डॉक्टर रश्मि वारेला ने आज रोशन जी की तीसरी पुण्यतिथि मनाई थी। उनके पति डॉ तरूण ने भी आयोजन में सहभागिता की थी। रोशन सुपर स्पेशियलिटी हाॅस्पिटल के इस आयोजन में शहर के गणमान्य लोग शामिल हुए थे। वहाँ डॉ रश्मि वारेला ने कहा था रोशन वो शख्सियत हैं जिनके कारण आज में इस मुकाम पर पहुँची हूँ, वे मेरे माता पिता से भी बढ़कर थे। वे अगर मेरी मदद नहीं करते तो मैं भी गृहिणी बनकर रह जाती।
आज जो रोशन हास्पिटल की प्रसिद्धि है उसमें उनका आशीर्वाद समाया हुआ है। इस अवसर पर डॉ रश्मि ने कई कल्याण योजनाएँ शुरू की थीं। यही उनकी सच्ची श्रद्धाँजलि भी थी।
रोशन एक साधारण से भी साधारण इंसान थे। आज से बीस वर्ष पूर्व की उनकी मदद ने रश्मि का जीवन बदल दिया था। रश्मि ने उन दिनों जीवविज्ञान विषय से बारहवी में स्कूल में टॉप किया था। उनके सत्यासी प्रतिशत अंक आए थे। रश्मि के पिताजी दूसरे के खेतों हाली का काम करते थे। परिवार की आर्थिक हालत बहुत ख़राब थी। रश्मि के पिता कुँजीलाल ने रश्मि को आगे पढ़ाने से इंकार कर दिया था। तथा रश्मि की शादी एक सजातीय युवक नीरज से करने का मन में विचार किया था। नीरज सरकारी अस्पताल में वार्ड ब्वाय था। सरकारी क्वार्टर में रहता था। कुँजी लाल को वो अपनी बेटी के लिए उपयुक्त वर लग रहा था। लेकिन रश्मि अभी शादी करना नहीं चाहती थी। अभी उसकी उम्र महज अठारह साल ही तो थी। रश्मि रोज मंदिर जाती थी, मंदिर के बाहर रोशन भीख माँगते थे। वे दोनों पैरों से लाचार थे। पर ट्राइसायकिल चला लेते थे, उसी को चलाकर यहाँ भीख माँगने आते थे। पास में ही उनका साधारण सा घर था, जिसमें वे अकेले रहते थे। रश्मि उनके पास थोड़ी देर रुककर रोज बात करती थी। तथा अपनी पढ़ाई के बारे में बताती, पूछती बाबा सबको आशीर्वाद देते हो तो ये तो बताओ मुझे क्या आशीष दोगे। रोशन कहते बेटी देखना तू आगे चलकर शहर की सबसे बड़ी डॉक्टर बनेगी। उसी रश्मि को जब रोशन ने उदास देखा तो बोले उदासी का कारण नहीं बताएगी बिटिया। तब रश्मि ने कहा लगता है बाबा आपका आशीष बेअसर रहेगा। मेरे पिताजी मेरी पढ़ाई छुड़ाकर मेरी शादी एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से करना चाहते हैं। कहते हैं कि उनके पास मुझे आगे पढ़ाने के पैसे नहीं हैं। सुनकर रोशन बोले बेटी मेरा आशीष कभी निष्फल नहीं जाएगा। अपने पिताजी को लेकर शाम को मेरे घर आना । रश्मि के पिता भी रोशन को जानते थे। शाम को जब वे रश्मि को लेकर रोशन के पास आए तो शादी की रट लगा रहे थे। बोले आगे रश्मि की पढ़ाई का खर्च कौन उठाएगा, रोशन बोले मैं उठाऊँगा, इसिलिए तो तुम्हें बुलवाया है। कुँजीलाल बोले तुम तो खुद एक लाचार भिखारी हो तुम हमारी क्या मदद करोगे। रोशन ने कहा, बिटिया कितना खर्च लगेगा। रश्मि बोली अगर कोटा में कोचिंग ज्वाइन करती हूं, तो सालभर का पूरा सात लाख रुपये खर्च होगा। रोशन ने कहा वो पैसे मैं दूँगा तुझे बिटिया । अब चौंकने की कुँजी लाल की बारी थी। लेकिन रोशन ने एक बोरे की तरफ इशारा किया वो बोरा कुँजीलाल खींचकर लाया। बोरा पूरा पाँच, दस, बीस, पचास और सौ के नोटों से भरा हुआ था। जब उसके रुपये गिने गए तो पूरे साढ़े सात लाख रुपये निकले। वे पैसे उन्होंने रश्मि को देना चाहे, तो वो बोली अभी तो रात हो गई है। अभी कैसे ले जाऊँगी, सुबह मैं इन्हें ले जाकर कोटा कोचिंग में अपना नाम लिखा दूँगी। कुंजीलाल चुप था। उसके मन में खलबली मची हुई थी। वो रोशनी को आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं था। रोशन के साढ़े सात लाख रुपये पर उसकी नीयत डोल गई थी। उसने विचार किया कि अगर मैं ये पैसे रोशन से हड़प लूँ तो तीन एकड़ जमीन खरीद कर खुद किसान बन जाऊँगा। किसी का हाली तो नहीं बनना पड़ेगा। रात के दो बजे कुँजी लाल रोशन के घर चुपके से आया, रोशन जाग रहा था। रोशन को देखकर वो झेंपा। फिर बोला बाबा ये रुपये तुम्हारे किस काम के, पूरे रुपये मेरे हवाले कर दो। रोशन बोले रुपये तो चले गए जहाँ जाना थे। दरअसल रश्मि अपने पिता की फितरत अच्छी तरह जानती थी। इतने सारे रुपये देखकर कुँजीलाल की नीयत खराब हो गई थी। कुँजीलाल ने घर का कोना-कोना छान लिया था, एक फूटी कौड़ी भी उसे नहीं मिली थी। रश्मि वो पैसे रोशन से पहले ही ले जा चुकी थी। उसका पिता मुँह लटकाए घर आ गया था। रश्मि ने वे रुपये अपनी सहेली के पिता को दिए जिनका बैंक में चालू खाता था। दूसरे दिन साड़े सात लाख रुपये का ड्राफ्ट बनाकर रश्मि को दे दिया। रश्मि वो राशि लेकर कोटा रवाना हो गई। जब कोटा पहुँचकर उसने कुँजीलाल को फोन लगाया तो कुँजीलाल ने कहा, कौन रश्मि तू मेरे लिए मर गई। अब आइंदा कभी फोन मत करना ना कभी आना। रश्मि ने इसके बाद रोशन को फोन लगाया। रोशन बोले बेटा अच्छे से पहुँच गई थी, कोई परेशानी तो नहीं आई। रश्मि ने बताया बाबा सारी व्यवस्था हो गई, होस्टल भी मिल गया। मैंने कोचिंग ज्वाइन कर ली। रोशन बोले मन लगाकर पढ़ाई करना, बेटा मेरा आशीष सदा तुम्हारे साथ रहेगा। कुँजीलाल ने इसके बाद कभी रश्मि का फोन नहीं उठाया। रश्मि कुशाग्र बुद्धि की थी, पहली बार में ही उसका चयन सरकारी मेडिकल कॉलेज में एम बी बी एस के लिए हो गया था। तब रश्मि को साढ़े सात लाख रुपये की जरूरत और पड़ी, वो रुपये भी रोशन बाबा ने दिए । इसके बाद रश्मि पढ़ाई में पूरी तरह डूब गई, हर माह तीस हजार रुपये रोशन बाबा रश्मि के खाते में जमा कर देते थे। रोशन बाबा के अनमोल योगदान से रश्मि ने एम बी बी एस में टॉप किया था। तथा सर्जरी में पीजी किया था। वहीं उसका डॉ तरुण से अफेयर हुआ, जो शादी में बदल गया। रश्मि आदिवासी समाज से थी इस कारण उसे आसानी से लोन मिल गया। तरुण ने भी पैसे मिलाए और फिर उन्होंने शहर में रोशन सुपर स्पेशिएलिटी अस्पताल खोला था। रोशन शायद यह सब देखने के लिए जिंदा रहे थे। रश्मि को कामयाब होता देखने के बाद उन्होंने अपनी देह त्याग दी थी। अंतिम समय पर उनके चेहरे पर अनुपम संतोष था। रश्मि ने उनके नाम से ही अपने अस्पताल का नाम रखा था। तथा हर साल उनकी पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित करती थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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