सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बस ड्राइवर

लघुकथा
बस ड्राइवर
संतष वर्मा एक यात्री बस के ड्राइवर थे बस शहर से ग्रामीण अंचल तक जाती थी सुब्ह आठ बजे घर से निकलते तो रात को आठ बजे घर आते थे  जिसका दैनिक वेतन उन्हें  मात्र तीन सौ रुपया मिलता था और कोई काम उनसे बनता नहीं थी ड्राइवरी करते करते उन्हें पच्चीस वर्ष हो गए थे। आज भी वे जब घर आए तो तीन सौ रुपये उन्होंने अपनी पत्नी सरला को दिए जिससे वह सामान बाजार से लाई फिर उनका चूल्हा जला रात को दस बजे खाना खाकर वे फुरसत हुए। आज संतोष जी की शुगर कुछ बढ़ी हुई लग रही थी। उन्हें कुछ घबराहट सी हो रही थी चक्कर भी आ रहे थे उन्होंने ये बात अपनी पत्नी सरला से छिपा ली थी और बिस्तर पर लेट  गए थः। बढ़ी बेटी तान्या बाइस साल की होने जा रही थी उसकी शादी करने की चिंता भी थी। उन्हें यही सोचकर नींद नहीं आ रही थी।
कुछ माह पहले तक  संतोष  की कमाई से ही घर चल रहा था वे किराये के घर में रहते थे जिसका  किराया दो हजार रुपया प्रतिमाह था। नौ हजार प्रतिमाह उनकी आय थी जिसमें से दो हजार मकान किराये में खर्च हो जाते थे सात हजार रुपये इस मँहगाई के दौर में चार बच्चों के होते हुए मुश्किल से गुजर होती थी। लेकिन अब बच्चे बड़े हो रहे थे उनके खर्च भी बढ़ते जा रहे थे । इधर मकान मालिक भी मकान खाली करने के लिए कह रहा था दूसरा मकान जो किराये से मिल रहा था उसका किराया साढ़े तीन हजार रुपया महीना था। ये मकान खाली करना जरूरी हो गया था सरला जानती थी की पति की आय तो बढ़ेगी नहीं इसलिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा उसके घर से आठ किलोमीटर दूर पनीर फेक्ट्री थी वहाँ उसके मोहल्ले की कई महिलाएँ काम करने जाती थीं उन्हें पाँच सौ रुपये रोज मिलते थे। सरला भी उनके साथ पनीर फेक्ट्री में जाने लगी थी लेकिन दो माह काम करने के बाद सरला को वहाँ से काम छोड़ना पड़ा था वहाँ उसे पाँच सौ रुपये रोज तो मिलते थे पर काम बहुत कठिन था दिन भर पानी में खड़े रहकर काम करना पड़ता था। सरला की हालत वहाँ काम करते हुए बहुत खराब हो गई थी इसलिए  उसने वो काम छोड दिया और घर से तीन किलोमीटर दूर काजू की फेक्दरी  में सरला ने काम ढूँढ लिया था उसके साथ तान्या भी काम करने जाने लगी थी। काजू फेक्ट्री में दो सौ रुपये रोज देते थे। कुल छः हजार रुपये  मासिक  पड़ते थे दोनों माँ बेटी को बारह हजार रुपये मिल रहे थे उनके लिए यही बहुत था। संतोष की कमाई से घर चल रहा था और सरला तथा तान्या की कमाई जमा की जा रही थी जो शादी  में खर्च होने वाली थी। बच्चे सभी सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे।  संतोष की उम्मीदें तो अब बच्चों पर टिकी हुईं थीं तान्या ने भी बीए कर लिया था। तथा सरकारी नौकरी के लिए प्रयास कर रही थी। सरला और तान्या की कमाई के कारण घर की स्थिति में सुधार आया था। जिससे संतोष की चिंता काफी हद तक दूर हो चुकी थी। 
******
रचनाकार 
प्र्रदीप  कश्यप

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...