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कहानी: दबंगों के बीच में

दबंगों के गाँव में रहते  हुए दलित बुद्धिजीवी डॉ रमतूलाल  ने जिस तरह अपनी प्रारंभिक पढ़ाई की थी ये वो ही जानते थे आज तो वक्त बहुत बदल चुका है जिसमें रमतू लाल जी जैसे कई दलित विचारकों का अहम योगदान हैं। डॉ रमतूलाल अपना सतहत्तरवाँ जन्मदिन मना रहे थे। जन्मदिन समारोह में सभी वर्ग के गणमान्य लोगों की उपस्थिति देख  डॉ रमतूलाल अभिभूत थे। समारोह के समापन के बाद जब वे फुर्सत में हुए तब अपने बचपन के कठिन दिनों को याद करने लगे किस तरह संघर्ष कर,वे आज इस मुकाम पर पहुँचे एक एक बात उन्हें याद आ रही थीं।
जब रमतूलाल आठ वर्ष के थे तब उनके गाँव हीरापुर में सरकारी प्राइमरी स्कूल प्रारंभ हुआ था । गाँव दबंगों का था एक जाति विशेष का पूरे गाँव में दबदबा था कुछ दलितों के घर थे कुछ अन्य जातियों के लोग भी रहते थे।जो अधिकाँश दबंगों के खेतों में मजदूरी करते थे। स्कूल के शिक्षक को गाँव के पटेल ने रहने के लिए मुफ्त में मकान दिया था मकान से लगा हुआ फलदार पेड़ों का   बाग था उसी की दालान में वे स्कूल लगाते थे। स्कूल में सभी छात्र दबंगो के ही थे। कुछ छात्र पिछडा वर्ग के भी थे लेकिन दलितों का एक भी छात्र उस स्कूल में दर्ज नहीं था किसी दलित की इतनी हिम्मत नहीं थी  कि वो अपने बच्चे को दबंगों के बच्चों के साथ बैठकर पढ़ा सके। ये सन उन्नीस सौ तिरेपन का समय था आजादी मिले छः वर्ष ही हुए थे लोगों में उतनी जागरूकता नहीं थी शिक्षक रामप्रकाश जी को गाँव भें रहकर स्कूल चलाना था वे दबंगों के खिलाफ नहीं जा सकते थे  दबंगों ने उन्हें रहने के लिए घर दिया था स्कूल के लिए दालान दी थी। फल सब्जी दूध उनको दबंगों की तरफ से मुफ्त प्राप्त होते थे।  और वे अच्छे से रह रहे थे उनके,लिए इतना ही बहुत था। दलितों के बच्चों में इकलौते रमतूलाल ही ऐसे थे   जो स्कूल के पास तक आ जा सकते थे। छः वर्ष के,रमतूलाल पूरे समय स्कूल के बाहर बैठे रहते थे। उनकी बुद्धि तीव्र थी जो कुछ रामप्रकाश पढ़ाते उन्हें गौर से सुनते कोयले से पत्थर  पर,लिखकर अक्षरों का अभ्यास करते इसी तरह गणित और गिनती करना भी सीख गए थे। बिना कॉपी किताब स्लेट पेंसिल के रमतूलाल बहुत कुछ सीख गए थे लेकिन उन्होंने अपनी विद्या का  कहीं प्रदर्शन नहीं किया था एक दिन रामप्रकाश जी पाँचवीं के छात्रों को गणित  पढ़ा रहे थे। उसका एक सवाल कोई हल नहीं कर पा रहा था। राम प्रकाश जी भी उस सवाल को हल करने का हरसंभव प्रयास कर रहे थे। लेकिन रमतूलाल जी ने वो सवाल हल कर लिया था। स्कूल की छुट्टी के बाद रमतूलाल ने वो सवाल हल करके रामप्रकाश जी को बता दिया रामप्रकाश जी के यह देख होश उड़ गए वे बोले फिर तो तुम्हें हिंदी पढ़ना भी आता होगा। उन्होंने एक किताब  रमतूलाल के सामने रख दी। थोड़ी दूरी बनाकर रमतूलाल को किताब पढ़ने को कहा गया रमतूलाल ने  वो किताब बिना अटके पढ़ दी। रामप्काश जी के चेहरे पर घबराहट साफ नजर आ रही थी। जबकि रमतूलाल पूरी श्रद्धा से  उन्हें देख रहा था वो दौर कब का खत्म हो गया था जब गुरू को एक लव्य ने अँगूठा  काट कर दक्षिणा में दे दिया था  उल्टे वे मिन्नत भरे  स्वर में रमतूलाल  से कह रहे बेटा ये बात किसी से मत कहना की तुझे पढ़ना लिखना  आ गया है  वरना मेरा पढाना  बंद हो जाएगा मेरी नौकरी  चली जाएगी रमतूलाल ने  कहा किसी से नहीं कहूँगा बस आप मुझे पढ़ाते  रहना। रामप्रकाश जी इससे सहमत  हो गए। और  यूँ रमतूलाजी   की पढ़ाई  का सिलसिला प्रारंभ हो गया आठवीं  रमतूलाल जी ने प्राइवेट छात्र के रूप में पास कर ली थी।  अब वे शहर आ गए थे। शहर  में रहकर ही उन्होंने प्रथम श्रेणी में गणित में एम एस सी कर ली  इसी में पी एच  डी की तथा गणित  के प्रोफेसर बन गए।  फिर पी एस सी क्लीयर की कुछ सालों तक एस डी एम रहे  फिर विधायक का  चुनाव  लड़ा जीतने के बाद  मंत्री बन गए अंत  में सब कुछ  छोड़कर समाज  सेवा अपना ली  तबसे वे समाज सेवा ही कर रहे  थे आसपास के क्षेत्र में उनका बडा प्रभाव था। सब उन्हें सम्मान करते थे। यही उनके जीवन  की सबसे बड़ी पूँजी थी।
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रचनाकार 
प्रदीप  कश्यप 


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