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कहानी: दबंगों की बेटी की शादी के बीच दलित की बेटी की शादी

पल्टूराम जो ग्राम के दलित वर्ग से संबंधित था, वह आज बहुत खुश था उसकी बेटी की शादी निर्विघ्न संपन्न हो गई थी। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उसी दिन गाँव के दबंग जाति के पुष्पराज सिंह की बेटी मोनिका की भी शादी थी। ऐसे में पल्टूराम को आशंका थी कि कहीं शादी में कोई झगड़ा या विध्न खड़ा न हो जाए। गाँव के सारे दलित दबंगों पर निर्भर थे। कहीं झगड़ा हो जाता तो दलितों का गाँव में रहना मुश्किल हो जाता।
पल्टूराम ने बीस वर्ष पहले ये गाँव छोड़ दिया था और शहर में आकर बस गया था शहर में उसने ज्वेलर की  दुकान पर नौकरी कर ली थी, चार महीने बाद वो अपने परिवार को लेकर शहर में आ गया था। तब उसकी बेटी मणिमाला दो साल की थी। तथा बेटा माणिक पाँच वर्ष का। पल्टूराम मेहनती ईमानदार और कर्मठ था। सेठजी के प्रति उसकी निष्ठा पर किसी को संदेह नहीं था। पल्टूराम ने शीघ्र ही सेठ सुहागमल जी का विश्वास जीत  लिया था। सुहागमल के दो बेटे थे दोनों ही बेईमान तथा मतलबी थे।  सेठजी रकम बनवाने के लिए शुद्ध सोना देते वे उसमें मिलावट कर रुपया अपनी जेब के हवाले कर लेते। इससे सेठ जी की शाख को बट्टा लग रहा था इससे बचने के लिए सेठजी अपनी निगरानी में जेवर बनवाने लगे तो सेठजी के दोनों बेटों ने काउण्टर पर बैठकर बिलिंग में गड़बड़ी कर पैसा खींचना शुरू कर दिया। सेठजी असहाय हो गए थे शहर में उनकी दुकान तीन सौ वर्ष पुरानी थी परदादा के भी दादा द्वारा वो दुकान राजशाही के दौर में खोली गई थी । सेठ सुहागमल दुकान की साख नहीं खोना चाहते थे। नौकरों पर भी भरोसा नहीं कर सकते थे। जब अपने सगे बेटे ही बेईमानी कर रहे हों तो फिर नौकर तो गैर होते हैं। ऐसे समय में पल्टूराम ने सुहागमल के यहाँ  नौकरी  की शुरुआत की थी। सेठजी की पारखी नजरों ने पलटूराम के अंदर के भले आदमी को पहचान लिया था। पल्टूराम ने एक वर्ष में  स्वर्ण आभूषण बनाना अच्छे से सीख लिया था उसकी हर डिजाईन कमाल की होती थी। पल्टूराम जब दुकान पर सेल्समेन की हैसियत से बैठता तो ग्राहकों की भीड़ लग जाती थी। जब सुहागमल जी के लड़कों के धन हड़पने के रस्ते बंद हो गए तो  उन्होंने पिता से झगड़कर संपत्ति में हिस्सा माँगा। सुहागमल जी ने अपनी संपत्ति का अधिकाँश हिस्सा दे दिया था।  जिसे  दोनों बेटों ने अपनी अय्याशी में चार साल में ही चौपट कर दिया था। सुहाग मल जी के  पास एक दुकान भर रह गई थी वो भी सराफा बाजार से दूर थी। अब सेठ सुहागमल के पास कुछ नहीं बचा था। नौकर कारीगर सब चले गए थे। ऐसे में अकेला पल्टूराम ही सुहागमल जी का साथ दे रहा था। पल्टूराम जानते थे कि  अगर वे दुकान शुरू करते हैं तो  बेटे फिर उसपर कब्जा कर लेंगे इसलिए उन्होंने वो दुकान  पल्टूराम को किराये पर दे दी थी जिसमें पल्टूराम ने भी सराफे की दुकान लगा ली थी। सुहागमल जी दुकान पर बैठकर पल्टूराम का मार्गदर्शन करते थे पल्टूराम उनके सम्मान में कमी नहीं होने देता था वे उनके सरपरस्त थे। कुछ ही सालों में पल्टूराम की सराफा की दुकान शहर का सबसे बड़ा ज्वेलरी का शो रूम बन गई थी।  सुहागमल जी की खानदानी साख का लाभ पल्टूराम को मिला था। सुहागमल जी ने अंतिम साँस पल्टूराम की गोद में लेकर प्राण त्यागे थे शोरूम में पल्टूराम ने उनकी बड़ी तस्वीर लगाई थी। उधर सुहागमल के दोनों लड़के हेराफेरी चोरी और तस्करी के जुर्म में जेल की हवा खा रहे थे। पल्टूराम अब शहर के गणमान्य नागरिकों में शुमार थे। उनकी बेटी मणिमाला बाईस  वर्ष की हो गई थी। उसकी शादी उन्होंने दलित वर्ग के होनहार युवक  सुखदीन से तय कर दी थी। सुखदीन एम बी ए था तथा बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छी नौकरी कर रहा था। पल्टूराम शादी गाँव से करना चाहते थे।  गाँव में दबंगों के होते हुए दलित ज्यादा तड़क भड़क वाली शादी नहीं कर सकते थे लेकिन पल्टूराम कोई मामूली आदमी नहीं था। कलेक्टर और एस पी उसके यहाँ शादी की व्यवस्था देखने आए थे।  फिर भी दबंग दबंग थे और दलितों को उनके बीच रहना था इसलिए पल्टूराम को एक एक कदम फूँक फूँक कर रखना पड़ रहा था। दबंगों की बेटी की शादी  में दूल्हा शाही बघ्घी में बैठकर आया था जबकि पल्टूराम जी का दामाद  मिलेट्री के  शानदार वाहन में बैठकर आया पल्टूराम की शादी मे सेना का बैंड बज रहा था जो कमाल का था उसके आगे दबंगों का सबसे शानदार बैंड भी फीका लग रहा था पर वे यह सोच कर खुश थे  कि  उनका बैंड सबसे मँहगा और शानदार है । अब दूल्हे को फलदान के दौरान धन देने की रस्म थी पुष्पराज पल्टूराम के मुकाबले बहुत कम हैसियत वाले थे मगर जातिगत अभिमान लबालब भरा था। पल्टूराम उनका इंतजार कर रहा था कि वे कितनी रकम दामाद को देते हैं। पुष्पराज सिंह ने अपनी शान बचाने के लिए ग्यारह लाख रुपये दामाद को  दिए थे। यह सुनकर पल्टूराम  ने चाँदी की थाली में सोने की एक सो एक गिन्नी अपने दामाद को दी  तथा दबंगों के समक्ष कहा कि हम ने आपकी बराबरी नहीं की है आपने ग्यारह लाख दिए हैं हमने तो एक सौ एक सिक्के ही दिए हैं वे भी असली सोने के नहीं गिलट के हैं जिसमें सोने का पानी चढ़ाया गया है और हुजूर ये थाली भी एलमुनियम की है। यह सुनकर दबंगों का अहं संतुष्ट हुआ था तथा दलितों के मुखिया हरदीन ने राहत की साँस ली थी जबकि सच सबको पता था पुष्पराज ने एक लाख रुपये ही दिए थे बाकी दस लाख केवल प्रदर्शन के लिए रखे गए थे। जबकि पल्टूराम की सारी गिन्नी खरी थीं थाली खालिस चाँदी की थी लेकिन दलितों के मुखिया के आग्रह पर  उन्हें यह सब कहना पड़ा था। पल्टूराम की गिन्नी ही इकसठ लाख की थी और थाली एक लाख की मगर प्रदर्शित नहीं कर पा रहे थे दंसरी और दबंगों का प्रदर्शन खोखला था। मगर फिर भी  भारी था। शादी संपन्न होने के बाद पल्टूराम जी ने  सभी को शहर में आयोजित कार्यक्रम में बुलाया था जो शहर का सबसे भव्य कार्यक्रम होने वाला था। जिसमें सी एम  सहित देश की कई जानी मानी हस्तियाँ आने वाली थीं। वहीं पर दूल्हे को दहेज की सामग्री  शानदार बँगले की चाबी तथा ज्वेलरी दी जाने  वाली थी। पल्टूराम ने उस कार्यक्रम में गाँव के  किसी भी  दबंग को निमंत्रण देने की भूल नहीं की थी। दलितों का मुखिया सुखदीन पल्टूराम के सामने हाथ जोड़कर खड़ा था और कह रहा था आपने मेरी बात मानकर हम दलितों पर बड़ा अहसान किया है, अगर आप ऐसा नहीं करते तो हमारा यहाँ रहना मुश्किल हो जाता। कई वर्ष पहले  दलित हरिया ने पुलिस और प्रशासन के दवाब से गाँव की चौपाल पर नाई से कटिंग करवाने की हिम्मत जुटाई थी, जिसके कारण उसे गाँव छोड़कर जाना पड़ा था। और हमें दबंगों से बहुत मिन्नतें करना पड़ी थीं। पल्टूराम सुखदीन से कह रहे थे, मैं सब समझता हूँ, मैं भी तो आपके बीच का हूँ, शहर चला गया तो क्या हुआ मेरी जड़ें तो यहीं हैं।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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