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कहानी: गरीबी में गीला आटा

नंदराम बागवान की बाड़ी में लगी ट्यूब वेल की मोटर चोरी हो गई थी गरीब नंदराम को बीस हजार,रुपये की चपत लगी थी जिसने उसे तोड़कर रख दिया था पुलिस में रिपोर्ट लिखाने के बाद भी न तो मोटर मिली न चोर पकड़ाए आज नंदराम ने कर्ज लेकर नई मोटर खरीदी थी उसे बोर में,डलवाई तब कहीं वो बाड़ी में लगी बची खुची सब्जियों की सिंचाई कर पाया था इसिलिए आज उसके चेहरे पर पूरे एक महीने बाद संतोष के भाव दिखाई दे रहे थे।
नंदराम के सितारे पिछले तीन महीनों से गर्दिश में चल रहे थे।  सबसे पहले उसके बाड़ी के घर में चोरी हुई इसके कुछ दिन बाद उसकी दुधारू गाय भी अज्ञात चोर चुराकर ले गए थे  फिर उसकी पत्नी सरोज घर की सफाई करते समय गिर गई जिससे उसके पाँव की हड्डी टूट गई थी इसके बाद बोर से मोटर की चोरी ने उन्हें तोड़कर रख दिया था घर की हालत वैसे ही खराब थी ऊपर से ये चपत उन्हें भारी पड़ी थी घर में मातम छाया हुआ था। घर का एक एक सदस्य रो रहा था तीन दिनों से किसी के गले से रोटी का एक  निवाला भी नहीं उतरा था। आज जब पूरे एक महीने बाद दुबारा बोर में मोटर डली और सिंचाई हुई तब नंदराम की उम्मीदें फिर से जाग उठी थीं।
नंदराम ने मोटर चोरी की रिपोर्ट पुलिस में भी लिखाई थी और खुद भी ढूँढने के जी तोड प्रयास किए थे। फिर भी उसे निराशा ही हाथ लगी थी।पूरे एक महीने तक बाड़ी की सब्जियों की फसलों को पानी नहीं मिला था जिससे फसलें सूखने लगीं थीं उत्पादन न के बराबर हो गया था नंदराम को अपनी सब्जी की दुकान बंद करना पड़ी थी घर में फाकाकशी की नौबत आ गई थी।
बाड़ी अकेले नंदराम की ही नहीं थी।उसमें उसके छः भाईयों का भी हिस्सा था बाड़ी साढ़े तीन एकड़ की थी हर भाई के हिस्से में आधा एकड़ जमीन आई थी बोर साझा था जिसमें भरपूर पानी उपलब्ध था चोरी गई मोटर भी साझी थी लेकिन नंदराम को इसलिए दोषी ठहराया गया था क्योंकि जिस रात मोटर चोरी हुई उस रात मोटर की रखवाली की जिम्मेदारी नंदराम   की थी अतः भरपाई भी नंदराम को ही करना थी।नंदराम ने कर्ज लेकर मोटर की व्यवस्था तो कर ली थी मगर उसके मन में  ये डर बैठ गया था कि इसकी भी चोरी हो गई तो वो  पूरी तरह मिट जाएगा इसलिए उसने निर्णय लिया था कि अब वो एक पल के लिए भी बाड़ी को सूना नहीं छोड़ेगा। जब मोटर चोरी हुई तब वो तीन घंटे के लिए   एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए बाहर चला गया था। जिससे ये हादसा हुआ पर अब वो यह गलती दोहराएगा नहीं भले ही रिश्तेदारी में बुराई हो जाए तो हो जाए कोई किसी का परिवार नहीं पाल सकता  इसलिए उसने सतर्क रहने का निर्णय ले लिया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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