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कहानी: बेबसी के बीच की खुशियाँ

सरिता आज भी निर्माणाधीन मकान में मजदूरी करने आ गई थी दो कॉलम के बीच साड़ी से बने झूले में उसका नवजात शिशु सो रहा था। जिसका जन्म कल रात को ही हुआ था। पेट में पूरे नौ माह का गर्भ होते हुए भी वो कल भी मजदूरी करने आई थी शाम को घर जाने के बाद उसे प्रसव पीडा  हुई तो उसकी बस्ती की एक मजदूर महिला ने दाई बनकर उसका प्रसव कराया उसने स्वस्थ बालक को जन्म दिया था। सुब्ह  सरिता ने उठकर कलेवा किया तथा  दोपहर के लिए भोजन तैयार कर टिफिन में रख पति शिवलाल के साथ मजदूरी करने आ गई थी। 
सरिता के पिता हरखू  लकवाग्रस्त थे पर थोड़ा बहुत चल लेते थे। सरिता  के पति शिवलाल की माँ अंधी थी। सब एक साथ झुग्गीनुमा छोटे से घर में रहते थे दोनों पति पत्नी हर हाल में मजदूरी करते थे।वे एक दिन की छुट्टी नहीं ले सकते थे।वरना खाने और दवाई का जुटा पाना  मुश्किल हो जाता था। उन्हें उधार जिस साहूकार से मिलता था वो बीस प्रतिशत प्रतिमाह से ब्याज वसूलता था। इसलिए वे मजदूरी  कर के अपना गुजारा करते थे ताकि कर्ज के दलदल में फँस कर तबाह न हो जाएँ।सरिता और शिवलाल की शादी दो वर्ष पहले मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के अन्तर्गत  सम्मेलन से हुई थी।जिसमें उनका एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ था। गृहस्थी का सामान भी मिल गया था कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने भी बर्तन तधा घरेलू सामान उपहार में दिया था। शादी के पहले भी शिवलाल और सरिता ठेकेदार के पास मजदूरी करते थे दोनों एक ही जाति के थे वहीं उनके बीच प्रेम की शुरुआत हुई जो शादी में बदल गई शादी के एक दिन पहले तक वे मजदूरी पर आते रहे जिस दिन शादी थी सिर्फ उस दिन की उन्होंने छुट्टी ली थी अगले दिन वे दोनों फिर मजदूरी करने आ गए थे। वही बच्चे के जन्म के अवसर पर भी हुआ था। लेकिन इस बार तो उन्होंने एक दिन की भी छुट्टी नहीं ली थी यह बात जब ठेकेदार की पत्नी सुरभि को पता लगी तो वह आश्चर्य चकित हो गई उसने सरिता को कठिन काम करते हुए देखा तो ऐसा लगा ही नहीं की उसके बच्चे को जन्में अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं। सुरभि सोच रही थी उसके आर्किटेक्ट बेटे राकेश की पत्नी जब गर्भवती हुई थी तो पूरे नौ माह उसने आराम के सिवा कुछ नहीं किया था गर्भ के,दौरान उसके इलाज में दो लाख रुपये खर्च हो गए थे। अस्पताल में  तीन दिन तक प्रसव पीडा से तड़पने के फाद उसकी सिजेरियन से  डिलेवरी हुई थी बच्चा बेहद कमजोर पैदा हुआ था पूरे बारह लाख रुपये दवा और इलाज में खर्च हुए थे डेढ़ माह बाद निजी अस्पताल से घर आई थी। और एक यह सरिता है जिसका डिलेवरी में एक रुपया भी खर्च नही हुआ धा न ही उसकी शादी में कोई खर्च हुआ था। फिर भी उसकी खुशी के सामने  सुरभि की खुशी फीकी थी जबकि सरिता और शिवलाल की खुशियाँ तो बेबसी के बीच में ही मनी थीं।फिर भी कितनी अल्हड़ थीं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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