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कहानी: दमदार खुद्दार

पूरे,दौलत पुर गाँव मे॔ चेतराम को छोड़कर  ऐसा कोई नहीं था  जो अमीरचंद के अहसानों तले या कर्ज के नीचे न दबा हो केवल चेतराम ही ऐसा था जिसने अमीर चंद से न कोई कर्ज लिया था ना ही कोई अहसान  हालात ऐसे बने की अमीरचंद को चेतराम का अहसान लेना पड़ा।
हुआ यूँ कि अमीरचंद  को जोड़ों के दर्द की बीमारी ने परेशान कर दिया था उसने उसका हर संभव इलाज कराया पर उसे कोई लाभ नहीं हुआ चेतराम के पास इसका अचूक देशी इलाज था जिसके लिए वो दूर दूर तक जाना जाता था बड़ी संख्या मे उसके पास मरीज आते और उसकी देशी दवा से ठीक होकर जाते।अमीरचंद नहीं चाहता था कि चेतराम का कोई अहसान ले लेकिन बीमारी ने उसे चेतराम के पास आने को विवश कर दिया चेतराम ने उसे जो देशी दवा दी उसके  असर से उसकी बीमारी ठीक हो गई थी। चेतराम ने इसके बदले अमीरचंद से एक रुपया भी नहीं लिया था ये अमीरचंद के लिए बड़ी बात थी। जिसके जवाब में अमीरचंद ने इतना ही कहा कि कभी रुपयों की जरूरत पड़े तो आ जाना तुम्हें बिना ब्याज एवं जमानत के कर्ज दूँगा जिसकी वसूली के लिए कभी तकाजा नहीं करूँगा। चेतराम मुस्कुराकर रह गया था मन ही मन सोच रहा था भगवान करे कभी अमीरचंद से कर्ज लेने की नौबत ही न आए।
चेतराम के पास मात्र पाँच एकड़ जमीन थी जिसमें वह अपने परिवार की गुजर बसर अच्छे से कर रहा था जबकि कई बीस से पच्चीस एकड़ जमीन वाले भी अमीरचंद के कर्ज के बोझ से दबे हुए थे अमीरचंद ने लाख कोशिशें की चतराम की जमीन और मकान पर कब्जा  करने की मगर कभी कामयाब नहीं हो पाया था।एक बार उसकी बेटी बीमार हुई उसके इलाज में चेतराम की सारी जमा पूँजी खर्च हो गई थी। घर में एक रुपया भी नहीं बचा था चेतराम  ने हारकर अमीरचंद के पास जाकर कर्ज  लेने का इरादा कर लिया था। तभी उसे खबर लगी कि दो दिन में ही  बाजार में लहसुन का  भाव चालीस रु से बढ़कर दो सौ रुपये किलो हो गया था  चेतराम के पास लहसुन की साठ किलो वजन की  सत्तर कट्टियाँ रखी हुई थीं।
लगभग ब्यालीस  क्विंटल  लहसुन उसके पास था। वो अपनी मोटर सायकिल पर दो कट्टी लहसुन  से भरी रखकर मंडी  में आ गया था। नीलामी भें  उसका लहसुन उन्तीस हजार रुपये में   बिका था। जिसने उसकी  सारी समस्या हल कर दी थी।  जब लहसुन के भाव तीन सौ रुपये किलो हो गए तो उसने पूरी अठहत्तर कट्टी लहसुन  बेच  दी थी।   जो पैसा मिला उसका रिजर्व फंड बनाकर बैंक में जमा कर  दिया  था। जिससे उसको   कभी अमीर चंद   से कर्ज लेने की नौबत  नहीं आई थी।  दूसरी उपलब्धि के रूप में उसे जोड़ों के दर्द की देशी दवा एवं इलाज मिल गया था । एक बार दौलतपुर में एक भूखा साधू  आया था। किसी ग्रामीण ने उसको खाना नहीं  दिया था चेतराम ही एकमात्र ऐसा था जिसने   साधू को भोजन कराया  था। तब साधू ने उससे खुश  होकर जोड़ों के दर्द का देशी इलाज  का इल्म   चेतराम  को दे  दिया था।  वो साधू  तो दुआ देकर   चला गया था लेकिन  उस दिन से चेतराम , की ख्याति  दूर दूर  तक हो   गई थी। चेतराम की खुद्दारी दमदारी से एक डार फिर सामने आ गई थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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