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कहानी: ड्राइवर की तनख्वाह

सेवानिवृत होने जा रहे शिक्षक रामलाल से रिश्वत के रूप में पच्चीस हज़ार रुपये की रकम लेते हुए रंगे हाथों संकुल प्राचार्या सुनीता मेडम पकड़ाई थीं यह ख़बर आग की तरह चारों ओर फैल गई थी सुनीता मेडम के रिटायर मेन्ट में दो साल का समय शेष था उन्हें एक लाख साठ हजार रुपये तन्ख्वाह मिल रही थी फिर भी पच्चीस हज़ार की रिश्वत लेने के लोभ को रोक नहीं सकीं जबकि पति संजीव मेडिकल ऑफिसर थे एक बेटा रितेश  हार्ट स्पेश्लिस्ट  था बेटी  ऋचा स्त्री रोग विशेषज्ञ सबको अच्छी ख़ासी तनख़्वाह मिल रही थी । लेकिन लालच ने उनका केरियर चौपट कर दिया था। विभाग ने उन्हें सस्पेण्ड कर दिया था उनके वकील ने केस की स्टडी कर माथा पकड़ लिया था। कहा था मेडम अगर सजा हो गई तो सब कुछ चौपट हो जाएगा पुलिस ने आपके खिलाफ केस बहुत मजबूत बनाया है। सुनकर सुनीता मेम आजकल बहुत घबराई हुई थीं।
सुनीता मेम शहर की कोई मामूली हस्ती नहीं थी पूरे तीस साल?तक एक्सीलेंस स्कूल में फिजिक्स की व्याख्याता रही थी। वे शहर की अच्छी शिक्षक मानी जाती थीं दो साल पहले उनका प्रमोशन शहर से बीस किलोमीटर दूर कस्बानुमा गाँव राजगाँव के हायर सेकेण्डरी  स्कूल के प्राचार्य पद पर हुआ था। यह स्कूल संकुल केन्द्र भी था  जिसके अधीन चालीस सरकारी स्कूल और पन्द्रह प्राइवेट स्कूल आते थे।जब वे नई नई प्राचार्य बनी थीं तब उन्हें इतना घमंड नहीं था सबसे घुलमिल कर बातें करती थीं पर जैसे जैसे पद का नशा चड़ता गया वैसे वैसे उनका व्यवहार भी बदल गया था अब वो किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करतीं थीं। उन्हें बीस किलोमीटर स्कूटी से जाने में परेशानी हो रही थी। उन्हें पदभार सम्हाले हुए एक महीना हो गया था एक दिन उनका एकाउण्टेन्ट उनके केबिन में आया और उनके पर्स में चालीस हज़ार रुपये रख दिए सुनीता मेम बोलीं यह क्या है तो लेखापाल दिनेश वर्मा ने कहा ये हर माह मिलने वाला आपका हिस्सा बै। इंसान जितना अधिक पैसे वाला होता है उतना ही उसका मन छोटा होने लगता है। वो पैसे उन्होंने ले लिए अब उनके मन में लालच ने जन्म ले लिया था।  अब वे कमाई के ओर भी  रस्ते निकालने लगीं थी  एकाउण्टेन्ट दिनेश उनके बढ़ते हुए लोभ से परेशान हो गया था सुनीता मेम ने  रिश्वत की राशि बढ़ा दी थी छोटा बाबू हरिमोहन  उनकी ओर से पैसा लेता था। शिक्षक  राकेश की बेटी रश्मि की शादी थी उनको बारह लाख रुपये के जी पी एफ की जरूरत थीं इधर सुनीता मेम ने नई कार ली थी उसकी किश्त ड्राइवर  की तनख्वाह  एवं पेट्रोल पर पूरे पैंतीस हजार रुपये खर्च होते  थे ये सारा पैसा  वे ऊपर की कमाई  से जुटा  लेती थीं  राकेश ने जी पी एफ आहरण   के लिए आवेदन दिया था। जिस पर साठ हजार रुपये की  रिश्वत  माँगी जा रहीं थी शिक्षक राकेश  दस हजार रुपये  तो देने को तैयार हो गए  थे पर साठ हजार  कैसे दे और क्यों दे यही  सोच रहे थे । राकेश ने लोकायुक्त से सपर्क किया था लोकायुक्त ने अपनी ओर से  रुपये राकेश को दिए  राकेश ने वो राशि  हरिमोहन  को दी  वो राशि लेते ही पकड़ा गया   सुनीता मेम साफ बच गईं थी उन्होने छोटे  बाबू   को फंसा दिया था।  उसके  के सस्पेण्ड होने के बाद सुनीता मेम ड्राइवर के मार्फत रुपया लेने लगी थीं अब वह आदर्श  शिक्षक नहीं भ्रष्ट  अधिकारी बन गईं थीं। अचानक हरिमोहन  छूट कर आ गया था तथा  उसने अपना काम सम्हाल लिया था सुनीता मेम भी खुश थीं  वो फिर से रिश्वत की डील   करने लगा था एक दिन वो  रेस्त्रां  में प्रिन्सीपल मेडम  को रुपये दे रहा था तभी  पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।  सुनीता   पुलिस के जाल में  फँस गईं थीं हरिमोहन  पुलिस का गवाह बन गया था।  जिसकी भनक तक सुनीता मेम को नहीं लग सकी थीं  वो छूट गया था  और सुनीता मेम  के खिलाफ केस दर्ज  हो चुका था। वे अरेस्ट हो गई थीं अब न ड्राइवर धा न कार थी। न मैडम के जलवे थे।जो बदनामी हुई उसकी कोई सीमा नहीं थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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