रागिनी आज वृद्धाश्रम एवं अनाथाश्रम का संचालन कर रहीं थी। वहीं अकेली महिलाओं के लिए भी होस्टल चला रही थीं, एक तो उनके पास खुद भी बहुत सी दौलत थी, दूसरे दानदाताओं से भी उन्हें पर्याप्त आर्थिक सहयोग मिल रहा था। आज उनके आश्रम में जो रहने आई थी वो उनकी बचपन की सहेली थी। उसे बड़ा नाज़ था अपने घर परिवार पर, उसका नाम रजनी था। वो रागिनी को देखकर पहले तो चौंकी, बाद में बहुत शर्मिंदा हुई। उसके पति के मरने के बाद बहू बेटों ने उसे घर से निकाल दिया था। इस आश्रम का बड़ा नाम था, जिसे सुनकर वो यहाँ रहने के लिए आई थी। पर उसे मालूम नहीं था कि रागिनी उसकी संचालिका है।
रागिनी शहर की गणमान्य नागरिक थी। उसका शहर में काफी मान सम्मान था। आश्रम में सभी उसको बहुत मानते थे। वो सबका ख्याल रखती तथा हर एक को अपने परिवार का सदस्य मानती थी। वृद्धाश्रम का संचालन करते हुए उसे बीस वर्ष हो गए थे। इस समय रागिनी की उम्र सत्तर वर्ष थी।
छैयालीस वर्ष पूर्व ग्रेजुएशन करने के बाद रागिनी की शादी रविकाँत से हुई थी। रविकाँत सरकारी नौकरी करता था, जिसमें वो था तो कार्यालय सहायक पर उसे नौकरी पर बहुत अभिमान था। सरकारी नौकरी होने के कारण उसके घर बेटी वालों का ताँता लगा रहता था । रागिनी गौरी और बहुत सुंदर थी, तथा स्मार्ट भी थी। उसके मुकाबले रविकाँत एक औसत दर्जे का इंसान था। उसका व्यक्तित्व भी आकर्षक नहीं था। पर रागिनी के पिता राजीव ने उसकी सरकारी नौकरी देखकर अपनी बेटी की शादी उससे कर दी थी। शादी बहुत भव्य हुई थी, खूब दहेज दिया गया था, बारह लाख रुपये नगद दिए थे। रकम जेवर भी खूब दिए थे। कुछ दिनों तक तो सब ठीक चला, फिर रागिनी को प्रताड़ित किया जाने लगा। दहेज को लेकर भी वे संतुष्ट नहीं थे। रविकाँत रागिनी के सामने हीन भावना का शिकार होता था। इसलिए उसे कहीं नहीं ले जाता। सास ने घर का सारा काम उसके हवाले कर दिया था। झाड़ू पौंछा बर्तन वाली को छुट्टी दे दी गई थी, रविकाँत कई दिनों तक उसके पास नहीं आता था। आता भी था तो रागिनी की एक नहीं सुनता था, यही कहता था कि अगर यहाँ रहना है तो ऐसे ही रहो नहीं तो घर छोड़कर निकल जाओ। रागिनी सब सहन कर रही थी, कभी-कभी उसे लगता था कि यहाँ कोई अपना नहीं है, सभी दुश्मन हैं। यह सब चलता रहता अगर एक विवाह समारोह में रागिनी के माता पिता नहीं आते, और रागिनी की दशा से अवगत नहीं होते। उस विवाह समारोह में रागिनी और रविकाँत भी आए थे। रागिनी की हालत जब राजीव ने देखी तो उन्हें रोना आ गया। इतनी कमज़ोर और दुबली होने के बाद भी वो सबसे खूबसूरत लग रही थी। फिर भी उसका पति उसकी उपेक्षा कर रहा था। तथा एक औसत दर्जे की लड़की के आगे पीछे घूम रहा था। रागिनी यह सब देखकर भी चुप थी। रागिनी के सास-ससुर भी अपने बेटे रविकाँत से कुछ नहीं कह रहे थे। राजीव यह सब देखकर चुप नहीं रह सके, उन्होंने रवि के पापा से सिर्फ इतना ही कहा था कि यह सब रवि बाबू ठीक नहीं कर रहे हैं। लेकिन इतनी सी बात पर रवि के पापा ने हंगामा खड़ा कर दिया। काफी विवाद हुआ ज्यादातर लोग रागिनी के पक्ष में थे इससे रवि के पापा और भडक गए। मामला मुश्किल से शाँत तो हो गया पर इस घटना ने रागिनी का जीना मुहाल कर दिया। उस दिन रात भर रागिनी को रविकाँत उसकी माँ, पिता, नाना-नानी, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहे। रवि ने उसे बेरहमी से पीटा भी। सुबह रागिनी के पिता को फोन कर रवि ने कहा अपनी बेटी को ले जाओ, उसका यहाँ मन नहीं लग रहा। राजीव जी ने फौरन एक पल की देर किए बिना उपने बेटे रिषभ को रागिनी को लाने के लिए भेज दिया। दोपहर बाद रागिनी आई तो उसकी माँ से लिपटकर बहुत देर तक फूटफूट कर रोती रही। राजीव जी भी भीतर ही भीतर रो रहे थे। पन्द्रह दिन रागिनी मायके रही फिर रवि के परिवार वालों ने अपने बहुत से नाते रिश्तेदारों को इकठ्ठा कर रागिनी को वापस ससुराल भेजने का दवाब बनाया। कई प्रतिष्ठित लोगों ने राजीव जी को भरोसा दिलाया। उनकी इच्छा नहीं थी फिर भी उन्होंने रागिनी को भेज दिया उन्हें ऐसा लगा जैसे वे अपनी बेटी कसाइयों के हवाले कर रहे हैं। उनकी आशंका सही निकली, इस बार वे साजिश कर रागिनी को ले गए थे। इसमें उनका यही मकसद था कि रागिनी को इतना प्रताड़ित करो कि वो आत्महत्या कर ले । एक रात डेढ़ बजे रागिनी के पड़ोस में रहने वाली निर्मला आँटी का फोन आया कि आप फौरन यहाँ आ जाइए, वे बेटे रिषभ के साथ जब रागिनी की ससुराल आए तो रागिनी की हालत ने उन्हें हिलाकर रख दिया। रागिनी को उन्होंने घर से बाहर निकाल दिया था, और वो ठंड में ठिठुर रही थी। उसके पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था। कह रही थी पापा इन्होंने तीन दिनों से मुझे खाना नहीं दिया है। ना ही सोने दे रहे हैं, और कह रहे हैं कि अगर मायके गई तो इस घर के दरवाजे तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएँगे। राजीव रुआँसे होकर बोले बेटा फोन नहीं कर सकती थी। रागिनी बोली पापा मुझसे फोन छीन लिया गया है। राजीव जी ने रागिनी को अपने साथ लिया और चल दिए जब जाने लगे तो रवि ने कड़वी जुबान से तल्ख लहजे में कहा- जा रही है तो ये समझना इस घर के दरवाजे तेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो गए हैं । राजीव जी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। रागिनी हमेशा के लिए मायके आ गई थी पर उसे अब भी विश्वास था कि रवि उसे लेने आएगा पर रवि कभी नहीं आया। छः महोने बाद जब रागिनी ने रवि को फोन लगाया तो उसने दो टूक शब्दों में कहा मुझे तुझसे तलाक लेना है । जब वो तलाक की रट लगाए जा रहा था तो रागिनी परिवार परामर्श केन्द्र गई। वहाँ भी वो रागिनी को रखने को तैयार नहीं हुआ तो रागिनी ने भी तलाक के लिए हामी भर दी, फिर उनका तलाक हो गया। रागिनी ने अब दुबारा कभी किसी और से शादी नहीं करने का निश्चय कर लिया था। अभी उसकी उम्र तेइस साल की ही तो थी। कॉलेज के दिनों में उसने माडलिंग की थी, वो अच्छी डाँसर भी थी। उसने अब अपने केरियर पर ध्यान देना शुरू किया, नृत्य सिखाने के साथ ही माॅडलिंग भी करने लगी। फिर मुंबई जाकर डांस के शो करने लगी, साथ ही माॅडलिंग भी और कोरियोग्राफर भी बन गई थी। बीस साल तक उसने जी तोड़ मेहनत की और करोड़ों रुपये कमाए। जिनमें से अधिकाँश रुपया इनवेस्ट कर दिया। इससे उसकी आय कई गुना बढ़ गई, उन्हीं रुपयों से उसने वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम तथा महिला आश्रय केन्द्र खोले थे। उसके पूर्व पति ने गाँव में किसी गरीब लड़की से तलाक की बात छिपा शादी कर ली थी। लेकिन रागिनी को इससे कोई मतलब नहीं था। आज उसके आश्रम में आई उसकी बचपन की सहेली रजनी यही कह रही थी कि मैं तुम्हारे भाग्य पर तरस खाती थी। और अपने भाग्य पर गर्व करती थी। अब सोचती हूँ कि मैं कितनी गलत थी। तुम्हें देखकर यही लगता है इस तरह भी गरिमा और सम्मान के साथ जिया जा सकता हे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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