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कहानी: बुढ़ापे में शादी

सुरेश की उम्र बहत्तर वर्ष की थी और उनकी कुसुम से शादी हुए आज पूरे छः वर्ष हो गए थे। कुसुम की उम्र सत्तर वर्ष की थी उन्होंने अपनी शादी की छठवीं वर्षगाँठ बड़ी धूमधाम से मनाई थी। उन्हें खुशहाल देखकर सभी खुश थे, सभी ने उन्हें बधाई दी थी। दोनों बुढ़ापे में एक दूसरे का सहारा बने हुए थे। दोनों को ही पेंशन मिल रही थी। इसलिए पैसे की उनके पास कोई तंगी नहीं थी, दोनों अच्छा जीवन जी रहे थे।
कुसुम और सुरेश की मुलाकात सात वर्ष पूर्व नेहरू पार्क में हुई थी। तब कुसुम तिरेसठ वर्ष की थी। वो पंजीयन विभाग में बड़े बाबू के पद से रिटायर हुई थी। रिटायर हुए उसे तीन वर्ष हो गए थे। वहीं सुरेश आबकारी विभाग में एकाउण्टेंट थे। उन्हें रिटायर हुए पाँच वर्ष हो गए थे। कुसुम और सुरेश सुबह रोज घूमने जाते थे। वहाँ से नेहरू पार्क में कुछ देर बैंच पर बैठते थे। इसके बाद अपने घर आ जाते थे। दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला तभी शुरू हुआ था। कुसुम ने बताया कि वो अकेली रहती है। उसकी बेटी कामना तथा बेटे कमल आस्ट्रेलिया में रहते हैं, वे वहीं सेटल हो गए हैं, उनके अपने अपने परिवार हैं। कुसुम के पति कमलेश का निधन हुए बारह वर्ष हो गए हैं। जब वह रिटायर हुईं तब उनका बेटा कमल और बहू कुमुदनी उन्हें यह कहकर अपने साथ आस्ट्रेलिये ले गए कि आप अब हमारे साथ वहीं रहना यहाँ आपकी देखभाल कौन करेगा। उनकी बेटी कामिनी की भी यही इच्छा थी। वे क्या करतीं सोचा वहाँ बच्चों के बीच में रहूँगी तो अच्छा लगेगा। वे आस्ट्रेलिया में दो साल रहीं पर इन दो सालों ने उन्हें तोड़कर रख दिया। अपनी ही संतान के व्यवहार ने उन्हें आहत कर दिया। उनकी बेटी कामिनी, बेटा कमल बहू कुमुदनी ने मिलकर उन्हें दो साल तक खूब लूटा। सारी जमीन जायदाद बिकवा दी, सारे जेवर ले लिए पूरा बैंक बैलेंस खाली कर दिया। अब उनके पास नेहरू नगर का एक मकान बचा था। कमल और कामिनी वो भी बिकवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने खूब दबाव बनाया। लेकिन तब तक वो उनकी चालें समझ चुकीं थीं। उन्होंने नेहरू नगर का मकान बेचने से साफ इंकार कर दिया। इसके कुछ दिन बाद ही कमल तथा कामिनी के व्यवहार में परिवर्तन आ गया। एक दिन कमल बोला मम्मी मुझे मालूम है आपको भारत देश की बहुत याद आ रही है। चलो कुछ दिन के लिए भारत चलते हैं। ऐसा कहकर वो मुझे भारत ले आए और यहीं छोड़कर चले गए। फिर उन्होंने कुसुम की कोई खोज खबर नहीं ली है। कुसुम बोली- तबसे अकेली अपना समय गुजार रही हूँ। उसकी बात सुनकर सुरेश बोले मैं भी आपकी तरह ही अभागा हूँ। मैंने तो शादी ही नहीं की सारी उम्र अपने भाई भतीजों का भविष्य ही उज्जवल बनाता रहा। अब सभी ने मुझे अकेला छोड़ दिया है। सब अपने घर परिवार में रम गए, मैं भी अकेला ही रह गया हूँ। बुढ़ापे में कोई साथ देने वाला नहीं है। वे रोज मिलते और बातें करते। एक दिन कुसुम सुरेश के घर आई, पूरा घर अस्त-व्यस्त था। उसने पूरा घर व्यवस्थित कर दिया। दूसरे दिन कुसुम का जन्मदिन था। इस अवसर पर उसने सुरेश को डिनर का निमंत्रण दिया। कुसुम का घर व्यवस्थित था जिसे देख सुरेश प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। उसने कुसुम की खूब प्रशंसा की। जन्मदिन पर वे दोनों ही थे। कुसुम ने और किसी को भी नहीं बुलाया था। दोनों के दिल में एक दूसरे के लिए जगह बन गई थी। आखिर दोनों ने शादी करने का फैसला ले लिया और इस तरह उनकी शादी हो गई। शादी में गिने-चुने लोग ही शामिल हुए थे। उनमें कुसुम के बहू-बेटा, बेटी-दामाद भी नहीं थे। न ही सुरेश के भाई भतीजे। सभी उनसे नाराज थे पर उन्हें किसी की भी परवाह नहीं थी। यह शादी सुरेश के जीवन में आनंद और भरपूर खुशियों का कारण बन गई थी। दोनों एक दूसरे के साथ खुश थे। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती थी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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