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कहानी: पति के मरने के बाद

सुरेखा के पति रामप्रकाश रायनगर के धनाढय व्यक्तियों में से थे उनका निधन हुए मात्र दस वर्ष ही हुए थे और उनका परिवार घोर,निर्धना के साथ जीवन यापन कर रहा था। सबसे बुरी हालत सुरेखा की थी वो मंदिर के सामने भीख माँगकर अपना पेट भर रही थी। एक जमाने में उसके बड़े रुतबे थे हज़ार दो हज़ार रुपयों को तो वो ऐसे ही खर्च कर देती आज रुपये दो रुपये की भीख माँग रही थी। दो दिन वो बीमार रही तो कोई छोज खबर लेने वाला नहीं न उसे खाना नसीब हुआ आज जब हिम्मत कर के आई तब थोड़े पोहे खाकर उसने अपनी भूख मिटाने का प्यास किया था।
सुरेखा को कभी कभी दस वर्ष पूर्व पति के साथ बिताए सुनहरे दिन बहुत याद आते थे उसके पति राम प्रकाश जी नगर के बड़े व्यवसायी थे खूब जमीन जायदाद ये सब उन्हें विरासत में नहीं मिला था उनकी अपनी मेहनत की कमाई थी सुरेखा से जब उनकी शादी हुई तब उनका कारोबार अच्छा चल,रहा था सुरेखा निर्धन परिवार की लडकी थी यहाँ सब हरा भरा देखकर उसे हैरत होती थी वो यहाँ पर पैसों में हेराफेरी कर अपने मायके वालों की मदद तो करती ही थी ऊपर से भी पति पर दवाब डालकर बहुत से रुपये खर्च कराती थी शादी के पाँच सालों में वो दो बच्चों की माँ बन गई थी लड़के का नाम नवीन तथा लड़की का नाम नमिता था। रामप्रकाश जहाँ शाँत स्वभाव के थे वही सुरेखा खूब गुस्सैल थी । वो अपना भला बुरा किस में है इस पर ध्यान नहीं देती थी कच्चे कान की थी कोई झूठी शाकायत भी करे तो उस पर विश्वास कर लेती थी जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था वैसे वैसे उसका व्यवहार रूखा होता जा रहा था। बिना किसी कसूर के ही वह रामप्रकाश से झगड़ा करना शुरू कर देती थी रेमप्रकाश जी से पैसे लेकर अनाप शनाप खर्च करती रहती थी। अपने पति के बहुत सारे रुपये फिजूलखर्ची में उड़ा देती थी अगर राभप्रकाश जी टोकते तो उन्हें खूब जलीकटी सुनाती उसके दोनों बच्चे बड़े तो हो गए थे पर आज तक खुद से एक रुपया भी नहीं कमाया था फिर भी उन्हें अनाप शनाप रुपया खर्च करने की आदत पड़ गई थी । बच्चे भी रामप्रकाश से पैसे का ही वास्ता रखते थे दोनों की शादी होने के बाद भी उनमें जरा सा भी जिम्मेदारी का ऊहसास नहीं हुआ था। उन्हे इसकी जरूरत भी नहीं थी एक बार की बात है रामप्रकाश जी तीसकिलोमीटर दूर अपने खेत पर मजदूरों से सोयाबीन कटवा रहे थे कि अचानक उनका पाँव साँप पर पड़ गया और उसने रामप्रकाश जी को डँस लिया गाँव वाले झाड़ा फूँकी ही कराते रहे इधर विष ने अपना असर गहरा कर दिया रामप्रकाश जी जब तक होश में थे तब तक सभी से यह कहते रहे कि समय बर्बाद मत करो मुझे जल्दी से अस्पताल ले जाओ पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया फिर वे बेहोश हो गए उसी अवस्था में ही उनका दुखद निधन हो गया अस्पताल में डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया उनके मरने के बाद उनका परिवार उनकी संपत्ति का सही एडजस्ट मेन्ट नहीं कर सके दुकान ठप हो गई सारा कारोबार चौपट हो गया जमीन जायदाद बिकने लगी और एक दिन वो भी आया जब उनके पास बेचने को कुछ भी नहीं बचा तब कहीं नवीन ने नौकरी की वेतन बहुत कम था नमिता के पति सोहनलाल को शराब की लत थी उनकी हालत भी खराब थी ऐसे वक्त में ही सुरेखा को लकवा मार गया। सरकारी अस्पताल में उसका तीन महीने इलाज चला तब कहीं वो सहारे लेकर चलने लायक बन सकी थीं। 



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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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