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कहानी: पलायन

सुरजन को आज पूरे बीस साल हो गए थे अपने ग्राम बिशनखेडी से पलायन कर शहर में आए हुए। इन बीस सालों में उसकी बहुत तरक्की हुई थी। उसका बड़ा लड़का किशोर एस डी एम था और लड़की रूपा डॉक्टर। सुरजन ने बीस साल पहले जो चाय की छोटी सी दुकान खोली थी उसकी जगह पर आज मिलन रेस्टोरेन्ट था जो शहर का सबसे अच्छा रेस्टोरेन्ट माना जाता था। सुरजन साठ साल की उम्र में भी उस रेस्टोरेन्ट का संचालन सफलतापूर्वक कर रहे थे।
बीस साल पहले जब सुरजन ने बिशनखेड़ी गाँव से पलायन किया था उस समय उनके पास सिवाय कुछ फटे चीथड़ों और कुछ टूटे फूटे बर्तनों के सिवा और कुछ नहीं था। सुरजन ने एक निर्माणाधीन बहुमंजिला भवन में पूरे एक साल तक मजदूरी और चौकीदारी की थी। वहीं पर एक चाय की छोटी सी दुकान भी खोल ली थी जिसको उसकी पत्नी सरसुती चलाती थी। किशोर सरकारी स्कूल में नवमी में पढ़ रहा था। वैसे देखा जाय तो किशोर का भविष्य सुधारने के लिए सुरजन सिंह गाँव से शहर में आए थे। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो किशोर भी गाँव के दबंग उमराव सिंह के यहाँ बँधुआ मज़दूर बनकर रह गया होता। उमराव सिंह एक अत्याचारी व्यक्ति था। उसके चंगुल से बचकर निकलना मुश्किल था। उसके पास चार सौ एकड़ जमीन थी बिशन खेड़ी गाँव में, जिसकी आबादी दो हजार की थी। उसमें बाकी सबकी जमीन मिला भी दी जाए तो तीन सौ एकड़ ही होती थी। पूरे गाँव के लोग उमराव सिंह की तानाशाही का शिकार था। बिशनखेड़ी गाँव में उसकी इच्छा के बिना कुछ भी होना असंभव था। सुरजन का परिवार पिछली तीन पीढ़ी से उमराव सिंह का बँधुआ मजदूर बना हुआ था। सुरजन भी पंद्रह साल की उम्र से उमराव के खेतों में काम करे थे। यह काम करते हुए उन्हें पूरे पच्चीस साल हो गए थे। मगर उमराव सिंह के चंगुल से उन्हें अभी तक मुक्ति नहीं मिली थी न ही मिलने वाली थी। एक दिन उमराव ने सुरजन से कहा तेरा लड़का पंद्रह वर्ष का हो गया है उसे कल से काम पर भेज देना पालतू जानवर चराएगा और तेरे काम में हाथ बँटाएगा। यह सुनकर सुरजन काँप गया बोला मालिक किशोर ने आठवीं की परीक्षा में टॉप किया है उसकी इच्छा आगे पढ़ने की है। यह सुनकर उमराव सिंह बोला क्या करेगा तेरा लड़का आगे पढ़कर कोई कलेक्टर तो बन नहीं जाएगा आखिर उसे काम तो मेरे खेतों में ही करना है। यह कहकर उमराव सिंह चला गया उसका कहा पत्थर की लकीर की तरह था जिसे काटने की किसी में हिम्मत नहीं थी। सुरजन दुखी मन से घर आ गया उसे अपने होनहार बेटे को आगे बढ़ाना था पर कैसे बढ़ाए इसका उपाय उसे कुछ सूझ नहीं रहा था। तभी शाम को उसकी डोपड़ी पर उमराव सिंह का बेटा ओंकार सिंह आया और सुरजन से बोला कि कल पिताजी सुबह चार धाम की तीर्थयात्रा पर जा रहे हैं। वहीं एक महीने हरिद्वार कुँभ में भी रहेंगे इसका तुम फायदा उठाओ और इस गाँव से पलायन कर दो। तुम्हारा बेटा होनहार है इसके भविष्य की तरफ देखो जब तक पिताजी तीर्थ यात्रा से चार महीने बाद आएँगे तब तक बहुत कुछ बदल जाएगा। पिताजी से तो मैं निपट लूँगा तूम इसकी चिंता मत करो। सुरजन हाथ जोड़कर बोले छोटे मालिक मुझ गरीब से कहीं आप मज़ाक तो नहीं कर रहे। ओंकार बोले कैसी बातें कर रहो हो मैं गँभीरता से बात कर रहा हूँ। इससे अच्छा मौका फिर तुम्हें कभी नहीं मिलेगा। पूरा गाँव जानता था कि ओंकार सिंह एक नेक और सज्जन इंसान है। इसलिए सुरजन ने भी उनकी बात मान ली। उनके जाने के बाद सुरजन ने सारी बात अपनी पत्नी को बताई वो भी बोली ओंकार सिंह झूठ कभी कहते नहीं हैं। उनकी बात मान लेने में ही हमारी भलाई है। और मैं भी अच्छी तरह समझती हूँ। फिर वे पलायन की तैयारी में जुट गए थे। सुबह उमराव सिंह जी के जाने के बाद ही सुरजन ने भी उस गाँव से पलायन कर दिया था। जिसके कारण आज वे बेहतर हालत में थे।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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