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कहानी: वैज्ञानिक प्राइमरी शिक्षक

रामबाबू वर्मा जो एक ग्रामीण अंचल के गाँव ताजपुर की प्राथमिक शाला में प्राथमिक शिक्षक थे उन्हें छः माह पूर्व राष्ट्रीय विज्ञान मेला में प्रथम पुरुस्कार मिला था तभी से वे चर्चित हो गए थे और इन छः महीने में वे जमीन से आसमान में पहुँच गए थे। अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान सभा ने उन्हें अपना फैलो बनाया था। उनके शोध विश्वस्तरीय विज्ञान पत्रिकाओं में छप रहे थे। एक दर्जन विश्वविद्यालयों ने उन्हें पी एच डी की उपाधि प्रदान की थी तथा नोबल प्राइज के लिए उन्हें नामित किया गया था।
आज रामबाबू वर्मा किसी पहचान के मौहताज नहीं थे। श्री वर्मा का प्रारंभिक जीवन गाँव में ही बीता था। ताजपुरा में उनके पिता हरीश बाबू प्राथमिक शिक्षक थे। रामबाबू ने एम एस सी फिजिक्स के अंतिम सेमिस्टर की परीक्षा दी ही थी कि अचानक गाँव से दुखद संदेश आया कि उनके पिताजी का हार्ट अटेक के कारण दुखद निधन हो गया था। वे तुरंत गाँव आए पिताजी की उत्तर क्रिया की तथा फिर पिताजी के फंड निकलवाने में व्यस्त हो गए। उन्हें शासन ने अनुकंपा नियुक्ति तो दी पर एम एस सी गोल्ड मेडलिस्ट होने के बाद भी उन्हें प्राथमिक शिक्षक ही बनाया। वे पूरे तीन साल ताजपुरा में प्राथमिक शिक्षक के पद पर कार्य करते रहे। तब तक किसी को अंदाजा भी नहीं था कि वे देश के महान वैज्ञानिक हैं। उनके पास के गाँव वीरपुर के हाई स्कूल का विज्ञान शिक्षक जो हायर सेकेण्डरी पास था उन्हें कमतर समझता था। लेकिन रामबाबू सर इसकी परवाह नहीं करते थे। उनका स्कूल के बाद का सारा समय अनुसंधान में व्यतीत होता था। वे रसायन शास्त्र, वनस्पति और जीव विज्ञान के भी ज्ञाता थे फिर भी वे अपने आपको जाहिर नहीं करते थे। इसका कारण एक घटना है जब वे कॉलेज में बी एस सी प्रथम वर्ष में पढ़ रहे थे तब एक निबंध प्रतियोगिता में उन्होंने हिस्सा लिया था जिसमें उनका चयन नहीं हुआ था। प्रथम विधायक का पुत्र आया था पर भौतिक विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर रविकाँत ने उनका निबंध हुबहू अपने नाम से विज्ञान की राष्ट्रीय पत्रिका में छपवाया था और खूब वाह वाही बटोरी थी। तब उन्हें पता चला था कि इनकी पी एच डी भी चोरी की है। जब यह बात रामबाबू ने चपरासी कमल नूर को बताई तो वो बोला यह जो प्राचार्य हैं न मदन अशोक इन्होंने मेरी दस ग़ज़लों पर डाका डाला है और अपने नाम से धड़ल्ले से सुना रहे हैं और पूरी दुनिया में नाम कमा रहे हैं और हम वहीं के वहीं हैं। इनसे बड़ा अहसान फरामोश और कौन होगा जिन्होंने मेरा बाबू के पद पर प्रमोशन नहीं होने दिया। इनके कारण मैं अपनी ही रचना अपनी कहकर कहीं नहीं पढ़ पा रहा हूँ। यह जो बड़े लोग हैं उनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने प्रतिभाओं के गले बेरहमी से घोंटे हैं। इनसे बचकर रहना कभी अपनी बौद्धिक संपदा भूलकर भी इनके हवाले मत कर देना। नहीं तो यह तो आकाश पर पहुँच जाएँगे और तुम्हें जमीन में दफ़न कर देंगे। तभी से रामबाबू जी ने अपना सारा कार्य गोपनीय रखा था। वो कभी किसी से इसका जिक्र तक नहीं करते थे। वे एक उचित अवसर की तलाश में थे। उनका नाम डी एड प्रशिक्षण के लिए आया था और वे डाईट में रहकर डी एड का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। उसी दौरान राज्य स्तरीय विज्ञान मेले का आयोजन हुआ जिसमें वे प्रतिभागी के रूप में शामिल हुए। पर्यावरण पर उन्होंने जो मॉडल बनाया था वो जल एवं वायु प्रदूषण को जीरो प्रदर्शित कर रहा था। उनका मॅडल राष्ट्रीय विज्ञान मेला के लिए चयनित हो गया था। वे मेले में शामिल होने गए उस मेले को देखने बड़े बड़े लोग आए थे। उनमें से कई उद्योगपति भी थे वे उनके मॉडल से प्रभावित तो हो रहे थे लेकिन उनके प्राइमरी शिक्षक होने के कारण उन्हें महत्तव नहीं दे रहे थे। उस प्रदर्शनी में निर्णायक के तौर पर देश के जाने माने वैज्ञानिक आर के रस्तोगी जी आए। उनकी आँखें रामबाबू के मॉडल पर ठहर गईं। बहुत देर तक वे रामबाबू जी से इस संबंध में सवाल जवाब करते रहे फिर धीरे से बोले कोई कितना ही बड़ा किसी भी प्रकार का प्रलोभन देकर इसका पेपरवर्क तुमसे माँगे तो उसे मत देना, करोड़ों रुपये में भी नहीं और अगर मैं भी माँगू तो मुझे भी मत देना। रामबाबू बोले आपकी बात हमेशा याद रखूँगा। वे रामबाबू का हाथ दबाकर बोले आज मैं देश के सबसे महान वैज्ञानिक से मिला हूँ मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम एक प्राथमिक शिक्षक हो। मैं तो इतना जानता हूँ कि तुम हम सब पर भारी हो। फिर उन्होंने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका का पता दिया और कहा कि इसमें अपना पेपरवर्क भेजो फिर देखो क्या चमत्कार होता है। रामबाबू को राष्ट्रीय विज्ञान मेले में भी प्रथम पुरुस्कार मिला था। लेकिन इस पुरुस्कार से उनके डाइट के विज्ञान के व्याख्याता सौरभ सिन्हा खुश नहीं थे। इसकी खीज उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी। इधर रामबाबू सर ने अपने पेपरवर्क की समरी पत्रिका में भेज दी थी जो पूरे पचपन पेज की थी। उसके छपते ही तहलका मच गया था। पत्रिका की पूरी टीम उनके साथ ताजपुरा गाँव आई थी। उनके पास जो शोधकार्य था उसमें पूरे आठ हज़ार पेज थे। उस पत्रिका ने अक्षरशः वो शोधपत्र प्रकाशित किया था जिसकी हर ओर धूम मच गई थी। उस शोध प्रबंध पर उन्हें दर्जन भर विश्वविद्यालयों ने पी एच डी की उपाधि प्रदान कर दी थी।  नोबल प्राइज के लिए उनका नाम गया था। विश्व के नामी उद्योगपति उनसे संपर्क कर रहे थे। धन की वर्षा हो रही थी। इस भारी शोर से राज्य सरकार की नींद खुली। शिक्षा विभाग में भी खलबली मची, जिन अधिकारियों ने उन्हें एम एस सी गोल्डमेडलिस्ट होने के बाद भी उन्हें प्राथमिक शिक्षक बनाया था उनमें घबराहट थी। वे अपना पसीना पौंछते नजर आ रहे थे। राज्य शासन ने केबिनेट की बैठक बुलाकर उन्हें यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति प्रदान की थी। इससे डाइट के विज्ञान के वे व्याख्याता अब उनसे झेंप रहे थे। पूरे क्षेत्र के लोग उनकी उपलब्धि पर गर्व कर रहे थे। जबकि रामबाबू इन सबसे अविचलित रहते हुए अपने भावी कार्य की रूपरेखा बना रहे थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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