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कहानी: अपनों से दूर

शांति देवी और देवेन्द्र  को  बमूलिया  गाँव में रहते हुए पूरे दस वर्ष  हो गए थे इन दस वर्षों में वे दस एकड़  कृषि भूमि के मालिक  बन गए थे गाँव में ही उनका पक्का मकान बन गया था। ट्रेक्टर भी था और जीप भी उनके पास थी अब उनकी गिनती गाँव के संपन्न किसानों में होती थी। 
शांति देवी जब गाँव  में शिशु केन्द्र खुला तब शिशु शिक्षिका बनकर आई थीं  उनका बेटा दीपक चार साल का था और बेटी अंजू एक साल की वे अपने दो छोटे बच्चों के साथ अजनबियों के बीच बिल्कुल अकेली थीं उनकी शिशु सहायिका रामवती  उसी गाँव की थी और,अच्छे स्वभाव की महिला थी उसने शाँति देवी को अपनी बाखल में रहने को घर दे दिया था। शाँतिदेवी काफी मिलनसार और भली महिला थीं वो थोड़े दिनों में ही सबसे घुल मिल गईं।  थीं। शाँति देवी का पति देवेन्द्र झगड़ालू किस्म का इंसान था जेब में छुरा रखकर घूमता था। उससे उसके परिवार वाले भी परेशान थे शाँति देवी जैसी भली महिला से शादी होने के बाद बी वो नहीं सुधरा था। उसकी बैठक शहर के नामी गिरामी बदमाशों के बीच थी। उसी दौरान शहर में एक और दबंग बिल्लू की हत्या हो गई हत्या का आरोप जिन पर था  उनकी देवेन्द्र से  निकटता थी देवेन्द्र ने हत्या तो नहीं की  पर आरोपियों में उसका भी नाम था। हत्या के सारे आरोपी फरार हो खए थे उनके साथ देवेन्द्र  भी कहीं अज्ञात स्थान पर छिप गया था  पूरे ढाई साल देवेन्द्र पुलिस की पकड़ में नहीं आया था। उसके घर से चले जाने से शाँति देवी के सामने कई परेशानियाँ खड़ीं हो गईं थीं। उनके सास ससुर ने उन्हें घर से निकाल दिया था। छोटे बच्चों पर भी तरस नहीं खाया था । शाँति देवी बच्चों को लेकर मायके तो आ गईं  पर यहाँ भौजाइयों ने जीना मुश्किल कर दिया था। तभी शाँति देवी के पिताजी उमाशंकर जी के मित्र देवी सहाय ने बताया कि बमूलिया गाँव में शिशु केन्द्र खुला है। उसके लिए शिशु शिक्षिका की जरूरत हैं उसे दसवीं  पास होना चाहिए।  शाँति देवी दसवीं पास थी उन्होंने फौरन देवी सहाय जी से वो नौकरी करने की इच्छा जाहिर की जिसके तीसरे दिन ही देवीसहाय शाँति देवी का नियुक्ति पत्र लेकर आ गए थे। अगले दिन शाँति देवी ने अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली थी। इसके साथ ही उन्हें भाभियों के तानों और उलाहनों से भी मुक्ति मिल गई थी। शाँति देवी के  नौकरी करते हुए पूरे दो वर्ष हो गए थे। उन्होंने दो गाएँ भी पाल ली थीं जिनका दूध बेचकर उन्हें अतिरिक्त आमदानी भी हो रही थी। दो साल बाद देवेन्द्र पुलिस के हत्थे चढ़ गया था पुलिस ने उसे लॉकक्षप में बंद कर दिया  था छः महीने बाद वो बेदाग साबित  होकर छूट गया था। छूटने के बाद वो घर गया वहाँ शाँति  उसे नहीं मिली  तो वह खबर मालूम कर बमूलिया आ गया।  शाँतै देवी पति को देखकर खूब  खुश हुई।  देवेन्द्र ने  शाँत  जीवन जीना प्रारंभ कर दिया था। पर उसकी ख्याति ने ज्यादा दिन तक  उसे शाँत नहीं रहने दिया गाँव के  बाबंलाल जिनकी गाँव वालों से बनती नहीं थी  उन्होंनः देवेन्दूर को अपना रक्षक बना लिया था बाबूलाल के कोई संतान नहीं थी  वे देवेन्द्र  चो ही अपना बेटा भानने लगे थे। देवेन्द्र के कारण गाँव वालो  की फिर कभी  हिम्मत नहीं हुई उन्हें परेशान  करने की। बाबूलाल जी का देहावसान  हो गया था मरने के  पूर्व उन्होंने  देवेन्द्र से कहा  कि मैंने अपनी जमीन जायदाद  सब तुम्हारे नाम कर दी है  मैं अब जा रहा हूँ अपना ख्याल रखना बेटे। बाबूलाल के मरने के बाद उनकी जाति तथा कुटुंब वालों ने झगड़ा करना प्रारंभ कर दिया था। अब देवेन्द्र भी अपने वास्तविक रूप में आ गया शहर से दो सौ बदमाश   देवेन्द्र के कहने पर गाँव आ गए। गाँव में जमकर उत्पात हुआ  था देवेन्द्र   के साथियों  ने उन्हें वो सबक सिखाया था  जिसे वे कभी भूल नहीं सकते।  थे अब देवेन्द्र का गाँव में अच्छा रौब जम गया था। उस झगड़े के बाद देवेन्द्र  ने इन आठ सालों में खूब तरक्की की थी । आज वो गाँव का संपन्न किसान था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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