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कहानी: चोरी से पढ़ाई कर बनी आई ए एस

आई ए एस सुरेखा  जो कृषि उपज मंडी बोर्ड की निदेशक थीं,  ने अपनी कार्यकुशलता एवं प्रतिभा  से बोर्ड में  कई नवाचार किए थे, अनेक पेंडिंग कार्य पूरे कराए थे। जो फाइलें वर्षों से लंबित थीं उनका निपटारा किया था। ऐसी ही एक फाइल और थी जिसमें पाँच वर्ष से दैनिक वेतन भोगी के रूप में काम कर रहे कई मंडी कर्मचारियों के नियमितीकरण की फाइल थी।  सुरेखा ने उसका त्वरित निराकरण कर पूरे प्रदेश के एक हजार मंडी कर्मचारियों को नियमित नियुक्ति प्रदान की थी। उसमें उनका भाई सुरेश भी शामिल था जो स्थानीय कृषि उपज मंडी में  बारह हजार रुपये मासिक के वेतन पर नीलामी में बोली लगाने का काम पिछले पाँच वर्षों से कर रहा था।
सुरेखा के चेहरे पर आज संतुष्टि के भाव थे। उन्होंने पूरी ईमानदारी से ये कार्य किया था। बोर्ड के अध्यक्ष ने भी उनको प्रोत्साहन दिया था। आज सुरेश के यहाँ दीवाली जैसी खुशियाँ मन रही थीं क्योंकि नियमित नियुक्ति के बाद उसका वेतन बारह हजार से बढ़कर बत्तीस हजार  रुपये प्रतिमाह हो गया था। इस खबर से पिताजी छगनलाल भी बहुत खुश थे। 
सुरेखा उनकी ख़ुशी में शामिल होने अपने पिता के घर पर आई थीं यहाँ उनकी ख़ूब आवभगत हुई थी। छगन जी तो लगभग रुआँसे होकर बोले थे, बेटी हो सके तो मुझे माफ कर देना वैसे मेरे अपराध माफ करने लायक नहीं है।
इस पर सुरेखा ने कहा अगर मैं सफल नहीं होती तो आपको कभी माफ नहीं करती सफल होने के बाद मेरे मन में कोई मलाल नहीं है। आप भी यह सब सोचकर दुखी मत हुआ करो।
सुरेखा ने पिताजी की चोरी से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। इसमें सुरेखा जी की माँ सरसुती का बडा योगदान था। जिनकी मदद से वह पढ़ाई पूरी कर सकीं तथा आइ ए एस अधिकारी बन सकीं। छगनलाल नहीं चाहते थे कि सुरेखा पढ़े। वे बेटा बेटी में भेदभाव करने वाले इंसान थे। सुरेश को वे निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा रहे थे, जबकि  सुरेखा का एडमीशन सरकारी स्कूल में होने के बाद भी वे उसे स्कूल नहीं जाने देते थे। सुरेश की उन्होंने घर पर ट्यूशन भी लगवा रखी थी । फिर भी उसकी बुद्धि इतनी तेज नहीं थी। जैसे तैसे बस पास हो जाता था।
सुरेखा की मेडम सरिता जी पास में ही रहती थीं। वे जब स्कूल जातीं तो अपनी साल भर की बिटिया सुरेखा के हवाले कर जाती थीं। इसके लिए वे सुरेखा को  प्रतिमाह निश्चित रुपये का भुगतान भी करती थीं। और सुरेखा को पढ़ाती भी थीं। वो पिता की चोरी से पढ़ रही थी। अगर उन्हें ख़बर लग जाती तो वो सुरेखा की पढ़ाई पूरी तरह बंद करा देते। सुरेखा पिता की चोरी से परीक्षा देती थी। आठवीं तक सुरेखा रेगुलर रहीं,  फिर उन्होंने प्राईवेट परीक्षा देना शुरू किया और बी ए प्रथम श्रेणी में पास कर ली। जबकि  सुरेश हायर सेकेण्डरी से आगे न पढ़ सका। तथा पिताजी  के साथ मजदूरी पर जाने लगा था। वहीं पर छगनलाल जी की मण्डी कमेटी के चेयरमेन राजेश धनगर से निकटता बढ़ी तब उन्होंने  सुरेश को दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के  रूप में  मंडी मे रखवा दिया था। इससे सुरेश की शादी  आसानी से हो गई थी। इतनी कम तनख्वाह  में उनका गुजारा मुश्किल से हो रहा था। इधर सुरेखा को  सरिता ने मेडम ने यू पी एस सी की पूरी अद्धयन सामग्री उपलब्ध करा दी थी। जो उनके भाई की नौकरी लग जाने के बाद  उनके पास रखी थी। उसमें नोटस भी शामिल थे। सुरेखा कुशाग्र तो थी ही, इस सामग्री ने उसे बहुत सहारा दिया। नतीजा यह हुआ कि  सुरेखा ने पहले प्रयास में ही  सफलता हासिल कर ली थी। सुरेखा जी का चयन आइ ए एस में हो गया था। उसके चयन की खबर पूरे शहर में आग की तरह फैल गई थी।  छगनलाल जी के कानों तक भी ये खबर पहुँची तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ।  वे तैश में घर आए तो सुरेखा तथा उनकी माँ सरसुती ने शुरू से आखिर तक सारी बात बता दी। छगनलाल तय नहीं कर पा रहे थे कि इस पर वे खुश हों या गुस्सा करें। ये भी सही बात थी की अगर उन्हें पता चल जाता कि सुरेखा पढ़ रही है तो वे उसे किसी सूरत में नहीं पढ़ने देते। धीरे-धीरे वे नाॅर्मल हो गए थे। अब उनका भी पूरे शहर में सम्मान बढ़ गया था। और अब तो सुरेखा पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध हो गई थी। आज छगनलाल सोच रहे थे कि अगर सुरेखा आइ ए एस नहीं होती तो सुरेश की नौकरी कभी पक्की नहीं होती।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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