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कहानी: सात साल की कानूनी लड़ाई के बाद मिला बेवा को हक

पति के दःखद निधन के पूरे सात साल बाद  विधवा सावित्री को  कानूनी लड़ाई लडने के बाद खेती एवं मकान पर हक मिला था। जिसमें पूरी तरह  जमीन तो उसे दो साल बाद कब्जे में मिली थी आज उसके खेत से गेहूँ की उपज उसके घर आई थी चार एकड़ में पूरे सौ क्विंटल गेहूँ हुए थे आधा एकड़ जमीन में वो सब्जियों की खेती कर रही थी जिससे उसे रोज अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही थी एक गाय पाल रखी थी जिसका दोनों समय का छःलीटर दूध वो डेरी में दे रही थी वो भी उसकी आमदानी का जरिया था। सावित्री अब आर्थिक रूप से मजबूत थी लेकिन इस स्थिति के आने में उसे पूरे दस साल लग गए थे।
सावित्री का एक बेटा रोशन था तथा दो जुड़वाँ बेटियाँ अंशिका एवं वंशिका थीं तीनों बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे।
उसके घर में पहली बार चार ट्राली गेहूँ आए थे जिन्हें बेचकर वह अपने कच्चे घर  का कुछ हिस्सा तोड़कर दो पक्के कमरे एवं किचन लेटबाथ बनवाना चाहती थी । कुछ पैसा उसे पी एम आवास से भी मिलने वाला था। आज उसे अपने पति दिनेश की बहुत याद आ रही थी जिसने दस वर्ष पूर्व आत्महत्या कर ली थी। आत्म हत्या का कारण दिनेश का बड़ा भाई राकेश था। दोनों भाईयों मे घर और जमीन के बँटवारे को लेकर अक्सर विवाद होता था। जबकि उनके पिता उमेश जी ने दोनों को साढ़े चार चार एकड़ जमीन दे दी थी तथा दो एकड़ जमीन अपने पास रखी थी फिर भी उनका झगड़ा शाँत नहीं हो सका था। रोज रोज के झगडे से तँग आकर दिनेश ने आत्महत्या कर ली अपने तीन छोटे छोटे बच्चों के बारे में भी नहीं सोचा था ।दिनेश के आत्महत्या करने का कोई दुख उसके बड़े भाई राकेश को नहीं हुआ लेकिन सावित्री के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा सावित्री सीधी सादी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली महिला थी। दिनेश की अंत्येष्टि के बाद राकेश ने दिनेश की पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया था उसे अपने भाई की बेवा पर जरा भी तरस नहीं आया था उसके पिता उमेश भी उसी का साथ दे रहे थे। गाँव में सावित्री का पक्ष लेने वाला कोई नहीं था। राकेश ने उसका जीना मुश्किल कर रखा था। हारकर वो सब कुछ छोड़ अपने तीनों बच्चों को लेकर मायके आ गई। यहाँ भी उसे मजदंरी कर के अपना गुजारा चलाना पड़ा धीरे धीरे वो भीतर से मजबूत होती चली गई हालात ने उसे अबला से सबला बना दिया था उसने अदालत में अपने जेठ राकेश के खिलाफ केस दायर कर दिया था। तथा जुजारूपन के साथ केस लड़ा था पूरे सात साल बाद फैसला सावित्री के पक्ष में हुआ था। सावित्री अपने तीनों बच्चों को लेक वापस ससुराल आ गई थी राकेश ने अपने पिता उमेश के साथ मारपीट कर मुकदमे में हार की खीज उतारी थी तबसे उमेश भी अपनी बेवा बहू के पक्ष में हो गए थे सावित्री को रहने को घर तो मिला लेकिन आधा एकड़ जमीन का ही उसे पूरी तरह कब्जा मिला चार एकड़ जमीन पर राकेश पहले ही बोनी कर चुका था इसके बदले में उसने सविता को मात्र चालीस हजार रुपये ही दिए सावित्री ने समय विपरीत देखकर इसे स्वीकार कर,लिया उसने एक गाय खरीद ली थी उसके दूध के विक्रय तथा आधा एकड़ जमीन में सब्जी उगाकर उसने अपना गुजारा किया। दूसरे साल भी राकेश ने ऐसा ही किया लेकिन तीसरे साल सावित्री ने ऐसा नहीं होने दिया इस बीच सावित्री ने गाँव में अपने बहुत से हितैषी बना लिए थे वो पंचायत की पंच भी  निर्वाचित हुई थी। जिससे पंचायत में भी उसका प्रभाव था सरपंच उसके पक्ष मे ही थे। राकेश आसानी से हार मानने वाला नहीं था लेकिन सावित्री भी अब पहले सी सीधी सादी चारदीवारी में कैद रहने वाली महिला नहीं थी वह जनप्रतिनिधि के साथ गाँव की गणमान्य नागरिक भी थी उसने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर राकेश के खिलाफ एफ आई कर गिरफ्तार करा दिया था राकेश के होश तब ठिकाने आए जब कोई उसे जमानत से छुड़ाने आगे नहीं आया जब राकेश ने पुलिस की उपस्थिति में तथा गाँव के प्रतिष्ठित लोगों के सामने सावित्री को जमीन का कब्जा दिया तब कहीं वो हवालात से छूट सका उसे पुलिस को लिखित में देना पड़ा कि वो सावित्री से भविष्य में कभी झगड़ा नहीं करेगा अगर करता है तो उसे फिर हवालात में जाना पड़ेगा तथा अदालत में उसके खिलाफ केस किया जाएगा। तब जाकर राकेश ने जमीन सावित्री के हवाले की थी।
इस बार की सारी फसल सावित्री को मिली थी पति के निधन ने उसकी खुशी छीन ली थी अब तो वो बच्चों की खुशी के लिए जी रही थी वो अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहती थी यही उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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