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कहानी: संरक्षण

आलोक और रवीना की शादी को अभी ग्यारह साल भी पूरे नहीं हुए थे और वे पिछले दस सालों से अपनी बुआ कुसुम कसंम के सरक्षण में रह रहे थे आलोक का बेटा मोहित और बिटिया मोनिका कांवेण्ट स्कूल में पढ़ रहे थे आलोक की बाजार में रेडीमेड कपड़ों की दुकान थी। रवीना अपनी बुआ सास कुसुम को बहुत मानती थी क्योंकि उन्हीं की बदौलत आज वो जीवित थी वरना कब की जलाकर मार दी गई होती। आज के ही दिन बुआ उनको अपने यहाँ लेकर आईं थीं उनका मकान बहुत बड़ा था उसके एक हिस्से में उन्होंने आलोक एवं रवीना के रहने की व्यवस्था की थी फूफाजी ने जो दुकान किराये पर दे रखी थी वो खाली कराकर आलोक की दुकान खुलवाई थी जिसका किराया वो आज तक नहीं लेते थे कहते थे ये दुकान तुम्हारी है तुम इसके मालिक हो फिर किराया कैसा।
आलोक की रवीना से शादी कराने में भी कुसुम बुआ की बड़ी भूमिका था रवीना की मम्मी टीना कुसुम की बचपन की सहेली थी रवीना के पापा अशोक भी कारोबारी थे रवीना पढी लिखी और खूबसूरत लडकी थी आलोक भी सुदर्शन नवयुवक था कुसुम बुआ के कहने पर ही रवीना का रिश्ता आलोक से तय हुआ था। कुसुम ने रवीना की मम्मी को पूरा आश्वासन दिया था कि वे रवीना को अपने सःरक्षण में रखेंगी रवीना की सास सुमन और ननद सुरेखा भी आलोक एवं रवीना से विवाह पर बड़े खुश दिखाई दे रहे थे। रवीना के पिता ने खूब दहेज दिया था जेवर,और नगदी भी खूब दी थी। रवीना और आलोक की जोडी की सभी सराहना कर रहे थे।कुसुम बुआ सबसे अधिच खुश दिखाई दे रहीं थी क्योंकि रवीना उनकी अपनी बेटी से बढकर जो थी। शादी चे कुछ दिन तक तो सब ठीक ठाक चलता रहा फिर सास और ननद मिलकर रवीना के काम में मीन मेख निकालने लगीं ननद को रवीना को परेशान करने में मजा आने लगा था रवीना इस माहौल,के लिए तैयार नहीं थी अपनी तरह से वो उनको खुश रखने की हर संभव कोशिश करती पर फिर भी उनकी त्यौरियाँ चढ़ी रहतीं थीं एक दिन रवीना ने जब अपनी सास को पड़ोसन से अपनी बुराई करते सुना तो वो बड़ी दुखी हुई सास कह रही थी इससे बेटे की शादी कर के पछता रही हूँ आलोक के लिए कई रिश्ते आ रहे थे मेरी ही मति मारी गई थी जो मैं आलोक की इससे शादी कराने को राजी हो गई। रवीना एक बात से और दुखी थी उसकी सास और ननद हर समय आलोक को उसके खिलाफ भड़काती रहतीं थीं वो चाहती थीं की आलोक उसे प्रताडित करे पर आलोक हमेशा रवीना का पक्ष लेता इससे उनकी खीज और बढ़ जाती एक दिन रवीना की सास ने आलोक से कहा तू रवीना को तलाक दे दे मैं तेरी इससे अच्छी लड़की से दूसरी शादी करा दूँगी पर आलोक ने साफ मना कर दिया । उसका कारण ये था कि दोनों में एक दूसरे के प्रति अगाध प्रेम था रवीना अपने पति का प्रेम पाकर ही खुश थी और अपनी सास ननद को बर्दाश्त कर रही थी एक बार आलोक ने कहा भी कि हम इनसे अलग होकर रहें तो कैसा हो इस पर रवीना ने मना कर दिया । रवीना को चार माह का गर्भ था और वो माँ बनने वाली थी इसके बाद भी उसकी सास उसे सुबह छः बजे से रात के ग्यारह बजे तक काम में लगाए रहती जबकि रवीना की ननद बिल्कुल भी काम नहीं करती थी। रवीना कभी कभी बुआ से फोन पर बातें कर लेती थी। बुआ रवीना की बातों से यह जान गई थी कि कुछ तो गड़बड़ चल रहा है। 
कुसुम बुआ बस स्टॉप पर बस का इंतजार चर रही थी तभी बुआ को अपने भैया के पड़ोस में रहने वाली रजनी दिखाई दी वो कह रही थी कि आपकी भाभी को घासलेट की जरूरत कैसे पड़ गई उन्होंने दस लिटर घासलेट आज ही मँगाया है। कुसुम को सारी बात समझते देर नहीं लगी उन्होंने तुरंत ऑटो लिया और नवीन नगर की तरफ चल पड़ी ऑटो वाले से कहा एक जिंदगी बचाना है तेजी से चले चलो ऑटो वाले ने भी ऑटो खूब स्पीड से चलाया और मात्र दस मिनट में पैंतीस मिनट का सफर पूरा कर दिया वे तेजी से आलोक के घर आईं उनकी भाभी उन्हें देखकर हडबड़ा गई सामने घासलेट की केन रखी थी । उन्होंने रवीना के विषय में पूछा । भैया और आलोक घर में नहीं थे रवीना की सास ने बुआ से रवीना की बुराई करना शुरू कर दी मगर बुआ की निगाहे रवीना को ढूँढ रही थीं उन्होंने रवीना के विषय में पूछा तो घृणा से बोली होगी कहाँ कोपभवन में बैठी होगी वे तेजी से रवीना के कमरे की तरफ गई तो देखा कि बाहर की तरफ से कुंडी लगी है। उन्होंने भाभी से कहा कि बाहर से कुंडी क्यों लगाई भाभी सुनकर झेंप गई जैसे ही बुआ ने दरवाजा खोला तो रवीना बदहवास हालात में जमीन पर पड़ी थी उसकी बेरहमी से उसकी सास तथा ननद ने पिटाई की थी उससे ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था बुआ को देखते ही वो उनसे लिपटकर बोली मौसी (वो बुआ से मौसी ही कहती थी ) मुझे बचा लो ये लोग मुझे जान से मारने पर उतारू हैं। बुआ ने उसके सिर पर हाथ फेर कर कहा बेटी चिंता मत कर मैं आ गई न अब डर की कोई बात नहीं। और फिर बुआ ने अपनी भाभी की एक न सुनी जिस हालत में रवीना थी उसी हालत में उसे लेकर अपने घर आ गई शाम को आलोक बुआ के पास आया उसकी आँखों में आँसू थे कह रहा था मुझे माँ से ऐसी उम्भीद नहीं थी। मैंने अपने कानों से सुना माँ मेरी बहन से कह रही थी कि अगर दस मिनट और ये बुआ न आती तो आज रवीना का काम तमाम हो जाता। मेरी माँ इतनी बेरहम भी हो सकती है कि चार माह की गर्भवती अपनी बहू को जिंदा जलाकर मारने की योजना बनाए। वो बुआ से बार बार कह रहा था आज आपने एक नहीं दो जान बचाई हैं अगर रवीना को कुछ हो जाता तो मैं भी जिंदा नहीं रहता। फिर वो रवीना से बोला चलो थाने माँ और बहन के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करना है मगर रवीना ने साफ मना कर दिया। जो हो गया सो हो गया मैं आपके सामने जिंदा हूँ ये क्या बड़ी बात नहीं है। इसके बाद आज पूरे दस साल हो गए आलोक कभी अपनी मम्मी और बहन से मिलने घर नहीं गया पापा जरूर हर पंद्रह दिन में एक बार आकर हाल चाल मालूम कर लेते थे आलोक अपनी बहन की शादी में भी शामिल नहीं हुआ था उसकी मम्मी की बुआ से तभी से दुश्मनी हो गई थी जो अभी तक चल रही थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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