सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: ढोलकिया की वापसी

सुखलाल कस्बे के सबसे अच्छे ढोल एवं ढोलक बजाने वाले के रूप में विख्यात थे उनकी पूरी टीम थी कस्बे में जितने ढोल एवं ढोलक बजाने वाले थे सब उनके शिष्य थे और उन्हें बहुत मानते थे। इसके बावजूद भी उनसे अच्छा ढोल बजाने वाला दूर दूर तक कोई भी नहीं था उनकी उम्र सत्तर वर्ष की हो गई थी मगर देखने में वे पचास के लगते थे छः महीने उन्हें उनका लडका राजेश अपने साथ भोपाल ले गया वहाँ उनका बेटा और उनकी बहू सरकारी नौकरी करते थे दोनों यह कहकर उन्हें अपने साथ ले गए थे कि आपने जिंदगी भर बहुत काम किया है अब हमें भी सेवा का अवसर दो । मगर छः महीने में ही वे वापस अपने कस्बे में आ गए थे।
सुखलाल जी ने अपना छः महीने से बंद पड़ा घर का ताला खोला वहाँ रखे अपने ढोल देखकर उन्हें बड़ी ख़ुशी हुई उनके आने की ख़बर उनके शिष्यों को जैसे ही लगी सभी बहुत ख़ुश हुए क्योंकि सब उनकी कमी महसूस कर रहे थे आते ही पूरे एक घंटे तक उन्होंने रियाज किया था तब कहीं उनके मन को संतोष मिला था जो छः महीने उन्होंने अपने बेटे के घर बिताए थे वे एक एक दिन उनका बहुत भारी बीता था शुरू के चार पाँच दिन तक तो वे ठीक से रहे बाद में पता चला की राजेश की नज़र उनकी जमीन जायदाद पर है वह पहले तो इशारों में और फिर खुलकर कहने लगा कि आप अपनी सारी संपत्ति बेच दें और यहाँ आराम से रहें भोपाल में उन पैसों से एक बड़ा मकान खरीद लेंगे तो ठीक रहेगा फिर एक दिन राजेश की बहू सुलभा बोली बाबूजी माँ जी के जो जेवर,आपने लॉकर में रख रखे हैं वे पुरानी डिजाइन के हो गए हैं उन्हें देकर आधुनिक डिजाइन के जेवर खरीद लें तो कैसा रहे एक दिन राजेश उनकी एफ डी और बैंक बैलेन्स के विषय में बात करने लगा और बोला सारा पैसा एक खाते में जमा कर लें आपके और मेरे नाम से संयुक्त खाता रहेगा तो आपके बाद कोई परेशानी नहीं होगी धीरे धीरे सुखलाल जी को यह अहसास हो गया कि उनका बेटा बहू दोनों लालची और मतलबी हैं वो उनकी सेवा करने के लिए उन्हें नहीं लाए बल्कि उनकी धन संपत्ति हड़पना चाहते हैं। और जैसे ही वे अपनी सारी जमा पूँजी उनके हवाले कर देंगे वैसे ही वे उन्हें घर से बाहर निकाल देंगे जब राजेश और उसकी पत्नी सुलभा को यह पता चल गया कि सुखलाल उनके इरादे भाँप गए हैं और अपने जीते जी उन्हें एक धेला भी नहीं देने वाले तो उन्होंने सुखलाल जी की उपेक्षा करना शुरू कर दी ताने उलाहना देने लगे अपमानित करने लगे सुखलाल यह सब कब तक सहन करते आखिर एक दिन उन्होंने राजेश से अपने कस्बे में जाने की बात कही तो राजेश फौरन तैयार हो गया तथा दूसरे दिन उन्हें बस में भी बिठाकर आ गया सुखलाल जी ने अपने घर में कदम रखते ही यह तय कर लिया था कि अब वे मरते दम तक यहीं रहेंगे यहाँ से कहीं नहीं जाएँगे यहाँ उनके अनेको शिष्य हैं जो उनकी निस्वार्थ भाव से सेवा करने में हमेशा तत्पर रहते हैं।


*****
रचनाकार
प्रदीन कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...