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कहानी: साइलेंट पार्टनर

रघुवीर वर्मा को बावन वर्ष की उम्र में पता चला कि वो एक मामूली दुकानदार नहीं हैं बल्कि चार सौ करोड़ की रुपये की दौलत के मालिक हैं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा आज ही देश की प्रसिद्ध रूपम काॅस्मेटिक कंपनी के जनरल मेनेजर रोहित शुक्ला उनकी दुकान पर मिलने आए थे। उनसे सर कह कर बात कर रहे थे। उन्होंने ही बताया की वह रूपम कंपनी के तैंतीस प्रतिशत शेयर के मालिक हैं। तो उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ रोहित जी ने यह भी बताया की प्रतिमाह तीन से पाँच करोड़ रुपये की आय आपको होती है जो कंपनी में ही इन्वेस्ट कर दी जाती है। फिर भी आपके एकाउंट में अभी भी सत्तर करोड़ रुपये जमा है आपका खाता कंपनी के मालिक दिवाकर वर्मा संचालित करते हैं।
दिवाकर वर्मा का नाम सुनकर रघुवीर जी चौंक गए बोले क्या ये वही दिवाकर जी हैं जो बत्तीस साल पहले इसी शहर में रहते थे और मेरे घनिष्ठ मित्र हैं। रोहित बोले बिल्कुल सही समझे हैं आप, उन्होंने ही मुझे आपके पास भैजा है। उनकी तबियत आजकल ठीक नहीं रहती वे आपका कारोबार आपको सौंपकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं।
रोहित जी से रघुवीर जी ने काफी विस्तार से बातें की थीं इसके बाद वे घर लौटे थे घर पर उनका बेटा कुलदीप मुँह लटकाए बैठा था। वे समझ गए की आज भी वो इंटरव्यू में फैल होकर आया है लेकिन इस बार रघुवीर जी का चेहरा खिला हुआ था। वे बोले अब तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है अब तो तुम्हें खुद दूसरों को नौकरी पर रखना पड़ेगा। दिलीप ने  गौर से रघुवीर के चेहरे की तरफ देखा कहीं वे उसकी बेकारी की खिल्ली तो नहीं उड़ा रहे हैं पर उनके चेहरे की निश्छल हँसी बता रही थी कि  वे सच कह रहे हैं पर इसने दिलीप की जिज्ञासा बढ़ा दी थी। जिसका समाधान करते हुए रघुवीर ने बताया की बत्तीस साल पुरानी बात है तब रूपम कंपनी के मालिक  दिवाकर वर्मा  यहीं रामगंज में रहते थे।  और उनके गहरे दोस्त थे  वे अपनी सौतेली माँ के अत्याचार के शिकार थे पिताजी सौतेली माँ के चंगुल में फँसकर कुछ नहीं बोलते थे तब सौतेली माँ चंपा के कहने में पिताजी ने दिवाकर जी को घर से बाहर निकाल दिया था, यह कहते हुए की दुबारा इधर दिखाई मत दे जाना वरना  मुझसे बुरा तुम्हारा कोई न होगा। ऐसे में रघुवीर ने उन्हें सहारा दिया रघुवीर जी के  दादाजी जो जमीन रघुवीर  को दे गए थे उसके बेचने पर उन्हे बारह लाख रुपये मिले थे। दिवाकर वर्मा ने उनसे अपने बिजनेस के लिए  दस लाख रुपये  माँगे थे । जो रघुवीर ने दे दिए थे तथा कहा था इत्मीनान  से इन्हें  लौटा देना तब तक अपने धंधे  को फैलाने में इसका उपयोग करना।  दिवाकर उनसे इतनी बड़ी  दस लाख की रकम लेकर शहर छोड़  कर चले गए थे तब से उनकी बत्तीस वर्ष  बाद अब  खबर लगी थी।  वो भी इस रुप में।  हुआ ये था कि दिवाकर ने जो  रघुवीर के रुपयों से व्यवसाय शुरू किया, उसमें रघुवीर को साइलेंट पार्टनर बना लिया  था। बाद में जब फर्म कंपनी में बदली तो रघुवीर की  रकम को शेयर में इन्वेस्ट कर  दिया। वही रकम बढ़ते  बढ़ते आज चार सौ करोड़  रुपये तक पहँच
गई था।  यह सुनकर  दिलीप का चेहरा भी खिल गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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