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कहानी : अंतर

राम रतन और नव रतन वैसे तो दोनों सगे भाई थे लेकिन उनके व्यवहार तथा स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर था रामरतन जहाँ साधु जैसे सरल स्वभाव के थे वहीं नवरतन मतलबी लालची तथा कुटिल स्वभाव का इंसान था। अब दोनों ही बुढ़ापे की अवस्था   के दौर से गुजर रहे थे। नवरतन जहाँ कष्टदायी जीवन जी रहा था वहीं रामरतन आज भी स्वस्थ और आनंदपूर्ण जीवन जी रहे थे।
आज ही रामरतन सरकारी स्कूल के बच्चों में निःशुल्क स्वेटर का वितरण कर के आए थे। तथा आनंद का अनुभव कर रहे थे। वहीं नवरतन रीढ़ की  हड्डी में खराबी होने के कारण चलने फिरने को भी मुहताज था। और कष्टदायक जीपन जी रहा था बहू बेटे उसकी एक नहीं सुनते थे नाती पोते उसके पास फटकते भी नहीं थे दोनों बेटे दो चार दिन में एकाध बार उसे देखने आते थे और बिना कुछ कहे चले जाते थे। जबकि नवरतन  ने हर उचित अनुचित तरीके से खूब धन कमाया था। बेटों के लिए अच्छा बिजनिस खडा किया था जिंदगी में बिना स्वार्थ के कोई काम नहीं किया था नेकी करने में उसका कोई विश्वास नहीं था। फिर भी वह कोने में पड़ा  मौत के दिन गिन रहा था। एक नर्स उसकी देखरेख करती तो थी पर  उससे भी नवरतन की नहीं बनती थी। वो भी नवरतन की उपेक्षा करती। पर कोई नर्स से कुछ नहीं कहता था। बेटे उसको समय पर तनख्वाह नहीं देते थे इसलिए वो चिढ़ी रहती थी और अपनी चिढ़ नवरतन पर निकालती थी।
दूसरी और राम रतन नाती पोतों में मगन रहते थे उनके साथ बच्चे बन जाते बच्चे भी उनसे खुश रहते और वे भी बच्चों से खुश रहते। रामरतन अपने नाती पोतों के हाथ से दान पुण्य कराते थे। उनके बहू बेटे उनका खूब ख्याल रखते थे उनका सीधा सरल स्वभाव सबको अच्छा लगता था कभी कभी कोई भूखा भिखारी एक रोटी की आस लेकर उनके द्वार पर आता तो वे उसे भरपेट भोजन करा देते और उनकी बहुएँ  सहजता से उनकी बात मान लेती थीं।
रामरतन और नव रतन को अलग हुए तीस वर्ष बीत गए थे। माता पिता के निधन के बाद जब संपत्ति का बँटवारा हुआ तब नवरतन ने उनकी शराफत और सरलता का फायदा उठाकर खूब बेईमानी की थी उन्हें  वो दुकान मिली जो कम चलती थी वो मकान मिला जो  छोटा और कच्चा था रकम जेवन के बँटवारे में  भी नवरतन ने खूब बेईमानी की थी फिर भी रामरतन ने अपने भाई के प्रति स्नेह में कमी नहीं आने दी थी। नवरतन हर उचित अनुचित तरीके से धन कमाने में जुटा रहा जबकि राम रतन सिर्फ परिवार के गुजारे लायक ही धन कमाते थे बाकी बचे पैसों का दान कर देतू थे उनके भी नवरतन की तरह दो बेटे थे दोनों ही आज्ञाकारी थे। रामरतन ने उन्हें बचपन  से ही अच्छे संस्कार दिए थे इसी कारण से ही तो  वे अभी तक एक ही घर में रहते थे  तथा एक ही चूल्हे पर उनकी रोटी बनती थी रात का खाना सब एक साथ खाते थे। रामरतन के पास धन अधिक तो नहीं रहा पर धन की कमी से आज तक उनके  कोई काम नहीं  रुके थे। धार्मिक कार्यक्रम में लोग आगे बढकर उनकी सहायता करते थे कोरोना काल में उन्होंने जरूरत मंदों की खूब मदद की थी लगातार खाना तैयार कर बाँटा  था। इसलिए   अभी तक सब उन्हें सम्मान की नजर से देखते तथा  उनके काम  में मदद करते थे। नवरतन की दशा पर उन्हें दुख होता था वे अपने भाई की मदद करना चाहते थे। सेवा भी करना चाहते थे । लेकिन  उनका तो वहाँ प्रवेश ही निषिद्ध  था इसलिए वे  सिवाय दुखी होने के अलावा और  कर भी क्या सकते थे। 
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रचनाकार
प्रदीप  कश्यप  


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