आज पिच्यासी वर्षीय नरेश चंद्र की दर्दनाक मौत हो गई थी। उनकी अंत्येष्टि में गिने चुने लोग ही शामिल हुए थे। उनकी पत्नी निर्मला का देहान्त हुए छः महीने ही बीते थे कि नरेशचंद्र भी दुनिया को अलविदा कर चल दिए थे। उन्हें जो दर्दनाक मौत मिली ऐसी भगवान दुश्मन को भी न दे यह कहना था नरेश चंद्द के भरे पूरे घर में झाड़ू पौंछा और बर्तन माँजपे वाली बाई मंजू का। मँजू उस घर में दस साल से काम कर रही थी।
मँजू नरेशचँद्र जी के रिश्तेदार दीवानचंद्र की पत्नी विमला से कह रही थी की उनकी पत्नी निर्मला के निधन के बाद नरेशचँद्र का ध्यान किसी ने भी नहीं रखा था जबकि निर्मला कहा करती थी कि हम सौ वर्ष तक जिएँगे पर ऐसा हुआ नहीं बयासी वर्ष की उम्र में जब वह सुब्ह मंदिर जा रही थी तब एक कार चालक ने अंधी गति से कार चलाते हुए उन्हें जोर की टक्कर मार दी थी और भाग गया था कार चालक का तो पता नहीं चल पाया पर निर्मला जी ने वहीं दम तोड़ दिया था। निर्मला के मरने के बाद नरेशचँद्र असहाय हो गए थे। उन्हें भूलने की बीमारी थी किसी को भी वे पहचान नहीं पाते थे जरा सी देर पहले की बात भी वे भूल जाते थे। निर्मला उनका बहुत ख्याल रखतीं थीं नरेशचंद्र जी को डाइबिटीज भी थी बाकी और कोई बीमारी नहीं थी। निर्मला उन्हें समय पर दवा देतीं तथा ख्याल रखतीं थीं नरेशचँद्र जी जिस मकान में रहते थे वो बहुत बड़ा था उसमें चार किरायेदार रहते थे और दो बड़ी दुकानें थीं जिनका अच्छा किराया आता था मकान निर्मला जी के नाम था उसकी आय का वे ही हिसाबकिताब रखतीं थी जो रकम जेवर थे वे भी निर्मला जी के ही पास थे। नरेश जी के दो बेटे थे बड़े का नाम उमेश तथा छोटे का नाम रमेश था उमेश की पत्नी रीना तथा रमेश की पत्नी रमा का निर्मला और नरेश जी से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था वे दोनों अपने अपने मायके से लगाव रखती थीं अगर माँ के सिर दर्द की खबर भी सुन लें तो चिंता के मारे सोएँ भी न और सास ससुर को कुछ बड़ी बीमारी भी हो जाए तो उन्हें कोई भी फर्क न पड़े इसीलिए निर्मला जीना चाहती थीं नरेशचंद्र जी के लिए क्योंकि उन्हें मालूम था कि वे अगर पहले दुनिया से चली गईं तो नरेश जी ज्यादा दिन नहीं जी पाएँगे नरेश जी के दोनों बेटे जोरू के गुलाम टाइप के इंसान थे। अगर वे अपने माँ बाप के पास बैठकर थोड़ी देर भी बात कर लें तो उन्हें बहुत नागवार लगता था जबकि वे खुद अपने मायके घंटों तक फोन पर बातें करती थीं मायके के कुत्ते को भी विडियो काल कर के दुलार कर लेती थीं पर मजाल है कि सास ससुर से कभी दो बोल मीठे भी बोल लें सेवा करना तो दूर की बात है। जबकि निर्मला दोनों बेटों के बच्चों की पढ़ाई लिखाई फीस तथा अन्य सभी खर्चे उठाती थीं मगर फिर भी बहुएँ उनसे अच्छा व्यवहार नहीं करती थीं दोनो बहुओं के मायके वाले उनका लाखों का कर्ज खाकर बैठे थे जिनके अदा होने की कोई उम्मीद भी नहीं थी तब भी मायके के प्रति उनके लगाव में कोई कमी नहीं आई थी। और सास ससुर जिन्होंने दिया ही दिया था लिया कुछ भी नहीं था फिर भी बहुएँ उनका जरा भी ख्याल नहीं रखती थीं अपने बच्चों को भी उनसे मिलने नहीं देती थीं जब बच्चों का कोई मतलब होता तब उन्हें दादा दादी से मिलने की इजाजत थी वरना सब उनसे दूरी बनाकर रखते थे। नरेशचँद्र जी की किस्मत ही खराब थी जो निर्मला जी की दुर्घटना में मौत हो गई थी। निर्मला की मौत के बाद उस घर से इंसानियत पूरी तरह विदा हो गई थी। घर में खुलकर लूट हुई थी नरेशचंद्र जी को तो खुद का ही होश नहीं था तो वे क्या समझ पाते। उनके लॉकर खोल लिए गए जेवर रकम नगदी दोनों बहू बेटों ने आपस में बाँट लिए सारा कीमती सामान हथिया लिया मकान जमीन जायदाद पर कब्जा कर लिया मकान दुकान का किराया भी वे वसूल करने लगे नरेश जी के दोनों बेटों ने खुद से कुछ नहीं किया था दोनों बेटों को दुकाने नरेश जी ने खुलवाई थी उनका धंधा भी उन्हीं ने जमाया था मगर वे दोनों मतलबी थे उनसे तो उनकी पत्नियाँ ठीक थीं जो अपने लुटेरे मायकेवालों से लगाव तो रखती थीं।लूट इंसानियत का गला घोंटकर इस हद तक पहुँची की नरेशचँद्र जी और निर्मला के पास के दोनों कमरों पर भी कब्जा कर लिया गया था। उनका सामान तो वे हथिया ही चुके थे नरेश जी का बेड और गद्दा भी छीन लिया गया था और उनका साधारण सा बिस्तर जीने के नीचे लगा दिया गया था अब उनके खाने पीने तथा गोली दवा का ख्याल रखने वाला कोई नहीं था उन्हें तेज मिर्च मसाले वाला खाना दिया जाता जिसे वे खा नहीं पाते थे कई बार तो उन्हें भोजन ही नहीं दिया जाता था उन्हें दवा देना बंद कर दिया गया था बेटे जोरू के इतने बड़े गुलाम थे कि वे कुछ कहते भी नहीं थे क्या इसी दिन के लिए लोग औलादों को लाड़ प्यार से पाल पोस कर बड़ा करते हैं। एक बार तो हद हो गई जब उनका बिस्तर गंदा होने पर दोनों भाईयों ने अपनी पत्नियों के भड़काने पर अपने लाचार पिता की बेरहमी से पिटाई की जिससे वे बुरी तरह घायल हो गए थे बहुत देर तक अचेत पड़े रहे बेरहम बेटों ने उनका इलाज तक नहीं कराया उनकी शुगर बढ़ी हुई थी कई महीनों से उन्हें डाइबिटीज की गोली नही दी गई थी पिटाई से जो घाव हुए थे वे और गहरे हो गए उनमें मवाद पड़ गया वे घाव सड़ने लगे थे उनमें कीड़े पड़ गए थे जिनसे असहनीय दुर्गंध उठ रही थी। आखिरी वक्त में कोई उनके पास नहीं जाता था कई दिनों से उन्हें खाना पीना नहीं दिया गया था।ऐसी हालत में नरेश जी ने तड़प तड़प कर अपने प्राण त्यागे थे जब बहुत देर तक उनके शरीर में कोई हलचल नहीं हुई तब पता चला की वह मर चुके हैं उनकी मौत पर कोई दुखी न था। सब यही सोच रहे थे कि चलो अब इस घर से ये बदबूदार कचरा हमेशा के लिए दूर हो जाएगा।
यह कहते हुए मंजू फूट फूट कर रोने लगी विमला भी दुख और गुस्से से भर गई थी कहने लगी नरेशचँद्र जी की स्वाभाविक मौत नहीं हुई है उनकी हत्या की गई है। मंजू बोली तो हत्यारा कौन है विमला ने कहा उस परिवार का एक एक सदस्य। भगवान उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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