दिया। राजेश बोले क्योंकि तुम फोन पर बात ही कहाँ करती हो। निशा ने कहा मैं रात को फोन लगाती हूँ आपसे जरूरी बात करना है और रात को दस बजे निशा ने राजेश को फोन लगाया। वो रात के तीन बजे तक राजेश से बात करती रही बार-बार अपनी भूल स्वीकार कर माफी माँगती रही और बोली मुझे लेने आ जाओ मैं आपके साथ खुश रह लूँगी आपकी तनख्वाह इतनी भी कम नहीं है कि हम ठीक से न रह सकें। राजेश बोले ठीक है मैं कल ही तुम्हें लेने आ रहा हूँ। निशा बोली मैं तैयार रहूँगी। राजेश जब निशा को लेने आए तो ससुराल वालों ने उनसे कोई झगड़ा नहीं किया बल्कि निशा को खुशी-खुशी उनके साथ विदा कर दिया। निशा इसके बाद कभी अपने मायके नहीं गई न उसने फिर मायके वालों से कोई वास्ता रखा। यहाँ आकर उसने एक दुकान किराये से ली और महिला स्टोर खोल लिया। कुछ ही दिनों में उसकी दुकान चल निकली। इससे वे भी संपन्न और खुशहाल जीवन जीने लगे। एक दिन निशा ने राजेश से कहा वो जो युवती मेरे पास आई थी वो क्या आपसे शादी करने वाली थी। राजेश बोले- कौन वो युवती, अरे वो तो सरला है वो तो पहले से ही शादीशुदा थी। हमारे ऑफिस में ही काम करती है। उससे मेरा दुख नहीं देखा गया था इसलिए वो तुम्हारी मनोदशा जानने के लिए तुम्हारे पास आई थी। विश्वास करो मेरे जीवन मैं तुम्हारे सिवा कोई ओर नहीं है। सुनकर निशा बोली सरला सही कह रही थी आपसे अच्छा और नेक इंसान दुनिया में और कोई नहीं हो सकता।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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