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कहानी: बाँटने का सुख

राजनगर के विख्यात समाज सेवी रामसुखलाल के कारण शहर में कोई ना तो रात को भूखा सोता था न फुटपाथ पर कोई ठंड से ठिठुरता नजर आता था उनके शहर में चार अस्पताल थे जो गरीबों के लिए मँहगा से मँहगा इलाज एवं चिकित्सक की सेवाएँ उपल्ब्ध कराते। उनके अस्पता के इलाज की इतनी ख्याति थी की अमीर पैसे वाले भी वहाँ इलाज कराना पसंद करते थे। और खुशी से इलाज का खर्च भी उठाते थे और बहुत सारा दान भी देकर जाते थे। आज कोई दानदाता उन्हें तीन करोड़ रुपये का दान देकर गया था दान दाता ने अपना नाम पता गुप्त रखा था। उसने टाइप किया हुआ पत्र भी दान की राशि के साथ रखा था जिसमें लिखा था यह पैसे खरी कमाई के हैं मुझे विश्वास है कि आप इस राशि का उचित उपयोग करेंगे। रामसुखलाल जी ने दान तो स्वीकार कर लिया था निर्माणाधीन  कैंसर अस्पताल के लिए उन्हें धनराशि की आवश्यकता भी थी दानदाता लाखों रुपये दान भी दे रहे थे लेकिन तीन करोड़ रुपये की राशि गुप्तदान में देने वाला उनके सामने ये पहला उदाहरण था। जी दान की राशि लाया था उससे रामसुखलाल ने हर तरह से पूछा पर वह भी रामसुखलाल को दानदाता का ना तो नाम पता बता सका ना ही हुलिया।
रामसुखलाल शहर में गाँव से पढ़ने के लिए चालीस वर्ष पूर्व   आए थे। यही बी ए पास करने के बाद उनकी नगर निगम में क्लर्क की नौकरी लग गई थी। वे सीधे सरल स्वभाव के व्यक्ति थे सबकी मदद करते रहते थे। गाँव से जब कोई शहर काम से आता तो उनके यहाँ ही ठहरता था वे उसका पूरा ख्याल रखते थे मदद भी करते थे निःशुल्क व्यवस्था करते और लोगों की मिली दुआओं से खुशी का ख़जाना भरते रहते थे। हमेशा उन्हें आनंद की अनुभूति होती रहती थी। नौकरी करते हुए उन्हें सात साल हो गई थी जब उनकी उम्र अठ्ठाइस साल की हो गई तब उनके पिताजी हरीश जी ने उनकी शादी सुलभा से करा दी थी। सुलभा को लेकर वे अपने शहर के मकान में आ गए थे। उनका मकान क्या था एक धर्मशाला जैसी थी। शुरू में तो सुलभा नाराज हुई पर रामसुखलाल के चेहरे की कोमलता देख कुछ बोली नहीं रामसुखलाल ने सुलभा से कुछ नहीं कहा पूर्व की तरह अपने काम करते रहे उनकी निगाह में तो सुलभा भी उन अतिथियों की तरह ही थी। जिनकी सेवा वे मनोयोग से करते थे। कुछ दिनों तक सुलभा रामसुखलाल जी का अवलोकन करती रही। उसने विचार किया इन्हें जो तनख्वाह मिलती है वो तो चार दिन में  खर्च हो जाती होगी। फिर बाद के दिनों का खर्च कैसे चलता होगा तब उसे पता चला कि उनके पास दानदाताओं की कोई कमी नहीं है। वे सब रामसुखलालजी का  दिल से सम्मान करते थे। धीरे धीरे वो भी रामसुखलाल जी का साथ देने लगी।  उनकी शादी के सात साल हो गए थे लड़का नवीन छः साल और लड़की निशा तीन वर्ष की हो गई थी।  सुलभा ने भी नौकरी की तलाश करना शुरू कर दी थी। शीघ्र ही उसकी  सरकारी अस्पताल में नेत्र सहायक की नौकरी लग गई थी। रामसुखलाल ने सुलभा को नौकरी करने की इजाजत दे दी थी। एक दिन सुलभा ने कहा कि आपके काम का दायरा दिनोंदिन बढ़ता  जा रहा है।  ऐसा करो आप नौकरी छोड़ दो मेरी   तन्खा से मैं सब  मेनेज कर लूँगी। सुलभा की बात मानकर राम सुखलाल जी ने नौकरी छोड़कर समाज सेवा में पूरी तरह  अपने आपको रमा लिया था।  तब से पच्चीस वर्ष हो गए थे। आज उसी का नतीजा था कि आज  उनका काम इतना फैल गया था ।  वो सबसे जीवन के मूलमंत्र  के रूप में यही बताते थे कि परोपकार वह कुँजी है। जो  आनंद तो देती ही  हैश। साथ  ही नैकी की दौलत से मालामाल भी  रखती  है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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